प्राण नहीं तो जीवन नहीं

प्राण नहीं तो जीवन नहीं। संसार प्राणमय है। वैदिक साहित्य में प्राण की प्राणवान स्तुतियां हैं। प्रश्नोपनिषद् (2.5) में कहते हैं “ये प्राण अग्नि रूप में तपते हैं। यही सूर्य हैं। यही पर्जन्य – वर्षा के मेघ हैं। यही इन्द्र और वायु हैं। पृथ्वी रयिदेव-भौतिक संपदा है। सृष्टि का पूरा सत् या असत् जो कुछ है और जो अमृत है। वह सब भी प्राण ही है।” (वही 2.5) मुण्डकोपनिषद् (1.8) में कहते हैं कि “तप से ब्रह्म वृद्धि प्राप्त करते हैं। इससे अन्न उत्पन्न होते हैं – ततो अन्नम् अभिजायते। अन्न से प्राण, मन, फिर सत्य अर्थात 5 महाभूत पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश सभी प्राणियों के लोक व कर्म पैदा होते हैं।” यहां प्राण का क्रम अन्न के बाद है। प्राण से पहले अन्न है, उसके पहले ब्रह्म। ब्रह्म भी तप के कारण वृद्धि पाते हैं। यहां अन्न और प्राण के जन्म का कारण ब्रह्म का तप है लेकिन इसी उपनिषद् (मुण्डक0 3.1.4) में कहते हैं कि यह प्राण ही सब भूतों द्वारा प्रकाशित हो रहा है। जो यह बात जानते हैं वे अभिमानपूर्वक बढ़ चढ़ कर अतिवाद की बात नहीं करते।” विनम्रता ज्ञान का परिणाम होती है। प्राण का बोध अज्ञान काटता है। ज्ञानी अतिवादी नहीं हो सकते। पिप्पलाद प्राण को सर्वस्व बताते हैं। आगे (प्रश्नोपनिषद् 2.6) कहते हैं “रथ की नाभि में जैसे अरे होते हैं वैसे ही प्राण में ऋग्वेद की ऋचाएं, यजुष के मंत्र, व सामवेद के गान, यज्ञकर्ता और समस्त विद्वान व पराक्रमी प्राण के आधार से ही जुड़े हुए हैं।” उपनिषद् के रचनाकाल में ऋक्, यजुष व साम की महत्ता थी। स्वाभाविक ही यहां उनके ही प्रतीक दिए गए हैं।प्रकृति की शक्तियों का रहस्य जानना और उनसे अनुराग रखना प्राचीन भारतीय प्रज्ञा की विशेषता है। प्राण की शक्ति और व्यापकता जानने के बाद स्तुति स्वाभाविक हैं। वैसे स्तुतियों से प्रकृति की शक्ति या देवता को कोई लाभ नहीं होता। इससे स्तोता के मनोभाव बदलते हैं। वेदों के अधिकांश मंत्र स्तुतियां ही हैं। उनमें जीवन जगत् व इतिहास के तमाम सूत्र हैं। प्रश्नोपनिषद् (2.8 से 2.13) में प्राण की सुंदर स्तुतियां हैं “हे प्राण तू ही प्रजापति है। तू ही गर्भ में आता है। तू ही संतान रूप में जन्म लेता है। संसार के सभी प्राणी तुझे भेंट देते हैं। तू ही प्राणियों के प्राणों में प्रतिष्ठित रहता है। तू ही देवों तक हविष्य ले जाने वाला अग्नि पितरों की प्रथम स्वधा है। अथर्वा अंगिरा आदि ऋषियों द्वारा आचरित अनुभूत सत्य तू ही है। तू सभी तेजो से सम्पन्न इन्द्र है। प्रलयकाल में सबका संहारकर्ता रूद्र तू ही है, तू ही रक्षक भी है। तू अंतरिक्ष तक विचरणशील है। सभी ज्योतियों का स्वामी सूर्य भी है। तू मेघ बनकर वर्षा करता है। सारी प्रजा अन्न उत्पादन की अभिलाषा के आनंद से भर जाती है। तू संस्कार रहित होकर भी एकमात्र ऋषि कवि है। हम सब तेरे लिए तमाम सामग्री भेंट करते हैं तू ही उन्हें स्वीकार करने वाला है। तू ही जगत् का स्वामी है। हमारा माता पिता भी हैं।” यहां खूबसूरत सर्वात्मवाद है। प्रकृति की शक्तियों के नाम भिन्न है लेकिन सब एक हैं।

