16 जुलाई 2019 खण्डग्रास चंद्रग्रहण

ग्रहण के समय में अपने इष्ट देव के मंत्रों का जाप करने से सिद्धि प्राप्त होती है।कुछ लोग ग्रहण के दौरान भी स्नान करते हैं। ग्रहण समाप्त हो जाने पर स्नान करके ब्राह्‌मण को दान देने का विधान है।।

Written by पंडित दयानन्द शास्त्री July 8, 2019 6:52 pm

(ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री)

इस वर्ष 2019 में दिनांक 16 जुलाई को गुरू पूर्णिमा के पावन पर्व पर चंद्र ग्रहण होने जा रहा है।

जिस जातक की जन्म कुंडली मे ग्रहण योग है अर्थात चंद्र के साथ राहु है ऐसे जातक को मानशिक परेशानी हो सकती है,

चंद्र ग्रहण को कभी नही खुली आँखों से नही देखना चाहिए और न ही ग्रहण काल मे चंद्र की छाया शरीर पर पड़नी चाहिए,

ओम नमः शिवाय का जाप करे, ईश्वर कल्याण करे।

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आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा ( गुरु पूर्णिमा ) दिन – मंगलवार

की मध्य रात्रि में खण्डग्रास चंद्रग्रहण लगेगा।

यह ग्रहण सम्पूर्ण भारत मे खण्डग्रास रूप में दिखाई देगा।

सूतक – शाम 4.32 से

ग्रहण – रात्रि 1.32 से ( 17 ता. की AM)

मोक्ष – रात्रि 4.30 (17 ता. की AM)

पिछले साल की तरह इस बार भी गुरु पूर्णिमा के दिन चंद्र ग्रहण लगेगा ,आज के दिन गुरु पूर्णिमा पर्व प्रातः 4 बजे से सायं 4.30 बजे तक मनाया जाएगा।

गुरु पूर्णिमा के दिन लगने वाले साल के दूसरे चंद्र ग्रहण को भारत में भी देखा जा सकेगा. भारत में करीब 3 घंटे तक चंद्र ग्रहण दिखाई देगा ।

16 जुलाई 2019 की रात करीब 1.32 बजे खग्रास चंद्र ग्रहण की शुरुआत होगी और करीब डेढ़ घंटे के बाद इसका मध्य होगा और सुबह 4.30 बजे चंद्र ग्रहण का मोक्ष होगा ।

चंद्र ग्रहण मंगलवार और उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में पड़ रहा है। इसके प्रभाव से राजनीतिक उथल-पुथल के साथ ही प्राकृतिक आपदा की स्थिति बन सकती है।

पुराणों की मान्यता के अनुसार राहु चंद्रमा को तथा केतु सूर्य को ग्रसता है। ये दोनों ही छाया की संतान हैं। चंद्रमा और सूर्य की छाया के साथ-साथ चलते हैं।

चंद्र ग्रहण के समय कफ की प्रधानता बढ़ती है और मन की शक्ति क्षीण होती है,

जबकि सूर्य ग्रहण के समय जठराग्नि, नेत्र तथा पित्त की शक्ति कमज़ोर पड़ती है।

ग्रहण में क्या करें-क्या न करे

ग्रहण की अवधि में तेल लगाना, भोजन करना, जल पीना, मल-मूत्र त्याग करना, केश विन्यास बनाना, रति-क्रीड़ा करना, मंजन करना वर्जित किए गए हैं।

ग्रहण काल या सूतक में बालक , वृद्ध और रोगी भोजन में कुश या तुलसी का पत्ता डाल कर भोजन ले सकते है।

ग्रहण काल या सूतक के समय किसी भी प्रतिष्ठित मूर्ति को नहीं स्पर्श करना चाहिए।

ग्रहण काल में खासकर गर्भवती महिलाओं को किसी भी सब्जी को नहीं काटना चाहिए और न ही भोजन को पकाना चाहिए।

गर्भवती स्त्री को सूर्य-चंद्र ग्रहण नहीं देखने चाहिए, क्योंकि उसके दुष्प्रभाव से शिशु अंगहीन होकर विकलांग बन सकता है, गर्भपात की संभावना बढ़ जाती है।

इसके लिए गर्भवती के उदर भाग में गोबर और तुलसी का लेप लगा दिया जाता है, जिससे कि राहु-केतु उसका स्पर्श न करें।

ग्रहण काल में सोने से बचना चाहिए अर्थात निद्रा का त्याग करना चाहिए।

ग्रहण काल या सूतक में कामुकता का त्याग करना चाहिए।

ग्रहण काल या सूतक के समय भोजन व पीने के पानी में कुश या तुलसी के पत्ते डाल कर रखें ।

ग्रहण काल या सूतक के बाद घर गंगा जल से शुद्धि एवं स्नान करने के पश्चात मंदिर में दर्शन अवश्य करने चाहिए।

ग्रहण के समय गायों को घास, पक्षियों को अन्न, जरुरतमंदों को वस्त्र दान से अनेक गुना पुण्य प्राप्त होता है।

‘देवी भागवत’ में आता है कि भूकंप एवं ग्रहण के अवसर पृथ्वी को खोदना नहीं चाहिये

जैसा की हमारे धर्म शास्त्रों में लिखा है ग्रहण काल में अपने इष्टदेव का ध्यान और जप करने से कई गुना अधिक पुण्य मिलता है।

ग्रहण के समय में अपने इष्ट देव के मंत्रों का जाप करने से सिद्धि प्राप्त होती है।कुछ लोग ग्रहण के दौरान भी स्नान करते हैं। ग्रहण समाप्त हो जाने पर स्नान करके ब्राह्‌मण को दान देने का विधान है।।