अविश्वास प्रस्तावः विपक्ष का एक और सेल्फ गोल?

Written by: July 19, 2018 3:48 pm

2019 की जंग की शुरुआत 2018 में ही हो गई है। मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष का अविश्वास प्रस्ताव इसका मजबूत संकेत है। लोकसभा चुनाव में विपक्ष के महागठबंधन की भूमिका को लेकर जहां इससे तस्वीर साफ होगी वहीं मोदी सरकार को अपने कामकाज का लेखा जोखा रखने का मौका भी मिलेगा। लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने विपक्ष द्वारा सरकार के खिलाफ दिए अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस को मंजूर कर लिया। मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा शुक्रवार को होगी तथा उसी दिन इस पर मतदान भी होगा।

लेकिन मोदी सरकार के खिलाफ लाए गए इस अविश्वास प्रस्ताव से ऐसा साफ लगने लगा है कि सरकार की सेहत पर इससे कोई अंतर नहीं पड़नेवाला है। बल्कि विपक्ष के द्वारा लाए गए इस अविश्वास प्रस्ताव का नुकसान उन्हें खुद उठाना पड़ेगा। सरकार के पास अभी भी पूर्ण बहुमत है।

वहीं सरकार के सहयोगी दल शिवसेना ने भी सरकार के पक्ष में रहकर अविश्वास प्रस्ताव का विरोध करने की घोषणा कर दी है। जिससे विपक्षियों के पसीने छूट गए हैं। वहीं भाजपा के बागी नेता और पटना साहिब से सांसद शत्रुघ्न सिन्हा ने भी अविश्वास प्रस्ताव पर मोदी सरकार के समर्थन में आने की बात कही है।Shatrughan Sinha and Narendra Modi

एक बार लोकसभा में सीटों का गणित देख लें

अब सवाल यह उठता है कि क्या मोदी सरकार के पास इस अविश्वास प्रस्ताव को विफल करने के लिए पर्याप्त नंबर हैं? इस अविश्वास प्रस्ताव से केंद्र सरकार को कोई ख़तरा तो नहीं है? वर्तमान में लोकसभा की कुल सीटों की संख्या 543 है। इनमें से 9 सीटें अभी खाली हैं। यानी इस वक्त लोकसभा के कुल 534 सांसद हैं। इस लिहाज से लोकसभा में साधारण बहुमत का आंकड़ा 534 का आधा 267+1 यानी 268 होता है।narendra-modi-cabinet-meeting-21

फ़िलहाल लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी है। अकेले भारतीय जनता पार्टी के पास 272 + 1 (लोकसभा अध्यक्ष) सांसद हैं और सहयोगी दलों को मिलाकर एनडीए गठबंधन के पास 311 सांसद हैं। इनमें शिवसेना के सांसद (18), एलजेपी (6), अकाली दल (4), आरएलएसपी (3), जेडीयू (2), अपना दल (2), एनआर कांग्रेस (1), पीएमके (1) और एनपीपी (1) हैं। अगर सहयोगी दलों को छोड़ भी दें तो भाजपा अकेले अपने दम पर सदन में विश्वास मत हासिल कर लेगी। ऐसे में तकनीकी तौर पर देखा जाए तो सरकार को पेश होने वाले अविश्वास प्रस्ताव से कोई ख़तरा नहीं है। इस सब के साथ एनडीए के पास लोकसभा में कुल 315 सांसद हैं।

Modi Cabinet

विपक्षी दलों की बात करें तो मौजूदा समय में लोकसभा में सबसे ज्‍यादा 48 सीटें कांग्रेस के पास हैं। अविश्‍वास प्रस्‍ताव लाने वाली टीडीपी के पास 16 सीटें हैं, जबकि जेडीएस के 1, एनसीपी के 7, आरजेडी के 4, टीएमसी के 34, सीपीआईएम के 9, सपा के 7 सदस्य हैं। इसके अलावा आम आदमी के 4, टीआरएस के 11, वाईएसआर कांग्रेस के 4, एयूडीएफ के 3 और बीजेडी के 20 सदस्य हैं। इन्हें मिला लेते हैं फिर भी 268 के आंकड़े को छू नहीं पा रहे हैं। इस तरह साफ है कि सदन में अविश्वास प्रस्ताव का औंधे मुंह गिरना तय है।

congress dinner

मॉनसून सत्र में लोकसभा में भाजपा सरकार के खिलाफ अविश्‍वास प्रस्‍ताव को स्‍पीकर की मंजूरी मिलने के बाद सोनिया गांधी ने नंबर का गेम खेला है। मीडिया से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा है कि कौन कहता है कि हमारे पास नंबर नहीं है। संख्या बल के दम पर भले ही सरकार आश्वस्त दिख रही हो पर सोनिया गांधी ने अपने बयान से सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश की है। लेकिन सोनिया गंधी को भी लगने लगा है कि विपक्ष का यह कदम कहीं सरकार को जनता के बीच अपनी बात रखने का मौक दे देगी।

