जानें महामृत्यंजय मंत्र के बारे में

मृत्यु को जीतने वाला महान मंत्र” जिसे त्रयंबकम मंत्र भी कहा जाता है, यजुर्वेद के रूद्र अध्याय में, भगवान शिव की स्तुति हेतु की गयी एक वंदना है। इस मंत्र में शिव को ‘मृत्यु को जीतने वाला’ बताया गया है। यह गायत्री मंत्र के समकालीन हिंदू धर्म का सबसे व्यापक रूप से जाना जाने वाला मंत्र है।

Written by पंडित दयानन्द शास्त्री June 12, 2019 2:38 pm

महामृत्युंजय जाप करने से अकाल मृत्यु तो टलती ही है। आयोग्यता भी प्राप्त होती है, स्नान करते समय शरीर पर लोटे से पानी डालते वक्त इस मंत्र का जाप करने में स्वास्थ्य लाभ होता है। दूध में निहारते हुए इस मंत्र का जाप भी किया जाए और फिर वह दूध पी लिया जाए तो यौवन की सुरक्षा में भी सहायता मिलती है साथ ही इस मंत्र का जाप करने से बहुत सी बाधाएं दूर होती हैं, अतः इस मंत्र का यथासंभव जाप करना चाहिए, निम्नलिखित स्थितियों में इस मंत्र का जाप कराया जाता है।

mahashivratri 2019

– ज्योतिष के अनुसार यजि जन्म, मास गोचर और दशा, अंर्तदशा, स्थूलकला आदि में ग्रहपीड़ा होने का योग है।

– किसी महारोग से कोई पीडि़त होने पर

– जमीन-जायदाद के बंटवारे की संभावना हो

– हैजा-प्लेग आदि महामारी से लोग मर रहे हों

– राज्य या संपदा के जाने का अंदेशा हो

– मेलापिकमें नाड़ी दोष, षडक आदि आता हो

– मन धार्मिक कार्यों से विमुख हो गया हो

– मनुष्यों में परस्पर घारे कलेश हो रहा हो

– त्रिदोषवश रोग हो रहे हों

– महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना परम फलदायी है, महामृत्युंजय मंत्र के जाप और उपासना के तरीके आवश्यकता के अनुरूप होते हैं, काम्य उपासना के रूप में भी इस मंत्र का जाप किया जाता है, जाप के लिए अलग-अलग मंत्रों का प्रयोग होता है, यहां हमने आपकी सुविधा के लिए संस्कृत में जाप विधि, विभिन्न यंत्र-मंत्र, जप में सावधानियां, स्त्रोत आदि उपलब्ध कराए है इस प्रकार आप यहां इस अदभुत जाप के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकते है।

mahamrityunjay mantra

महामृत्युंजय जपविधी-

कृतनित्यक्रियो जपकर्ता स्वासने पांगसुख उदहसुखो वा उपविश्य घृतरूद्राक्षभस्मत्रिपुण्ड्रः आचम्य प्राणानायाम देशकालौ संकीत्र्य मम वा यज्ञमानस्य मंत्रस्य अमुक संख्यापरिमितं जपमंहकरिष्ये वा कारयिष्य. इति प्रात्यहिसंकल्पः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॐ गुरवे नमः ॐ गणपत्ये नमःॐ इष्टदेवतायै नमः

इति नत्वा यथोक्तविधिना भूतशुद्धिं प्राण प्रतिष्ठां च कुर्यात

भूतशुद्धिः विनियोग- ॐ तत्सदद्येत्यादि मम अमुक प्रयोगसिद्धयर्थ भूतशुद्धि प्राण प्रतिष्ठां च करिष्ये,ॐ आधारशक्ति कमलासनायनमःइत्यासनं सम्पूज्य. पृथ्वीति मंत्रस्य मेरूपृष्ठ आसने विनियोगः

आसन-ॐ पृथ्वि त्वया घृता लोका देवि त्वं विष्णुता घृता.

