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प्रसन्नता सदा मित्र ही नहीं लाते। कभी कभी विरोधी भी मन प्रसन्न कर देते हैं। राहुल गांधी अपने दल के वरिष्ठ महानुभाव हैं। भारत के सबसे पुराने राजनैतिक दल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। वे प्रिय हैं लेकिन विचारधारा के स्तर पर हम लोगों के विरोधी भी हैं। एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबार के अनुसार वे इस समय उपनिषद् व गीता पढ़ रहे हैं। संघ से संघर्ष के लिए। उपनिषद् विश्व ज्ञान दर्शन का शिखर है। उनकी संख्या लगभग 200 है। प्रथम शंकराचार्य ने इनमें से 11 प्रमुख उपनिषदों का भाष्य किया था। गीता और उपनिषद् पढ़ने की राहुल जी की घोषणा ने हमारा मन प्रसन्न किया है। हमारी शुभाशंसा है। राहुल जी सभी उपनिषदें पढ़ें तो और भी अच्छा है। वैसे प्रमुख 11 उपनिषदों के पाठ और पुनर्पाठ से भी उनका चित्त तरल हो सकता है। गीता में सभी उपनिषदों के विचार सूक्त हैं। यहां दर्शन दिग्दर्शन की शिखर ऊंचाईयां भी हैं। उपनिषद् व गीता का पाठ उनके मन को निश्चित प्रशान्त करेगा। वे आनंदित भी होंगे। लेकिन गीता और उपनिषद् की अन्तर्वस्तु संसार से स्वयं के भीतर की यात्रा है और राजनीति स्वयं के भीतर से बाहर की भाग दौड़। राजनीतिक जय-पराजय के गुणा भाग स्वयं को स्वयं से दूर ले जाते हैं और उपनिषद् व गीता के पाठ स्वयं को स्वयं के भीतर अन्तःक्षेत्र में। राहुल जी तय करें कि उन्हें जाना कहां हैं?

संघ विचारधारा से लड़ने में कोई बुराई नहीं है। विचारधाराओं के टकराव से जनतंत्र स्वस्थ होता है। लेकिन ऐसे टकराव के लिए विरोधी विचारधारा का विकल्प भी अपने पास होना चाहिए। मूलभूत प्रश्न है कि क्या राहुल जी के पास भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का कोई वैचारिक विकल्प है। विपिन चन्द्र पाल कांग्रेसी ही थे लेकिन उनके पास भारतीय राष्ट्रवाद का सुस्पष्ट दर्शन था। गहन इतिहासबोध था सो भविष्य की दूरदृष्टि भी थी। तिलक बहुपठित राजनेता थे। उनकी रूचि गीता रहस्य में थी। नभ मण्डल में उगते मृगशिरा नक्षत्र पर उन्होंने ओरायन नाम का ग्रंथ लिखा था। वे ऋग्वेद के सूक्तों का रचनाकाल तय करने में जुटे थे। नेहरू जी भारत को समझना चाहते थे। उन्होंने कारावास के कष्ट पूर्ण जीवन में ‘डिस्कवरी ऑफ इण्डिया’ लिखी थी। नेहरू जी ने भारत माता का सजीव वर्णन किया है। बेशक वे पूर्वज आर्यों को विदेशी जानते थे। यह एक बड़ी चूक थी। इसका कारण ऋग्वेद के सूक्तों में आई नदियों व सुनिश्चित भूगोल का सही विश्लेषण न कर पाना हो सकता है। आर्यों को विदेशी बताने का काम यूरोपीय विदेशी शक्तियों ने ही किया था। नेहरू जी ने यही झूठा सच स्वीकार किया था। बावजूद इसके वे गहन पढ़ाकू थे। राहुल जी नेहरू जी की लिखी पुस्तकें पढ़ सकते हैं। पढ़ चुके हों तो वैदिक दर्शन के आलोक में उन्हें दोहरा भी सकते हैं।

आगे गीता और उपनिषद् से क्या-क्या ज्ञान लें राहुल 

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