सोमनाथ चटर्जीः एक ऐसे भावुक कम्युनिस्ट नेता जिसने हमेशा दिल की सुनी

Written by: August 13, 2018 3:14 pm

नई दिल्ली। सोमनाथ चटर्जी का निधन सोमवार को कोलकाता के एक अस्पताल में हुआ। वह 89 वर्ष के थे। दस बार लोकसभा के सांसद रहे चटर्जी माकपा की केंद्रीय समिति के सदस्य थे। वह 1968 में माकपा में शामिल हुए थे। वह वर्ष 2004 से 2009 तक लोकसभा के अध्यक्ष रहे। सोमनाथ लेफ्ट के ऐसे पहले नेता रहे जिन्हें संवैधानिक पद पर साल 2004 में बिठाकर लोकसभा का अध्यक्ष बनाया गया था।   somnath chatterjee

सोमनाथ चटर्जी का जन्म 25 जुलाई 1929 को बंगाली ब्राह्मण निर्मल चंद्र चटर्जी और वीणापाणि देवी के घर में असम के तेजपुर में हुआ था। उनके पिता एक प्रतिष्ठीत वकील, और राष्ट्रवादी हिंदू जागृति के समर्थक थे। उनके पिता अखिल भारतीय हिंदू महासभा के संस्थापकों में से एक थे। सोमनाथ चटर्जी की शिक्षा-दीक्षा कलकत्ता और ब्रिटेन में हुई। उन्होंने कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज में भी पढ़ाई की। उन्होंने ब्रिटेन में मिडिल टैंपल से लॉ की पढ़ाई करने के बाद कलकत्ता हाईकोर्ट में प्रैक्टिस की। इसके बाद उन्होंने राजनीति में आने का फैसला किया। सामनाथ चटर्जी एक प्रखर वक्ता के रूप में भी जाने जाते हैं।

हाईकोर्ट के जाने-माने वकील बने चटर्जी

सोमनाथ चटर्जी ने अपने पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट के जानेमाने वकील बने। उनके पिता अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के निष्ठावान सदस्य थे। लेकिन, स्वर्गीय ज्योति बसु से प्रभावित चटर्जी ने उसके धुरविरोधी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्कवादी) सीपीएम से जुड़ गए।

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वकील के तौर पर चटर्जी ने बिना किसी फीस के कई कॉमरेडों की कानूनी लड़ाई लड़ने में मदद की। उनकी वाकपटुता, उदारता और संवेदनशीलता के चलते इस कदर लोकप्रियता बढ़ गई कि उन्हें लोकसभा का टिकट दिया गया और उसके बाद सीपीएम की सर्वोच्च केन्द्रीय समिति का सदस्य बनाया गया।

चटर्जी लोकसभा की जानी मानी आवाज थे। उनकी कानूनी शिक्षा के चलते भाषण काफी जोरदार हुआ करता था। दस बार सांसद रहे चटर्जी ने दशकों तक दिल्ली की सत्ता के गलियारों में अपने समय व्यतीत किए। लेकिन, वह खुलकर हिंदी नहीं बोल पाते थे। एक बार टीवी क्रू वाले उनके प्रेस कॉन्फ्रेंस में समय पर नहीं आ पाने के बाद संसद भवन के टॉप फ्लोर पर पार्टी कार्यालय में पहुंचा। जिसके बाद सोमनाथ ने दोबारा बोलने से पहले गुस्से में झाड़ लगाते हुए कहा- अभी अभी जब नीचु में बोला था, तो कोथय था?

वह 2003 की गर्मी का महीना था। अटल बिहारी वाजपेयी की नेतृत्ववाली बीजेपी अपने आपको अजेय मान रही थी और कोई भी विपक्षी दल इस स्थिति में नहीं थी कि वह भगवा के कदम को रोक सके। चटर्जी ने उस वक्त तत्कालनी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिलना का फैसला किया। वह कभी भी सीनियर कॉमरेडों से सलाह लेने से कतराते थे और ना उन्होंने गांधी से एप्वाइंटमेंट लिया। उस समय कई विपक्षी नेता राजनीतिक वार्ता के लिए सोनिया गांधी से बातचीत कतराते थे। चटर्जी ने एक बार संवाददाता से कहा- “मैने उनसे कहा कि लोग आपसे मिलने से डरते हैं। वह हंस पड़ीं और कहा कि उन्हें नहीं याद है कि किसी ने उनके ऑफिस में एप्वाइंट मांगा हो।”

