जानिए कुंभ, अर्धकुंभ ओर सिंहस्थ के बारे में

कुर्मा पुराण के अनुसार कुंभ उत्सव में स्नान करने से सभी पापों का विनाश होता है, और मनोवांछित फल प्राप्त होता है। यहां स्नान से देव लोक भी प्राप्त होता है। भविष्य पुराण के अनुसार कुंभ स्नान से पुण्य स्व स्वरुप मिलता है, और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

कलश को कुंभ कहा जाता है। कुंभ का अर्थ होता है घड़ा। इस पर्व का संबंध समुद्र मंथन के दौरान अंत में निकले अमृत कलश से जुड़ा है। देवता-असुर जब अमृत कलश को एक दूसरे से छीन रह थे तब उसकी कुछ बूंदें धरती की तीन नदियों में गिरी थीं। जहां जब ये बूंदें गिरी थी उस स्थान पर तब कुंभ का आयोजन होता है।

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उन तीन नदियों के नाम है:- गंगा, गोदावरी और क्षिप्रा।

कुंभ पर्व हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसमें लाखों करोड़ों श्रद्धालु कुंभ पर्व स्थल हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक में स्नान करते हैं। इनमें से प्रति 12 वर्ष बाद महाकुंभ यानि पूर्ण कुंभ का आयोजन किया जाता है। इसके अलावा का कुम्भ पर्व चार हिस्सों में बंटा हुआ। जैसे कि अगर पहला कुंभ हरिद्वार में होता है तो ठीक उसके 3 साल बाद दूसरा कुंभ प्रयाग में और फिर तीसरा कुंभ 3 साल बाद उज्जैन में, और फिर 3 साल बाद चौथा कुंभ नासिक में होता है। ठीक इसी तरह 4 कुंभ पर्व को मिलाकर 12 वर्ष हो जाते हैं। तब महाकुंभ यानि पूर्ण कुंभ मनाया जाता है, जो कि 12 वर्षों में एक बार होता है। इसके अलावा हरिद्वार और प्रयाग में 2 कुंभ पर्व के बीच 6 वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ भी मनाया जाता है। और आखिरी अर्धकुंभ 2016 में हरिद्वार में आयोजित किया गया था।

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जानिए अर्धकुंभ क्या है?

अर्ध का अर्थ है आधा। हरिद्वार और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ का आयोजन होता है। पौराणिक ग्रंथों में भी कुंभ एवं अर्ध कुंभ के आयोजन को लेकर ज्योतिषीय विश्लेषण उपलब्ध है। कुंभ पर्व हर 3 साल के अंतराल पर हरिद्वार से शुरू होता है। हरिद्वार के बाद कुंभ पर्व प्रयाग नासिक और उज्जैन में मनाया जाता है। प्रयाग और हरिद्वार में मनाए जानें वाले कुंभ पर्व में एवं प्रयाग और नासिक में मनाए जाने वाले कुंभ पर्व के बीच में 3 सालों का अंतर होता है। यहां माघ मेला संगम पर आयोजित एक वार्षिक समारोह है।

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जानिए सिंहस्थ क्या है?

सिंहस्थ का संबंध सिंह राशि से है। सिंह राशि में बृहस्पति एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर उज्जैन में कुंभ का आयोजन होता है। इसके अलावा सिंह राशि में बृहस्पति के प्रवेश होने पर कुंभ पर्व का आयोजन गोदावरी के तट पर नासिक में होता है। इसे महाकुंभ भी कहते हैं, क्योंकि यह योग 12 वर्ष बाद ही आता है। इस कुंभ के कारण ही यह धारणा प्रचलित हो गई की कुंभ मेले का आयोजन प्रत्येक 12 वर्ष में होता है, जबकि यह सही नहीं है।

कुंभ का पर्व इन चार जगहों पर सम्पन्न होता है —

हरिद्वार में कुंभ : हरिद्वार का सम्बन्ध मेष राशि से है। कुंभ राशि में बृहस्पति का प्रवेश होने पर एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर कुंभ का पर्व हरिद्वार में आयोजित किया जाता है। हरिद्वार और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ का भी आयोजन होता है।

