‘वायु घायल हैं, तो भी वे अपना कर्तव्य पालन कर रहे हैं’

Written by हृदय नारायण दीक्षित January 6, 2019 12:35 pm

वायु दिखाई नहीं पड़ते। ऋग्वेद के ऋषि को उनका ‘घोष’ सुनाई पड़ता है। लेकिन ऋषि उनका रूप नहीं देख पाते। गाते हैं – घोषा इदस्य श्रण्विरे न रूपम्। ठीक बात है। वायु सूक्ष्म है। उनका रूप है ही नहीं। कठोपनिषद् के ऋषि ने वायु रूप की अलग व्याख्या की कि वायु ही सभी रूपों में रूप रूप प्रतिरूप है – वायुर्थैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूवः। तैत्तिरीय उपनिषद् के ऋषि पहले वैदिक देवों को इन्द्र, बृहस्पति, वरूण आदि का स्मरण करते हैं। फिर ब्रह्म को नमस्कार कहते हैं।

अंत में कहते हैं “नमस्ते वायो। त्वमेव प्रत्यक्ष ब्रह्मसि” तुझे ही प्रत्यक्ष ब्रह्म कहूंगा। वायु परमशक्तिशाली है। जगत् व्यापी भी हैं। ब्रह्म उनमें प्रत्यक्ष होते हैं। पूर्वजों ने वायु का गुण स्पर्श बताया है। स्पर्श भी एक महत्वपूर्ण ज्ञान उपकरण है। वे घोष-ध्वनि करते हुए प्रवाहमान है। ध्वनि और स्पर्श से ही हम उन्हें जान पाते हैं। लेकिन हमारा मन करता है कि मैं उन्हें देखूं। थोड़ा नहीं जी भर के देखूं। वे भारतीय चिन्तन के 5 महाभूतों में से एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक घटक है। वायु प्राण है। प्राण नहीं तो जीवन नहीं। जीवन को भरपूर देखते हुए वायु को भी देखा जा सकता है।

हम आधुनिक लोगों ने वायु को दूषित किया है। वायु की काया चोटहिल है। भारत की राष्ट्रीय राजधानी में नाक के ऊपर छिद्रयुक्त पट्टी बांधे हुए अनेक लोग दिखाई पड़ते हैं। वायु घायल हैं तो भी वे अपना कर्तव्य पालन कर रहे हैं। लेकिन हम अपने कर्तव्यबोध से दूर हैं। ताप का घटना शीत है और ताप का बढ़ना ग्रीष्म। वायु देवता शीत और ताप दोनो को ढोते हैं। जान पड़ता है कि उनकी देह पर कड़ाके की ठंढ का प्रभाव नहीं पड़ता।

वे लू के थपेड़ों को भी सह लेते हैं। गर्मी में बेशक वे कभी कभी आराम करते जान पड़ते हैं। तब उमस हो जाती है। विश्राम के बाद वे अधूरा काम कम समय में ही कर लेने की तत्परता में होते हैं। तब आंधी आती है। वैदिक पूर्वज जल और वायु दोनो को ही बहुवचन रूप में याद करते हैं।

ऋग्वेद में जल ‘आपः मातरम’ हैं। जल माता नहीं जल माताएं हैं। इसी तरह वायु को ‘मरूद्गण’ कहा गया है। मन प्रश्न करता है कि वायु का जन्म कब और कैसे हुआ होगा? ऋग्वेद (7वे मण्डल) में इस जिज्ञासा के साथ निश्च्छल स्थापना है कि वे स्वयं ही अपने जन्म के बारे में जानते हैं। ठीक है कि वायु नहीं दिखाई पड़ते लेकिन मैंने वायु को बहत हुए देखा है।

मैंने अपने बचपन में अपनी सई नदी के तट पर प्रसन्न मन बन बबूल व आम, पलाश के पेड़ो को नृत्यमगन देखा है। मैंने वनस्पतियों के नर्तन के मध्य उपस्थित वायु को ही नृत्य निदेशक की भूमिका में देखा है। कड़ाके की ठंढ में वायु झोंको के साथ स्वयं को थर-थर कांपते हुए मैंने देखा है। तब हमारी कंपकंपी के कर्ताधर्ता वायु थे। मैंने वायु को ही भारी उमस के बीच स्वयं को सहलाते हुए भी देखा है। उन्होंने मुझे प्यार से स्पर्श किया है। वह स्पर्श अभी भी ताजा हैं
बादल आते रहे हैं हर बरस। कभी कभी धरती तक। वे घनश्याम भिन्न भिन्न रूपों में गतिशील रहते हैं। हमने हंसते मुस्कराते बादलों को वायु द्वारा इधर उधर फैलाते देखा है।

हमने गहन काले, काजल जैसे बादलों को अपनी आखों में सुअंजन बनते अनुभव किया है। कवि का मन प्रश्न रस में डूबता है। आयो कहां से घनश्याम? वे घनश्याम आते हैं वायु के प्रभाव, दबाव में लेकिन हमारे अंतस् के भाव जगाते रहते हैं। हमारे पूर्वज कालिदास ने मेघ से मालवा के रामगिरि से विंध्याचल की ओर जाने का आग्रह किया है पर मेघ उसी दिशा में बहती वायु के बिना जाएगा कैसे? संदेश सहित सदेह जाते इस मेघ-दूत को पहले रेवा नदी और फिर वेगवती बेतवा मिलती है। बेतवा की प्रकृति नाचना है। नदियां भारत का मन स्पंदन है।