जब सोमनाथ को पार्टी ने दिखाया था बाहर का रास्ता

1971 से लेकर उन्होंने सभी लोक सभाओं में एक सदस्य के रूप में निर्वाचित होकर सेवा की है। साल 2004 में 14वीं लोक सभा में वे 10वीं बार निर्वाचित हुए। साल 1989 से 2004 तक वे लोक सभा में सीपीआईएम के नेता भी रहे। उन्होंने लगभग 35 सालों तक एक सांसद के रूप में देश की सेवा की। इसके लिए उन्हें साल 1996 में उत्कृष्ट सांसद पुरस्कार से नवाजा गया। चटर्जी माकपा के टिकट पर लोकसभा के लिए 10 बार चुने गये। उनके संसदीय सफर की शुरुआत 1971 में हुई जब उन्होंने पश्चिम बंगाल के वर्धमान सीट पर माकपा के समर्थन से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत हासिल की थी। वह सीट उनके पिता के निधन के बाद खाली हुई थी। उन्हें अपने जीवन में सिर्फ एक बार पराजय का सामना करना पड़ा, जब 1984 में ममता बनर्जी ने उन्हें हरा दिया था। ममता बनर्जी इसी जीत के साथ भारतीय राजनीति में उभरीं। चटर्जी 1989 से 2004 तक लोकसभा में माकपा के नेता थे।somnath chatterjee

वर्ष 2008 में भारत-अमेरिका परमाणु समझौता विधेयक के विरोध में सीपीएम ने तत्कालीन मनमोहन सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। तब सोमनाथ चटर्जी लोकसभा अध्यक्ष थे। पार्टी ने उन्हें स्पीकर पद छोड़ देने के लिए कहा लेकिन वह नहीं माने। इसके बाद सीपीएम ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया।

सोमनाथ ने अपने राजनीतिक जीवन में सबसे मुश्किल चुनौतियों का सामना किया। इसी मामले पर सीपीएम के बॉस ने कहा कि चटर्जी को लोकसभ अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना चाहिए और 2008 में विश्वासमत के दौरान यूपीए सरकार के खिलाफ वोट करना चाहिए। उनके पसंदीदा सीपीएम नेता जैसे सीताराम येचुरी, बुद्धदेव भट्टाचार्य ने उन्हें पार्टी के आदेश मानने की सलाह दी। कुछ अन्य नेता जैसे मोहम्मद सलीम और नीलोत्पल बसु ने पार्टी को इस बात के लिए समझाने का प्रयास किया कि वह उन्हें अनावश्यक सज़ा ना दें। भावुक चटर्जी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने से इनकार कर दिया। उसके बाद अगले दिन यानि 24 जुलाई 2008 को प्रकाश करात के नेतृत्ववाले सीपीएम पोलित ब्यूरो ने उन्हें आजीवन पार्टी से निकाल दिया।

सरकारी खर्चे पर सांसदों का चाय-पानी कराया था बंद

सोमनाथ चटर्जी को हमेशा एक सख्त लोकसभा स्पीकर के रूप में याद किया जाएगा जिन्होंने अपने दिल की बात सुनने के लिए पार्टी लाइन से अलग हट गए। उनके जीवन की कई ऐसी बातें हैं जो कम लोगों को मालूम हैं और बहुत प्रेरणादायी भी हैं।somnath chatterjee

सोमनाथ चटर्जी राजनीति में पादर्शिता और सुचिता के हिमायती थे। जब वह लोकसभा स्पीकर बने तो उन्होंने सबसे पहले जो फैसला किया वो ये कि सरकारी खर्च पर सांसदों के चाय पानी पर पाबंदी लगाई जाए। वैसे तो उनके इस फैसले का भारी विरोध हुआ लेकिन उन्होंने इसकी परवाह नहीं की। बल्कि इससे आगे जाते हुए उन्होंने सांसदों पर ये भी दबाव बनाया कि वह विदेशी दौरों पर अपने परिवार का खर्च खुद उठाएं।

लोकसभा अध्यक्ष के रूप में व्यापक मीडिया कवरेज प्रदान करने हेतु सोमनाथ चटर्जी के प्रयासों से ही 24 जुलाई 2006 से 24 घंटे का लोकसभा टेलीविजन शुरू किया गया। उनके लोकसभा अध्यक्ष पर रहते हुए उनकी पहल पर ही भारत की लोकतांत्रिक विरासत पर अत्याधुनिक संसदीय संग्रहालय की स्थापना की गई। 14 अगस्त 2006 को इस संग्रहालय का उद्घाटन भारत के राष्ट्रपति के कर कमलों से किया गया। यह संग्रहालय जनता के दर्शन करने के लिए खुला है।

विरोधाभास के बाद भी अटल-आडवाणी की पसंद थे सोमनाथsomnath chatterjee

सोमनाथ चटर्जी को लोकसभा स्पीकर बनाए जाने का 2004 में कांग्रेस से सोनिया गांधी ने उनके नाम की पेशकश की थी तो कांग्रेस नेता प्रणव मुखर्जी ने उसका समर्थन किया था। वहीं भाजपा से पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने दूसरा प्रस्ताव दिया जिसका समर्थन भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने किया था। इनके अलावा अन्य बड़े-छोटे क्षेत्रीय दलों ने भी कॉमरेड चटर्जी को स्पीकर बनाए जानें का समर्थन किया और वह सर्वसम्मति से चौदहवीं लोकसभा के स्पीकर बने थे।