प्रयाग में कुंभ : प्रयाग कुंभ का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि यह 12 वर्षो के बाद गंगा, यमुना एवं सरस्वती के संगम पर आयोजित किया जाता है। ज्योतिषशास्त्रियों के अनुसार जब बृहस्पति कुंभ राशि में और सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है तब कुंभ मेले का आयोजन प्रयाग में किया जाता है।

अन्य प्रचलित मान्यता अनुसार जब मेष राशि के चक्र में बृहस्पति एवं सूर्य और चन्द्र के मकर राशि में प्रवेश करने पर अमावस्या के दिन कुंभ का पर्व प्रयाग में आयोजित किया जाता है। एक अन्य गणना के अनुसार मकर राशि में सूर्य का एवं वृष राशि में बृहस्पति का प्रवेश होनें पर कुंभ पर्व प्रयाग में आयोजित होता है।

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नासिक में कुम्भ : 12 वर्षों में एक बार सिंहस्थ कुंभ मेला नासिक एवं त्रयम्बकेश्वर में आयोजित होता है। सिंह राशि में बृहस्पति के प्रवेश होने पर कुकुंभ पर्व गोदावरी के तट पर नासिक में होता है। अमावस्या के दिन बृहस्पति, सूर्य एवं चन्द्र के कर्क राशि में प्रवेश होने पर भी कुंभ पर्व गोदावरी तट पर आयोजित होता है।

उज्जैन में कुंभ: सिंह राशि में बृहस्पति एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर यह पर्व उज्जैन में होता है। इसके अलावा कार्तिक अमावस्या के दिन सूर्य और चन्द्र के साथ होने पर एवं बृहस्पति के तुला राशि में प्रवेश होने पर मोक्षदायक कुंभ उज्जैन में आयोजित होता है।

हरिद्वार में महाकुंभ आयोजन का योग 2022 में नहीं, बल्कि 2021 में ही बन रहा है। विद्वत परिषद की बैठक में मंथन होने के बाद यह निर्णय लिया गया। साथ ही ग्रह योग भी 2021 के लिए ही बन रहे हैं।

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मेष राशि में सूर्य तथा कुंभ राशि में बृहस्पति होने पर हरिद्वार में महाकुंभ का आयोजन होता है। 2022 में बृहस्पति कुंभ राशि में नहीं रहेंगे। अनेक लोग इसे 2022 में मनाने के पक्षधर हैं। उज्जयिनी विद्वत परिषद की बैठक में इस विषय पर मंथन करते हुए इसे वर्ष 2021 में मनाए जाने का निश्चय किया गया कि शंकराचार्यों, आचार्यों तथा हरिद्वार, काशी की विद्वत परिषद से चर्चा कर इस योग में कुंभ पर्व मनाने का निर्णय लिया जाना चाहिए। 5 जून को विद्वत परिषद के अध्यक्ष वरिष्ठ विद्वान डॉ. मोहन गुप्त की अध्यक्षता में आयोजित बैठक में विचार प्रस्तुत हुए। ज्योतिषाचार्य पं. श्यामनारायण व्यास द्वारा ज्योतिषीय गणना करते हुए हरिद्वार में आयोज्यमान कुंभ पर्व के संबंध में तर्क दिए गए। तदनुसार परिषद ने प्रस्तावित किया कि हरिद्वार का कुंभ पर्व 2021 में मनाया जाना उचित है। बैठक में उज्जैन में संपन्न सिंहस्थ महापर्व की समीक्षा भी की गई। पाणिनी संस्कृत वैदिक विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रमेशचन्द्र पंडा, डॉ. केदारनाथ शुक्ल, प्रो. बालकृष्ण शर्मा, डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित, पं. श्यामनारायण व्यास, पं. नारायण उपाध्याय, पं. वासुदेव पुरोहित आदि शामिल हुए।

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11 लोगों की है विद्वत परिषद–