त्वं च धारय मां देवि पविंत्र कुरू चासनम

गन्धपुष्पादिना पृथ्वीं सम्पूजस्य कमलासने भूतशुद्धि कुर्यात

अन्यत्र कामनोभदेन. अन्यासनेऽपि कुर्यात

तत्र क्रमः पादादिजानुपर्यतं पृथ्वीस्थानं तच्च्तुरस्त्र पीतवर्ण ब्रहादेवतं वमिति बीजयुत्तंहृ ध्यायेत् जान्वादिनाभिपर्यन्तसत्थानं

तच्र्चार्द्धचंद्रकारं विष्णुदैवतं लमिति बीजयुक्त ध्हृायेत

ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यम्‍बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्‍धनान् मृत्‍योर्मुक्षीय मामृतात् ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ !!

||महा मृत्‍युंजय मंत्र का अर्थ || समस्‍त संसार के पालनहार, तीन नेत्र वाले शिव की हम अराधना करते हैं। विश्‍व में सुरभि फैलाने वाले भगवान शिव मृत्‍यु न कि मोक्ष से हमें मुक्ति दिलाएं।

महामृत्युंजय मंत्र के वर्णो का अर्थ महामृत्युंजय मंत्र के वर्ण पद वाक्यक चरण आधी ऋचा और सम्पुतर्ण ऋचा-इन छ: अंगों के अलग-अलग अभिप्राय हैं।

mahamrityunjay mantra 2

ओम त्र्यंबकम् मंत्र के 33 अक्षर हैं जो महर्षि वशिष्ठर के अनुसार 33 देवताओं के घोतक हैं। उन तैंतीस देवताओं में 8 वसु 11 रुद्र और 12 आदित्यठ 1 प्रजापति तथा 1 षटकार हैं। इन तैंतीस देवताओं की सम्पूर्ण शक्तियां महामृत्युंजय मंत्र से निहीत होती है जिससे महा महामृत्युंजय का पाठ करने वाला प्राणी दीर्घायु तो प्राप्त करता ही हैं। साथ ही वह नीरोग, ऐश्व‍र्य युक्ता धनवान भी होता है। महामृत्युंजय का पाठ करने वाला प्राणी हर दृष्टि से सुखी और समृद्धशाली होता है। भगवान शिव की अमृतमयी कृपा उस पर निरन्तंर बरसती रहती है।

shivling

त्रि – ध्रववसु प्राण का घोतक है जो सिर में स्थित है।

यम – अध्ववरसु प्राण का घोतक है, जो मुख में स्थित है।

ब – सोम वसु शक्ति का घोतक है, जो दक्षिण कर्ण में स्थित है।

कम – जल वसु देवता का घोतक है, जो वाम कर्ण में स्थित है।

य – वायु वसु का घोतक है, जो दक्षिण बाहु में स्थित है।

जा- अग्नि वसु का घोतक है, जो बाम बाहु में स्थित है।

म – प्रत्युवष वसु शक्ति का घोतक है, जो दक्षिण बाहु के मध्य में स्थित है।

हे – प्रयास वसु मणिबन्धत में स्थित है।

सु -वीरभद्र रुद्र प्राण का बोधक है। दक्षिण हस्त के अंगुलि के मुल में स्थित है।

ग -शुम्भ् रुद्र का घोतक है दक्षिणहस्त् अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है।

न्धिम् -गिरीश रुद्र शक्ति का मुल घोतक है। बायें हाथ के मूल में स्थित है।

पु- अजैक पात रुद्र शक्ति का घोतक है। बाम हस्तह के मध्य भाग में स्थित है।

ष्टि – अहर्बुध्य्त् रुद्र का घोतक है, बाम हस्त के मणिबन्धा में स्थित है।

व – पिनाकी रुद्र प्राण का घोतक है। बायें हाथ की अंगुलि के मुल में स्थित है।

र्ध – भवानीश्वपर रुद्र का घोतक है, बाम हस्त अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है।