भाजपा को क्यों लगता है विपक्ष ने खुद मार ली अपने पैर पर कुल्हाड़ी

भाजपा को लगता है यह मौका होगा सरकार का रिपोर्ट कार्ड संसद के माध्यम से देश के सामने रखने का। बजट सत्र का दूसरा हिस्सा अविश्वास प्रस्ताव के मुद्दे पर ही ठप हो गया था, लेकिन इस बार सरकार पहले ही दिन मान गई। इसके पीछे कुछ खास वजह है। सबसे बड़ी यह कि भाजपा चुनावी मोड में आ गई है।

अमित शाह का मानना था कि अविश्वास प्रस्ताव का इस्तेमाल विपक्षी एकता की हवा निकालने और जनता के सामने सरकार की कामयाबियां गिनाने के लिए करना चाहिए। पिछली बार कांग्रेस-टीडीपी के अविश्वास प्रस्ताव के समर्थन में देर से मैदान में आई, लेकिन इस बार पहले ही दिन से साथ थी इसलिए प्रस्ताव के पक्ष में जरूरी पचास से अधिक सांसद थे। लिहाजा यह प्रस्ताव मान लिया गया।Narendra Modi Rahul Gandhi Amit Shah

इसके साथ भाजपा की कोशिश विपक्षी एकता में सेंध लगाने की है। वह चाहती है कुछ विपक्षी सांसद वैसे ही खुल कर बगावत कर दें जैसी उन्होंने उपराष्ट्रपति चुनाव में की थी। तो सवाल यह है कि जब अंकगणित पूरी तरह से भाजपा के पक्ष में है तब विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव लाकर क्या हासिल करना चाहता है?

टीडीपी सांसद भी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव से नाखुश

तेलगु देशम पार्टी के सांसद जेसी दिवाकर रेड्डी ने अपनी ही पार्टी द्वारा नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ लोकसभा में लाये गये अविश्वास प्रस्ताव से दूरी बना ली है। उन्होंने कहा कि वे संसद के सत्र में इस दौरान शामिल नहीं होने जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि आप इसे पार्टी विह्प का उल्लंघन कह सकते हैं, लेकिन मैं केंद्र और अपनी टीडीपी सरकार से ऊब चुका है। उन्होंने यह भी कहा कि वे पूरे राजनीतिक सिस्टम से उब चुके हैं।

अविश्वास प्रस्ताव को लेकर कांग्रेस में ही है फूट

ऐसे में अविश्वास प्रस्ताव को मॉनसून सत्र के पहले दिन ही नोटिस कर लेना और चर्चा और वोटिंग का दिन भी तय कर देने से ऐसा लगने लगा है कि कहीं पीएम मोदी के ‘ट्रैप’ में विपक्ष फंस तो नहीं गया।

sonia gandhi and rahul gandhi congress

अविश्वास प्रस्ताव की टाइमिंग के पक्ष में कांग्रेस के एक धड़े का मानना है कि यदि यह मोदी सरकार का अंतिम संसदीय सत्र हुआ तो विपक्ष इस मौके से चूक जाएगा कि सरकार बिना अविश्वास प्रस्ताव के कार्यकाल पूरी नहीं कर पाई। इसका मानना है कि यह रिकॉर्ड में रहना चाहिए कि मौजूदा सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया था। इस तर्क के पीछे मंशा है कि बहस की मीडिया कवरेज से मोदी सरकार के खिलाफ मुद्धों को जनता के बीच ले जाने का मौका मिलेगा। वहीं विपक्ष एक साथ इकट्ठा होगा। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी अपने सहयोगियों और बाकी दलों को मनाने के लिए जद्दोजहद करना पड़ेगा।

sonia gandhi and rahul gandhi congress

जबकि अविश्वास प्रस्ताव की टाइमिंग के विरोध में कांग्रेस के एक धड़े का मानना है कि विपक्ष मोदी सरकार के ट्रैप में आ गया। कई कांग्रेसी नेता मानते हैं कि शुक्रवार शाम को प्रस्ताव पर वोटिंग से पहले प्रधानमंत्री मोदी अपना भाषण लोकसभा में देंगे। शनिवार-रविवार को सप्ताहांत के चलते मीडिया में छाये रहेंगे और भाजपा इसके जरिए नैरेटिव खड़ा करने मे कामयाब हो सकती है। कांग्रेस के इस धड़े मानना है कि संसद सत्र के पहले हफ्ते ही प्रधानमंत्री मोदी को मंच देकर गलती की गई। क्योंकि अविश्वास प्रस्ताव पर सहमति के चलते सदन में पहले ही दिन सरकार अपने कई बिल पास कराने मे कामयाब हो गई। अगर इस प्रस्ताव पर सहमति जतानी भी थी तो सत्र के अंतिम दिनों में जतानी थी। शायद विपक्ष को उम्मीद ही नहीं थी कि सरकार पहले दिन ही अविश्वास प्रस्ताव पर मान जाएगी।

क्या होता है अविश्वास प्रस्ताव?

