मधु से भयभीत है आधुनिक सभ्यता

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प्रकृति का अन्तस् मधुमय है लेकिन आधुनिक सभ्यता ‘मधु’ से भयभीत है। ‘चीनी कम’ ही आधुनिक सभ्यता है और शुगर फ्री उत्तर आधुनिकता। लेकिन केले, संतरे, आम, जामुन, सेब, अंगूर, महुआ के पेड़ आधुनिकता के साथ संगति नहीं करते। उनमें ग्लूकोज की खासी मात्रा है। फिर फलों का ग्लूकोज कोरी शक्कर नहीं होता। उसमें अन्य अनेक तत्व भी होते हैं। प्रकृति जो कुछ भी गढ़ती है, पूरे मन से गढ़ती है। वैज्ञानिकों ने फलों की शक्कर को ‘फ्रुक्टोज’ नाम दिया है। वनस्पतियां वैदिक ऋषियों की स्तुतियों को नहीं भूली। ऋषियों ने उनसे मधुमयता ही मांगी थी। वे मधुमय फल ही दे रही हैं। लेकिन वैज्ञानिक उन्हें भी ‘शुगर फ्री’ बनाने को बेताब हैं। वे ‘शुगर फ्री’आलू बना चुके हैं। मैं भयभीत हूं कि मधुमेही आधुनिकता फलों का मधु भी छीन सकती है? गेंहू जौ भी मीठे हैं। इनकी भी खैर नहीं। सेब, अंगूर, अंजीर, गेंहू, जौ भी शुगर फ्री हो गये तो हमारी मधुप्रीति का क्या होगा? मधुमक्खियां गीत गाती हैं।

Fibre-rich foods

ऋग्वेद के ऋषि ने उनके गायन की प्रशंसा की है। मधुरस में उनके गीत भी घुले रहते हैं। गीत काव्य वैसे भी मधुमय होते हैं। मधु से भयभीत आधुनिकता मधुगीतों की जगह ‘शुगर फ्री’कविता और गीतों का उत्पादन प्रारम्भ कर चुकी है। नया मनुष्य ‘शुगर फ्री’हो रहा है। मधुरसविहीन इस मनुष्य में मधुप्रीति है ही नहीं। आनंदरहित, मधुहीन, प्रीतिमुक्त सभ्यता का ही असली रूप नाम बाजार है।

गौओं का दूध मीठा है, भैस का दूध गाढ़ा है, लेकिन वह भी मीठा। बाजार ज्यादा दूध चूसने वाला इंजेक्शन लाया है। फलों सब्जियों को भी समय के पहले पका देने वाले रसायन बाजार में चालू हैं। समय चक्र उलट गया है। अब ‘कडुवा-कडुवा गप और मीठा थू’का चलन है। मैं गौओं को नमस्कार करता हूं। वे वैदिक अनुभूति और भारतीय प्रतीति में माता हैं। वे हमारा पोषण करती हैं। लेकिन हम उनका पोषण नहीं करते। वे हम सब की ओर टकीटकी लगाकर देख रही हैं। उनका उदास निहारना भीतर तक आहत करता है। उनके संरक्षण का प्रश्न शेषनाग की तरह फन फैलाए फुफकार रहा है – कैसे हो पोषण संवर्द्धन गायों का? पदार्थवादी निरे उपयोगितावादी कहेंगे – बूढ़ी गायों का उपयोग ही क्या है? बुढ़ाते सब हैं। पेड़, पौधे, वनस्पतियां और हम, आप भी तो क्या बूढ़ों को अपना जीवन चक्र आनंदमगन पूरा करने का अधिकार नहीं है? संविधान निर्माताओं ने गोवंश संरक्षण को राज्य का ‘नीति निर्देशक तत्व’लिखा है।

आगेः मधुमयता मनुष्यता है

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