नम् – कपाली रुद्र का घोतक है। उरु मूल में स्थित है।

उ- दिक्पति रुद्र का घोतक है। यक्ष जानु में स्थित है।

र्वा – स्थाणु रुद्र का घोतक है जो यक्ष गुल्फ् में स्थित है।

रु – भर्ग रुद्र का घोतक है, जो चक्ष पादांगुलि मूल में स्थित है।

क – धाता आदित्यद का घोतक है जो यक्ष पादांगुलियों के अग्र भाग में स्थित है।

मि – अर्यमा आदित्यद का घोतक है जो वाम उरु मूल में स्थित है।

व – मित्र आदित्यद का घोतक है जो वाम जानु में स्थित है।

ब – वरुणादित्या का बोधक है जो वाम गुल्फा में स्थित है।

न्धा – अंशु आदित्यद का घोतक है। वाम पादंगुलि के मुल में स्थित है।

नात् – भगादित्यअ का बोधक है। वाम पैर की अंगुलियों के अग्रभाग में स्थित है।

मृ – विवस्व्न (सुर्य) का घोतक है जो दक्ष पार्श्वि में स्थित है।

र्त्यो् – दन्दाददित्य् का बोधक है। वाम पार्श्वि भाग में स्थित है।

मु – पूषादित्यं का बोधक है। पृष्ठै भगा में स्थित है।

क्षी – पर्जन्य् आदित्यय का घोतक है। नाभि स्थिल में स्थित है।

य – त्वणष्टान आदित्यध का बोधक है। गुहय भाग में स्थित है।

मां – विष्णुय आदित्यय का घोतक है यह शक्ति स्व्रुप दोनों भुजाओं में स्थित है।

मृ – प्रजापति का घोतक है जो कंठ भाग में स्थित है।

तात् – अमित वषट्कार का घोतक है जो हदय प्रदेश में स्थित है।

उपर वर्णन किये स्थानों पर उपरोक्तध देवता, वसु आदित्य आदि अपनी सम्पुर्ण शक्तियों सहित विराजत हैं। जो प्राणी श्रध्दा सहित महामृत्युजय मंत्र का पाठ करता है उसके शरीर के अंग – अंग (जहां के जो देवता या वसु अथवा आदित्यप हैं) उनकी रक्षा होती है।

मंत्रगत पदों की शक्तियाँ जिस प्रकार मंत्रा में अलग अलग वर्णो (अक्षरों) की शक्तियाँ हैं। उसी प्रकार अलग – अल पदों की भी शक्तियाँ है।

त्र्यम्‍‍बकम् – त्रैलोक्यक शक्ति का बोध कराता है जो सिर में स्थित है।

यजा- सुगन्धात शक्ति का घोतक है जो ललाट में स्थित है।

महे- माया शक्ति का द्योतक है जो कानों में स्थित है।

सुगन्धिम् – सुगन्धि शक्ति का द्योतक है जो नासिका (नाक) में स्थित है।

पुष्टि – पुरन्दिरी शकित का द्योतक है जो मुख में स्थित है।

वर्धनम – वंशकरी शक्ति का द्योतक है जो कंठ में स्थित है।

उर्वा – ऊर्ध्देक शक्ति का द्योतक है जो ह्रदय में स्थित है।

रुक – रुक्तदवती शक्ति का द्योतक है जो नाभि में स्थित है।

मिव रुक्मावती शक्ति का बोध कराता है जो कटि भाग में स्थित है।

बन्धानात् – बर्बरी शक्ति का द्योतक है जो गुह्य भाग में स्थित है।

मृत्यो: – मन्त्र्वती शक्ति का द्योतक है जो उरुव्दंय में स्थित है।

मुक्षीय – मुक्तिकरी शक्तिक का द्योतक है जो जानुव्दओय में स्थित है।

मा – माशकिक्तत सहित महाकालेश का बोधक है जो दोंनों जंघाओ में स्थित है।

अमृतात – अमृतवती शक्तिका द्योतक है जो पैरो के तलुओं में स्थित है।

mahamrityunjay mantra 1

महामृत्युंजय प्रयोग के लाभ

कलौकलिमल ध्वंयस सर्वपाप हरं शिवम्।

येर्चयन्ति नरा नित्यं तेपिवन्द्या यथा शिवम्।।

स्वयं यजनित चद्देव मुत्तेमा स्द्गरात्मवजै:।

मध्यचमा ये भवेद मृत्यैतरधमा साधन क्रिया।।

देव पूजा विहीनो य: स नरा नरकं व्रजेत।

यदा कथंचिद् देवार्चा विधेया श्रध्दायान्वित।।

जन्मचतारात्र्यौ रगोन्मृदत्युतच्चैरव विनाशयेत्।

maha_shivratri

कलयुग में केवल शिव जी की पूजा फल देने वाली है। समस्तं पापं एवं दु:ख भय शोक आदि का हरण करने के लिए महामृत्युजय की विधि ही श्रेष्ठ है। निम्निलिखित प्रयोजनों में महामृत्युजंय का पाठ करना महान लाभकारी एवं कल्याणकारी होता है। हम त्रि-नेत्रीय वास्तविकता का चिंतन करते हैं जो जीवन की मधुर परिपूर्णता को पोषित करता है और वृद्धि करता है। ककड़ी की तरह हम इसके तने से अलग (“मुक्त”) हों, अमरत्व से नहीं बल्कि मृत्यु से हों।

