मायावती के बारे में ये सच जानकर आप दंग रह जाएंगे क्योंकि जब वो खुद यूपी में कर रही थी….

Written by Newsroom Staff April 4, 2018 9:16 am

नई दिल्ली। एससी-एसटी एक्ट में बदलाव के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इस समय बहुजन समाज पार्टी विरोध भले ही कर रही है, लेकिन एक समय अपने शासनकाल में ही उसने माना था कि एक्ट का दुरुपयोग हो रहा है। तब प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती थीं और उनके निर्देश पर मुख्य सचिव ने निर्दोषों को न फंसाए जाने के लिए शासनादेश भी जारी किए थे। भारत बंद के दौरान हिंसा होने के बाद यह शासनादेश फाइलों से बाहर निकलकर सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।एससी-एसटी एक्ट का दुरुपयोग रोकने के लिए कानून में बदलाव के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर बहुजन समाज पार्टी ने केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया है। खुद बसपा प्रमुख मायावती ने आरोप लगाया है कि इस मामले में सरकार ने ठीक से पैरवी नहीं की। लेकिन, अब से 11 साल पहले 2007 में उनकी ही सरकार ने इस एक्ट का दुरुपयोग रोकने के आदेश जारी किए थे।

Mayawati, BSP

उस साल ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ के नारे के साथ बहुजन समाज पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी थी। चूंकि पूर्व में मायावती सरकार में एससी-एसटी एक्ट के जमकर दुरुपयोग के आरोप लगे थे, इसलिए तत्कालीन प्रमुख सचिव प्रशांत कुमार ने सभी मंडलायुक्तों और जिलाधिकारियों को पत्र भेजकर निर्देश दिया था कि अनुसूचित जाति और जनजाति के उत्पीड़न के मामलों में ध्यान दिया जाए कि किसी निर्दोष व्यक्ति को अनावश्यक परेशान न किया जाए और यदि किसी मामले में आरोप झूठे पाए जाते हैं तो भादंवि की धारा 182 के तहत कार्यवाही की जाए।

Mayawati, BSP President

मंगलवार को यह शासनादेश सोशल साइट्स पर वायरल होता रहा। मंगलवार को भाजपाई इस मुद्दे पर बसपा पर भले ही कटाक्ष करते रहे हों लेकिन, 2007 में उन्होंने इस शासनादेश का स्वागत किया था। यह अलग बात है कि अब केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में उसके फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर की थी जो मंगलवार को खारिज हो गई।

Mayawati, BSP

सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी ऐक्ट से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए इसमें तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। इसके अलावा ऐक्ट के दुरुपयोग को रोकने के लिए कुछेक और व्यवस्था की गई है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ दलति संगठनों ने 2 अप्रैल को भारत बंद का आयोजन किया था।

बंद के दौरान व्यापक हिंसा हुई और 12 लोगों की मौत हो गई। विपक्ष और दलित संगठन इस ऐक्ट को कमजोर करने का आरोप लगा मोदी सरकार को घेर रहे हैं। बैकफुट पर नजर आ रही मोदी सरकार ने इसे लेकर रिव्यू पिटिशन दाखिल किया है, लेकिन सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने आदेश पर स्टे लगाने से इनकार कर दिया है।

मायावती ने भी दलित संगठनों की मांग को अपना समर्थन दिया है। हालांकि यूपी की मुख्यमंत्री रहने के दौरान उनकी सरकार खुद इस ऐक्ट के दुरुपयोग को लेकर चिंतित नजर आ रही थी। 20 मई 2007 को तत्कालीन मुख्य सचिव शंभु नाथ की तरफ से जारी किए गए पत्र के 18वें पॉइंट में इस ऐक्ट के तहत पुलिस से दर्ज की जाने वाली शिकायतों का जिक्र था। यह निर्देश मायावती के सीएम बनने के महज एक हफ्ते के भीतर ही जारी हुआ था। इस निर्देश में साफ किया गया था कि केवल हत्या और रेप जैसी जघन्य वारदात ही इस ऐक्ट के तहत दर्ज होनी चाहिए। साफ था कि माया सरकार में जारी इस दिशा-निर्देश का मकसद यह पक्का करना था कि इस अधिनियम का दुरुपयोग ना हो। मायावती की सरकार ने पुलिस को निर्देश जारी किए थे कि वह जेनुइन शिकायत होने पर कानून को समुचित तरीके से लागू करे। पहले दिशा-निर्देश के 6 महीने बाद (29 अक्टूबर 2007) तत्कालीन मुख्य सचिव प्रशांत कमार ने डीजीपी और फील्ड के सभी वरिष्ठ अधिकारियों को संबोधित करते हुए दूसरा पत्र भेजा। इस पत्र में मायावती सरकार ने ऐक्ट का दुरुपयोग होने पर आरोपी के खिलाफ समुचित कार्रवाई करने पर भी जोर किया था। पुलिस अधिकारियों को यह निर्देश भी दिया गया था कि इस कानून के तहत दी गई सूचना फर्जी पाई जाती है तो आरोपी के खिलाफ आईपीसी की धारा 182 के तहत कार्रवाई शुरू की जाए।