विद्वत परिषद में शहर के कुल 11 विद्वान शामिल हैं। ये सभी अपने-अपने क्षेत्र में पारंगत हैं। सबने विचार किया और निर्णय लिया है कि हरिद्वार में कुंभ का योग 2021 में ही बन रहा है। वैसे यह हर 12 साल के बाद होता है, लेकिन इस बार यह ग्रह योग के चलते 11 साल में ही होगा। पं. श्यामनारायण व्यास ने कहा कि अर्ध कुंभ मनाए जाते में किसी तरह के ग्रह योग नहीं देखे जाते। 2016 में उज्जैन में महाकुंभ संपन्न हुआ है, उस अनुसार यदि देखा जाए तो छह साल बाद अर्थात 2021 में ही हरिद्वार का कुंभ होना चाहिए। उस अनुसार ग्रह योग भी बन रहे हैं।

यह हैं कुंभ की कथा —

दरअसल, अमृत पर अधिकार को लेकर देवता और दानवों के बीच लगातार बारह दिन तक युद्ध हुआ था। जो मनुष्यों के बारह वर्ष के समान हैं। अतएव कुंभ भी बारह होते हैं। उनमें से चार कुंभ पृथ्वी पर होते हैं और आठ कुंभ देवलोक में होते हैं।

अमृत की ये बूंदें चार जगह गिरी थी —

गंगा नदी (प्रयाग, हरिद्वार), गोदावरी नदी (नासिक), क्षिप्रा नदी (उज्जैन)। सभी नदियों का संबंध गंगा से है। गोदावरी को गोमती गंगा के नाम से पुकारते हैं। क्षिप्रा नदी को भी उत्तरी गंगा के नाम से जानते हैं, यहां पर गंगा गंगेश्वर की आराधना की जाती है।

ब्रह्म पुराण एवं स्कंध पुराण के इन 2 श्लोकों के माध्यम इसे समझा जा सकता है–

‘।।विन्ध्यस्य दक्षिणे गंगा गौतमी सा निगद्यते उत्त्रे सापि विन्ध्यस्य भगीरत्यभिधीयते.’

‘एव मुक्त्वाद गता गंगा कलया वन संस्थिता गंगेश्वेरं तु यः पश्येत स्नात्वा शिप्राम्भासि प्रिये।।’

जानें और समझें कुंभ का इतिहास—

यह कहानी समुद्र मंथन से जुड़ी हुई है। कहते हैं महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण जब इंद्र और देवता कमजोर पड़ गए, तब राक्षस ने देवताओं पर आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया था। सब देवता मिलकर भगवान विष्णु के पास पहुंचे और उन्हें सारा वृतांत सुनाया। तब भगवान विष्णु ने देवताओं को दैत्यों के साथ मिलकर क्षीर सागर का मंथन करके अमृत निकालने की सलाह दी। भगवान विष्णु के ऐसा कहने पर संपूर्ण देवता राक्षसों के साथ संधि करके अमृत निकालने के प्रयास में लग गए। समुद्र मंथन से अमृत निकलते ही देवताओं के इशारे पर इंद्र पुत्र ‘जयंत’ अमृत कलश को लेकर आकाश में उड़ गया। उसके बाद दैत्य गुरु शुक्राचार्य के आदेश पर राक्षसों ने अमृत लाने के लिए जयंत का पीछा किया, और घोर परिश्रम के बाद उन्होंने बीच रास्ते में ही जयंत को पकड़ा और अमृत कलश पर अधिकार जमाने के लिए देव और दानव में 12 दिन तक भयंकर युद्ध होता रहा।