कालिदास ने मेघदूत को उज्जयिनी के निकट प्रवाहित सिप्रा नदी का परिचय कराया है। यही महाकाल का विश्वप्रसिद्ध मंदिर है। समस्त अस्तित्व को भीतर से सक्रिय रखने वाले और बाहर से भी आच्छादित करते हुए वे महाकाल परिवर्तन के महादेव है। उन्हें मंदिर में स्थापित करने का पूर्वज प्रयत्न रोमांचकारी है।

वायु सबकी है। सब वायु के हैं। वायु किसी की संपदा नहीं। परमशक्तिमान देव हनुमान पवनपुत्र हैं। कालिदास के उज्जयिनी की नदी शिप्रा की वायु कमलगंध को दूर-दूर तक ले जाती है। कालिदास ने निश्चित ही वायु का यह रमणीय काम देखा होगा। कमलगंध का घनत्व कम होता है। गंध कम लेकिन प्रभाव बड़ा। कालिदास कमलप्रिय जान पड़ते हैं। मेघ कैलाश भेजा गया है। यहाॅं मानसरोवर है। कवि के अनुसार मानसरोवर में सुनहरे कमल दिखते हैं। इसी तरह अल्कापुरी के निकट बारहमासी कमल हैं। कालिदास के पूर्ववर्ती अथर्वा को भी कमलगंध प्रिय थी। उन्होंने अथर्वेद भूमि सूक्त में कमलगंध को भूमि की गुण संपदा बताया है “हे पृथ्वी माता! आपकी कमलगंध को देवताओं ने सूर्यपुत्री सूर्या के विवाह में फैलाया था।”

हमारा मन प्रश्न करता है कि कमलगंध दूर-दूर तक ले जाने वाले ये देवता कौन होंगे? वे यह काम क्यों करेेंगे? कालिदास ने इस जिज्ञासा का उत्तर अपनी तरफ से दे दिया है। यह शिप्रा नदी की वायु है जो कमलगंध को दूर-दूर तक ले जाती है। शिप्रा ही क्यों वायु प्रत्येक क्षेत्र की गंध दूर दूर तक ले जाती है।

सुनता रहा हूं कि देवों को गंध प्रिय है। मूर्ति उपासना के समय देवों को गंधयुक्त अगरबत्ती और पुष्पार्चन करते हैं। लेकिन वायु की बात ही दूसरी है वे गंध फैलाते हैं। पर्वत के पेड़ों वनस्पतियों की गंध मैदानी क्षेत्रों में लाते हैं। फूलों की घाटियों से ढेर सारी गंध उठाते हैं और सब तरफ फैलाते हैं। वे लदे फंदे रहते हैं गंध से। प्रकृति में सर्वत्र गंध हैं और इस गंध के संवाहक हैं वायु। कालिदास के मेघदूत की अपनी यात्रा में देवगिरि पर्वत मिलेगा। यहां मेघ जल बरसाते हैं। कवि के अुनसार जलरस से पृथ्वी आनंदित होकर सांस लेती है और गंध वायु में भर जाती है। वायु में गंध आपूरण की प्रकृति है।

मैंने वायु को प्रतिफल अनुभव में देखा हैं-प्रकृति के अणु परमाणु को हवा के संग-संग गाते नाचते पाया है। मैं महाकाल द्वारा गंगा व सई नाम की दो नदियों के बीच रहने को विवश किया गया हॅूं। सौभाग्यशाली हॅूं लेकिन रावी नदी की तरह गंगा व सई के तट से कमलगंध, पुष्पगंध, चंदनगंध नहीं बहती। तमाम औद्योगिक कारखानों के कचड़े की गंध ने हम सबको घेर लिया है। सब हमारे कर्मों का फल है। जो किया है, सो मिल रहा है। वायु देव हम सबको स्वस्थ रखना भी चाहें तो क्या करें?

वायु को अनुभव के प्रेम उपकरण देखा जाना चाहिए। भाषा मनुष्य का सृजन है। वाणी में वायु का चमत्कार है। यह वायु ही उच्चारण बनती है। मन वुद्धि सोचते हैं। कण्ठ और तालु के उपयोग में वायु संचार की स्थिति से वाक् निकलता है। संगीत के सृजन में वायु मुख्य नायक हैं। वायु बहते, चलते, रूकते प्रतिपल स्पंदित हैं। वे सारी दुनिया का भ्रमण करते हैं। वायु के लिए राष्ट्र राज्यों की सीमा व्यर्थ है। उन्हें किसी पासपोर्ट या वीजा की जरूरत नहीं है। वायुहीन अस्तित्व असंभव है। ऋग्वेद में नासदीय सूक्त के ऋषि ने सृष्टि सृजन की पूर्व दशा को वायुहीन बताया है ’अनादीवांत’ कहकर। लेकिन तब न सत् था, न असत्। न दिन और रात। तब क्या था?

इस प्रश्न का उत्तर महान वैज्ञानिक स्टीफेन हाकिंग्स खोज रहे थे। अभी पूरा उत्तर शेष है। इसका उत्तर भी संभवतः वायु दर्शन से ही संभव है। देखते और दर्शन में भारी अंतर है। देखने के प्रयास दर्शन तक की यात्रा करा सकते हैं। कैसा आश्चर्य है कि हम वायु स्पंदित होकर भी वायु को नहीं देख सकते हैं। हम वायु में है। वायु हममे हैं। वे हमारे अति आत्मीय हैं तो भी समझ से दूर हैं-तद् दूरे तद्वन्तिके।

Facebook Comments