प्राण को सर्वाधार बताया गया है लेकिन उसे संस्कार रहित भी कहा गया है। संस्कार वस्तुतः मनुष्य का गुण है। शरीरी का चरित्र संस्कार के अनुशासन में आदर योग्य बनता है। प्राण स्वयं शरीर नहीं है। वह सभी शरीरों का धारक है। शरीर के मन और बुद्धि ही संस्कार पाते या खोते हैं। प्राण मन और बुद्धि के अनुशासन में नहीं होते। प्रश्नोपनिषद् (2.12) में आगे कहते हैं “हे प्राण! जो आपका स्वरूप मेरी वाणी में है, जो सुना या देखा जाता है, जो हमारे मन में है, जो हमारे अन्तःकरण में है, उसे कल्याणकारी बनाओं।” यहां यजुर्वेद के शिव संकल्प सूक्त की अनुगूंज है। इस सूक्त में इधर उधर भागते मन को शिव संकल्प – कल्याणकारी वृत्ति से भरने की प्रार्थना है। उपनिषद् में भी मन को शिव बनाने की स्तुति है। साथ में प्राण से नेह न छोड़ने की प्रार्थना भी है। आगे कहते हैं, “यह सब प्रत्यक्ष संसार और अन्य लोक प्राण के अधीन हैं। जैसे माता अपने पुत्र की रक्षा करती है वैसे ही प्राण हमारी रक्षा करें। हमको धारण किए रहे, हमें यश व बुद्धि से युक्त करें।” प्राण को अनेक आयामों में देखना, अन्तर्जगत का भाव बनाना ध्यान देने योग्य है। भावजगत में अवस्थित विचार या प्रत्यय अंततः संकल्प बनते हैं। संकल्प में आए विचार कर्म की प्रेरणा बनते हैं और तब बड़े से बड़े कार्य भी आसानी से कर लिए जाते हैं। 

भारतीय तर्क प्रणाली और दर्शन में प्रत्येक उपलब्ध तत्व का कारण हेतु जानने की परंपरा है। प्राण सर्वस्व है। इतना पर्याप्त नहीं है। जिज्ञासा और भी है। प्रश्नोपनिषद् (3.1) के अनुसार प्राण से जुड़े पूरक प्रश्न कौशल निवासी आश्वलायन ने पूछे। अब तक हुआ प्रश्नोत्तर भार्गव व पिप्पलाद के मध्य था। प्रश्न पूछने की बारी आश्वलायन की। उन्होंने पूछा, “प्राण किससे उत्पन्न होता है? वह मनुष्य शरीर में कैसे प्रवेश करता है? स्वयं को शरीर के भीतर कैसे विभाजित करता है? शरीर को किस प्रकार छोड़ता है? और नए शरीर में कैसे प्रवेश करता है? भौतिक जगत् को कैसे धारण करता है? मन, इन्द्रिय आदि आन्तरिक तंत्र को किस प्रकार धारण करता है?” यहां मनुष्य के बाह्य और आंतरिक प्रपंचों से जुड़े 7 आधारभूत प्रश्न हैं। हम सबके मन में भी ऐसे ही या इनसे जुड़े तमाम प्रश्न उठते हैं। आधुनिक विज्ञान में ऐसे कुछ प्रश्नों के उत्तर हैं लेकिन गौरव की बात है कि ढाई हजार वर्ष पहले ही हमारे पूर्वज ऐसे प्रश्नों से मुठभेड़ करते थे। इस प्रश्नोत्तर को आधुनिक विज्ञान से जोड़कर समझने में आनंद आ सकता है। प्रश्नोपनिषद् रम्य है। इसके भीतर से गुजरना उत्तर वैदिक काल के प्रश्न प्रहर में प्रवेश करने जैसा विस्मयकारी आनंद है।