कहते हैं कि इस युद्ध के दौरान पृथ्वी के चार स्थानों पर अमृत कलश से अमृत की बूंदे गिरी थी। जिनमें से पहली बूंद प्रयाग में गिरी तो दूसरी शिव की नगरी हरिद्वार में इसके बाद तीसरी बूंद उज्जैन में तो चौथी बूंद नासिक में जा गिरी। यही कारण है कि कुंभ के मेले को इन्हीं चार स्थानों पर मनाया जाता है। देवताओं के 12 दिन, मनुष्य के 12 वर्ष के तुल्य होते हैं। अतः कुंभ भी 12 होते हैं। उनमें से 4 कुंभ पृथ्वी पर होते हैं और शेष 8 कुंभ देवलोक में होते हैं, जिन्हें देवगन हि प्राप्त कर सकते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार जानते है की आखिर कुंभ पर्व के आयोजन की तिथि और जगह कैसे निर्धारित की जाती है।

जानिए कुंभ आयोजन की तिथि कैसे होती हैं निर्धारित —

कहते हैं कि कुंभ मेले में सूर्य और बृहस्पति का खास योगदान माना जाता है। सूर्य देव एवं गुरु बृहस्पति एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करते हैं तभी कुंभ मेले को मनाने का स्थान और तिथि का चुनाव किया जाता है। तो इसी के अनुसार जब सूर्य मेष राशि और बृहस्पति कुंभ राशि में आता है तब यह कुम्भ मेला हरिद्वार में मनाया जाता है। जब बृहस्पति वृषभ राशि में प्रवेश करता है और सूर्य मकर राशि में होता है तो यह उत्सव प्रयाग में मनाया जाता है। जब बृहस्पति और सूर्य का सिंह राशि में प्रवेश होता है तब यह महाकुंभ मेला महाराष्ट्र के नासिक में मनाया जाता है।

इसके अलावा बृहस्पति सूर्य और चंद्रमा तीनों कर्क राशि में प्रवेश करें और साथ ही अमावस्या का दिन हो तब भी कुंभ नासिक में ही मनाया जाता है। और अंत में कुंभ मेला उज्जैन में तब मनाया जाता है जब बृहस्पति सिंह राशि में प्रवेश करें और सूर्य देव मेष राशि में प्रवेश कर रहे हो। सूर्य देव का सिंह राशि में प्रवेश होने के कारण मध्यप्रदेश के उज्जैन में मनाया जाने वाला कुंभ सिंहस्थ कुंभ कहलाता है। पिछला सिंहस्थ कुंभ अप्रैल 2016 में आयोजित किया गया था। यह पर्व 12 वर्ष के पश्चात उज्जैन की भूमि पर मनाया गया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार अमृत कलश से अमृत की चार बूंदे जो धरती पर गिरी थी वह नदी में रूप ले लिया। यह चार पवित्र नदियां हैं हरिद्वार में गंगा, नासिक में गोदावरी, इलाहाबाद में संगम यानी गंगा जमुना सरस्वती और उज्जैन में शिप्रा नदी की। इनसब का अपनी महिमा और महत्व है। गंगा, यमुना, सरस्वती जैसी महा नदियों की तरह शिप्रा नदी भी महान है। शिप्रा नदी को पहाड़ों से बहने वाली नदी कहा जाता है। लेकिन मान्यतानुसार यह नदी धरती के कोख से जन्म ली थी। कहते हैं कि इस नदी का जल इतना पवित्र है कि इसमें स्नान करने वाले लोगों के सभी कष्ट और दुख दूर हो जाते हैं और जीवन में खुशहाली आती है।

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स्कंदपुराण में यह उल्लेख मिलता है की भारत के सभी पवित्र नदियां उत्तर से दक्षिण की ओर बहती है, लेकिन शिप्रा नदी एक ऐसी नदी है जो उत्तरगामी है यानी कि यह उत्तर दिशा की ओर बहने वाली नदी है। आगे चलकर यह चंबल उप नदी में मिल जाती है। कुर्मा पुराण के अनुसार कुंभ उत्सव में स्नान करने से सभी पापों का विनाश होता है, और मनोवांछित फल प्राप्त होता है। यहां स्नान से देव लोक भी प्राप्त होता है। भविष्य पुराण के अनुसार कुंभ स्नान से पुण्य स्व स्वरुप मिलता है, और मोक्ष की प्राप्ति होती है।