shiv ji

बड़ी तपस्या से ऋषि मृकण्ड के पुत्र हुआ। कितु ज्योतिर्विदों ने उस शिशु के लक्षण देखकर ऋषि के हर्ष को चिंता में परिवर्तित कर दिया। उन्होंने कहा यह बालक अल्पायु है।इसकी आयु केवल बारह वर्ष है। मृकण्ड ऋषि ने अपनी पत्नी को आश्वत किया-देवी, चिंता मत करो। विधाता जीव के कर्मानुसार ही आयु दे सकते हैं, कितु मेरे स्वामी समर्थ हैं। भाग्यलिपि को स्वेच्छानुसार परिवर्तित कर देना भगवान शिव के लिए विनोद मात्र है। ऋषि मृकण्ड के पुत्र मार्कण्डेय बढऩे लगे। शैशव बीता और कुमारावस्था के प्रारंभ में ही पिता ने उन्हें शिव मंत्र की दीक्षा तथा शिवार्चना की शिक्षा दी। पुत्र को उसका भविष्य बता समझा दिया कि पुरारि ही उसे मृत्यु से बचा सकते हैं। माता-पिता तो दिन गिन रहे थे। बारह वर्ष आज पूरे होंगे। मार्कण्डेय मंदिर में बैठे थे। रात्रि से ही और उन्होंने मृत्युंजय मंत्र की शरण ले रखी है- त्र्यम्बक यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धन्म। उर्वारुकमिव बन्धनामृत्येर्मुक्षीय मामृतात्। सप्रणव बीजत्रय-सम्पुटित महामृत्युंजय मंत्र चल रहा था। काल किसी की भी प्रतीक्षा नहीं करता। यमराज के दूत समय पर आए और संयमनी लौट गए। उन्होंने अपने स्वामी यमराज से जाकर निवेदन किया- हम मार्•ण्डेय तक पहुंचने का साहस नहीं पाए। इस पर यमराज ने कहा कि मृकण्ड को पुत्र को मैं स्वयं लाऊंगा। दण्डधर यमराज जी महिषारूढ़ हुए और क्षण भर में मार्कण्डेय के पास पहुंच गए। बालक मार्कण्डेय ने उन कज्जल कृष्ण, रक्तनेत्र पाशधारी को देखा तो सम्मुख की लिंगमूर्ति से लिपट गया। हुम्, एक अद्भुत अपूर्व हुंकार और मंदिर, दिशाएं जैसे प्रचण्ड प्रकाश से चकाचौंथ हो गईं। शिवलिंग से तेजोमय त्रिनेत्र गंगाधर चन्द्रशेखर प्रकट हो गए थे और उन्होंने त्रिशूल उठा लिया था और यमराज से कहा कि तुम मेरे आश्रित पर पाश उठाने का साहस केसे करते हो?। यमराज ने डांट पडऩे से पूर्व ही हाथ जोडक़र मस्तक झुका लिया था और कहा कि मैं आप का सेवक हूं। कर्मानुसार जीव को इस लोक से ले जाने का निष्ठुर कार्य प्रभु ने इस सेवक को दिया है। भगवान चंद्रशेखर ने कहा कि यह संयमनी नहीं जाएगा। इसे मैंने अमरत्व दिया है। मृत्युंजय प्रभु की आज्ञा को यमराज अस्वीकार केसे कर सकते थे? यमराज खाली हाथ लौट गए। मार्कण्डेय ने यह देख लिया। उर्वारु•मिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्। वृन्तच्युत खरबूजे के समान मृत्यु के बन्धन से छुड़ाकर मुझे अमृतत्व प्रदान करें। मंत्र के द्वारा चाहा गया वरदान उस का सम्पूर्ण रूप से उसी समय मार्कण्डेय को प्राप्त हो गया। भाग्यलेख-वह औरों के लिए अमित होगा, कितु आशुतोष के आश्रितों के लिए भाग्येलख क्या? भगवान ब्रह्मा भाग्यविधाता स्वयं भगवती पार्वती से कहते हैं- बावरो रावरो नाह भवानी।

shivratri

मृत्यु को जीतने वाला महान मंत्र” जिसे त्रयंबकम मंत्र भी कहा जाता है, यजुर्वेद के रूद्र अध्याय में, भगवान शिव की स्तुति हेतु की गयी एक वंदना है। इस मंत्र में शिव को ‘मृत्यु को जीतने वाला’ बताया गया है। यह गायत्री मंत्र के समकालीन हिंदू धर्म का सबसे व्यापक रूप से जाना जाने वाला मंत्र है।