प्रश्न हमारी संपदा है। सभी प्राणी प्रश्न नहीं करते। प्रकृति ने यह गौरव मनुष्य को ही दिया है। संभव है कि मनुष्येतर प्राणी भी प्रश्नाकुल होते हों लेकिन उनकी प्रश्न जिज्ञासा शारीरिक आवश्यकताओं तक ही सीमित रहती है जैसे कुत्तों के मन में प्रश्न उठते होंगे? कि भोजन कहां है? क्या यहां हम सुरक्षित हैं? सुरक्षा का प्रश्न सभी प्राणियों के भीतर होता ही है। मनुष्यों के चित्त में उठने वाले प्रश्न व्यापक होते हैं। बहुत मनुष्य प्रत्यक्ष के साथ अप्रत्यक्ष के प्रति भी जिज्ञासु रहते हैं। लेकिन तमाम मनुष्य ऐसे प्रश्नों से दूर रहते हैं। वे भी भोजन की तैयारी, बिजली के बिल आदि से जुड़े प्रश्नों तक सीमित रहते हैं लेकिन प्रश्नोपनिषद् में उल्लिखित आश्वालायन विचित्र प्रश्नकर्ता हैं। पिप्पलाद ने कहा “तुम अतिप्रश्न पूछ रहे हो।” (वही 3.2) उत्तर वैदिक काल भारतीय राष्ट्रीय जीवन का प्रश्न काल है। जान पड़ता है कि तब प्रश्न की ही खेती होती थी। प्रश्न ही बीज थे और बीज भी प्रश्नाकुल थे। पत्तियां और कली फूल भी प्रश्न का विषय थी। क्या वे भी प्रश्नाकुल थीं? उनका सूर्य की ओर देखना, ऊर्ध्वगामी होना प्रश्नाकुलतना नहीं तो है क्या? तब मरूद्गण भी प्रश्नाकुल थे? पर्जन्य मेघ भी प्रश्न पूछते धरती पर उतरते थे – क्या इस जलराशि का संचय मनुष्य जाति करेंगी? माता पृथ्वी तभी से प्रश्नाकुल हैं उसके प्रश्नों के उत्तर आधुनिक समाज को ही देने हैं।

उपनिषद् प्रश्न व्याकुलता का ही अमृत फल हैं। तब प्रश्न थे। प्रश्न उत्तर से जन्मे प्रतिप्रश्न थे? अनुपूरक प्रश्न थे और अतिप्रश्न भी थे। पिप्पलाद ने प्रश्नकर्ता पर अतिप्रश्न का आरोप लगाया और कहा कि अतिप्रश्न पूछने के बावजूद तुम वेद – तत्व को जानने वाले हो। इसलिए मैं तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर दूंगा।” (वही 3.2) ठीक ऐसी ही बात कठोपनिषद् के यम नचिकेता प्रश्नोत्तरों में भी है। नचिकेता के प्रश्नों से परेशान यम ने कई प्रश्नों का उत्तर देने से मना किया। प्रलोभन प्रस्ताव किये। नचिकेता ने प्रश्नों के उत्तर का आग्रह किया। यम ने कहा कि नचिकेता तुम श्रेष्ठ प्रश्नकर्ता हो, हमें ऐसे ही प्रश्नकर्ता मिला करें तो शुभ होगा। उपनिषद् के रचनाकाल में प्रश्न पूछना शुभ कर्म था। पिप्पलाद ने उत्तर दिया “यह प्राण आत्मा से उत्पन्न होता है। जिस तरह किसी व्यक्ति की छाया उसके होने पर ही रहती है, उसी तरह प्राण भी आत्मा पर आश्रित हैं और इस शरीर में मनसंकल्प से आता है।” (वही 3.3) पहले प्राण को सर्वस्व बताया फिर आत्मा से प्राण की उत्पत्ति। यहां प्राण स्वतंत्र नहीं है। वह मनसंकल्प के प्रभाव में शरीर में प्रवेश करता है। आत्मा को लेकर तमाम मतभेद रहे हैं। गीता में यह अविनाशी है, जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को बदल देता है वैसे ही आत्मा नए शरीर धारण करती है। प्रश्नोपनिषद् में प्राण नए शरीर धारण करता है आत्मा प्राण को जन्म देकर तटस्थ रहती है। प्राण कर्म मन संकल्प के प्रभाव में नए शरीर धारण करता है। जो भी हो प्रश्नों की यात्रा का अपना आनंद है।

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