अविश्वास प्रस्ताव लोकसभा (केंद्र सरकार) या विधानसभा (राज्य सरकार) में विपक्षी पार्टी लाती है। विपक्षी पार्टी यह तब लाती है जब उसे लगता है कि सरकार के पास सदन चलाने के लिए पर्याप्त बहुमत नहीं या सदन में सरकार विश्वास खो चुकी है। इस प्रस्ताव को लाने के लिए कम से कम 50 सदस्यों का समर्थन चाहिए। अब जबकि इसे मंज़ूरी मिल गई है तो सत्ताधारी पार्टी को साबित करना होगा कि उन्हें सदन में ज़रूरी समर्थन हासिल है।parliament

अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के बाद इस पर वोटिंग होगी और फ़ैसला साधारण बहुमत से तय होगा। अगर सदन ने इसके समर्थन में वोट दे दिया तो सरकार गिर जाएगी। यानी मोदी सरकार के बने रहने के लिए अविश्वास प्रस्ताव का गिरना ज़रूरी है।

अब तक कुल कितने प्रस्ताव?

अब तक विभिन्न मौकों पर कुल 26 अविश्वास प्रस्ताव लोकसभा में आ चुके हैं। शुक्रवार को मोदी सरकार के खिलाफ लाए जाने वाले अविश्वास प्रस्ताव के साथ अब तक के अविश्वास प्रस्ताव की संख्या कुल 27 हो जाएगी।

पहला प्रस्ताव

समाजवादी नेता आचार्य कृपलानी ने 1963 में जवाहर लाल नेहरू सरकार के खिलाफ भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में पहला अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था। भले ही यह अविश्वास प्रस्ताव 347 मतों से गिर गया था और सरकार पर कोई असर नहीं हुआ लेकिन इसके साथ ही देश में अविश्वास प्रस्ताव का इतिहास शुरू होता है।

सबसे ज्यादा किसके खिलाफ प्रस्ताव?

सबसे ज्यादा अविश्वास प्रस्ताव का रेकॉर्ड इंदिरा गांधी सरकार के नाम है जिसके कार्यकाल में 15 बार प्रस्ताव पेश किया गया। 1966 से 1975 के बीच 12 बार और 1981 एवं 1982 में तीन बार उनके खिलाफ प्रस्ताव पेश किया गया।

कितनी बार सरकारें गिरीं

अब तक सिर्फ तीन बार 1990 में वी.पी.सिंह सरकार, 1997 में एच.डी.देवेगौड़ा सरकार और 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पास हो गया और सरकार गिर गई।

7 नवंबर 1990 को वी.पी.सिंह ने उस समय विश्वास प्रस्ताव पेश किया था जब भाजपा ने उनसे समर्थन वापस ले लिया था। सरकार के पक्ष में 152 वोट पड़े थे और खिलाफ 356। इस तरह सरकार गिर गई थी।

11 अप्रैल, 1997 को देवेगौड़ा सरकार विश्वास मत हासिल करने में नाकाम रही थी। सरकार के पक्ष में 190 और खिलाफ में 338 वोट पड़े थे।

17 अप्रैल 1999 को अटल बिहारी वाजपेयी सरकार सिर्फ एक वोटों से हार गई थी। सरकार के पक्ष में 269 वोट पड़े थे जबकि खिलाफ 270।

आखिरी बार

आखिरी बार अविश्वास प्रस्ताव 2003 में सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली तत्कालीन एनडीए सरकार के खिलाफ पेश किया था। यह अविश्वास प्रस्ताव बुरी तरह नाकाम रहा था क्योंकि सरकार के पक्ष में 325 वोट पड़े थे और खिलाफ 212 वोट।

अविश्वास प्रस्ताव से पहले इस्तीफा

तीन मौके ऐसे भी आए हैं जब प्रधानमंत्री ने अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग या उसको लोकसभा में पेश करने से पहले ही इस्तीफा दे दिया।

जुलाई 1979 में कांग्रेस लीडर वाई.वी.चाह्वान ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारीजी देसाई के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था। वोटिंग से पहले ही मोरारीजी ने इस्तीफा दे दिया था। देसाई सरकार में अटल बिहारी वाजपेयी और एल.के.आडवाणी मंत्री थे।

जब कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया था तो 20 अगस्त, 1979 को चौधरी चरण सिंह ने प्रस्ताव पेश किए जाने से पहले ही इस्तीफा दे दिया था।

तीसरा मौका 1996 में आया। 28 मई, 1996 को अटल बिहारी वाजपेयी ने अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान होने से पहले इस्तीफा दे दिया था क्योंकि बीजेपी के पास पर्याप्त संख्याबल नहीं था।

इनके खिलाफ भी आया था अविश्वास प्रस्ताव

भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुरी शास्त्री के खिलाफ तीन बार पहला 1964 में और 1965 के दौरान दो अविश्वास प्रस्ताव लाए गए थे।

1987 में राजीव गांधी सरकार के खिलाफ भी अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था लेकिन ध्वनि मत से उस प्रस्ताव को हरा दिया गया था। पी.वी.नरसिम्हा राव के कार्यकाल में तीन बार प्रस्ताव पेश किया गया।

अब तक लोकसभा में 13 बार अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा हुई है जिनमें पांच प्रधानमंत्रियों को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा है।