एक बार फिर वही हुआ जिसके चलते देश ने कांग्रेस और विपक्ष की विचारधारा के सामने मोदी सरकार से..

Avatar Written by: August 6, 2017 10:31 am

राष्ट्रपति के बाद अब उपराष्ट्रपति चुनाव में भी विपक्ष को मुंह की खानी पडी है। भाजपा ने देश की सत्ता के शीर्ष पर अपना परचम फहरा दिया है। कहा जाए तो शीर्ष से जमीन तक बस भाजपा का परचम है। कांग्रेस कोसों दूर तक नहीं है। जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रभाव लगातार बढता जा रहा है तो लगता है कि बचीखुची जमीन भी कांग्रेस के पैरों तले खिसकने जा रही है।

राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस समेत विपक्षी दलों को करारी शिकस्त के बाद अब यह व्याख्या होने लगी है कि क्या देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की विचारधारा को जनता ने नकार दिया है। यह तो साफ है कि दोनों ही चुनावों को कांग्रेस और विपक्ष ने विचारधारा की लडाई बताई थी। तो क्या अब इन चुनावों में मिली शिकस्त यह साबित नहीं करती है कि इस विचारधारा को खारिज कर दिया गया है।

इसमें अहम बात यह है कि जिस विचारधारा की जंग को लेकर दावा किया जा रहा था उससे कांग्रेस और विपक्षी दलों के ही कई सांसद इत्तेफाक नहीं रखते थे। राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनावों में हुई कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के सदस्यों की तरफ से हुई क्रॉस वोटिंग क्या इस बात को साबित नहीं करते कि विपक्ष ही विचारधारा को लेकर बंटा हुआ है। भाजपा को सांप्रदायिक पार्टी साबित करने में जुटी कांग्रेस और उसकी विचारधारा की जंग को दोनों ही चुनाव तेज झटका हैं।

जाहिर है कांग्रेस में इसपर आत्ममंथन हो रहा होगा। और होना भी नहीं चाहिए। अगर कांग्रेस आलाकमान इस पर चिंतन मनन न करे तो सुधार न लाए तो उसे इस बात के लिए तैयार रहना होगा कि जनता के बीच उसकी बचीखुची साख भी डूब जाए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सबका साथ सबका विकास जो नारा दिया है उससे देश की जनता और बडा राजनीतिक वर्ग काफी प्रभावित है यह कई मौकों पर साबित हो चुका है। यही वजह है कि कांग्रेस को अब सोचने पर विवश होना पडा है कि आखिर क्यों उसका प्रभाव हर वर्ग पर घट रहा है।

राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव के नतीजों के बाद कांग्रेस के दिग्गजों की जो प्रतिक्रिया आई है उससे साफ साबित होता है कि भाजपा से चुनावी जंग को विचारधारा की जंग को मुददा बनाना भारी पड रहा है। हालांकि कांग्रेस अभी भी इसे खुलकर स्वीकार करने के मूड में नहीं है और यही संदेश देना चाहती है​ कि विचारधारा के मामले में वह सही है। यही वजह है कि राहुल गांधी से लेकर गुलाम नबी आजाद तक दोनों चुनावों में करारी हार के बाद यही बोलते आए हैं कि कांग्रेेस की विचारधारा की लडाई जारी रहेगी भले ही राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति चुनावों में उन्हें पराजय का मुंह देखना पडा है।

लेकिन यह तय है कि भाजपा अब इस तथाकथित विचारधारा की जंग पर कांग्रेस को घेरने की कवायद को और तेजी दे दे तो अचरज नहीं होना चाहिए। जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों ने कांग्रेस की विचारधारा को सिरे से खारिज कर दिया है यह अपने आप में कोई कम संदेश नहीं है। और यह प्रतिनिधि सिर्फ भाजपा या राजग के दूसरे दलों से ही नहीं बल्कि कांग्रेस और विपक्षी दलों के भी हैं।

उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, झारखंड, हरियाणा, महाराष्ट्र आदि जैसे सूबों के चुनावी दंगल में तो कांग्रेस की विचारधारा पहले ही पटखनी खाई हुई है। लेकिन सत्ता के शीर्ष स्तर पर जहां सांसदों और विधायकों से सीधे मत प्राप्त होते हैं कांग्रेस की पराजय ने साफ किया है कि अब उसे विचारधारा की ढाल के पीछे छिपाने काम नहीं चलेगा।