जानें और समझें जन्म कुंडली के नवम भाव को

चाहे आपको ज्योतिष का ज्ञान हो या न हो, अपने भाग्य की स्थिति का ज्ञान तो हर व्यक्ति को होता है। अब यदि दुर्भाग्य पीछा न छोड़ रहा हो तो क्या ऐसा करें कि दुर्भाग्य सौभाग्य में बदल जाए।

जन्मकुंडली के नवम् भाव को भाग्य स्थान माना गया है। नवम् भाव से भाग्य, पिता, पुण्य, धर्म, तीर्थ यात्रा तथा शुभ कार्यों का विचार किया जाता है। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि नवम भाव जन्म कुंडली का सर्वोच्च त्रिकोण स्थान है। उसे लक्ष्मी का स्थान माना गया है। नवम भाव, एकादश (लाभ) भाव से एकादश होने के कारण ‘लाभ का लाभ’, अर्थात जातक के जीवन की बहुमुखी समृद्धि दर्शाता है।

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वैदिक ज्योतिष के अनुसार जन्म कुंडली में नवम भाव व्यक्ति के भाग्य को दर्शाता है और इसलिए इसे भाग्य का भाव कहा जाता है। जिस व्यक्ति का नवम भाव अच्छा होता है वह व्यक्ति भाग्यवान होता है। इसके साथ ही नवम भाव से व्यक्ति के धार्मिक दृष्टिकोण का पता चलता है। अतः इसे धर्म का भाव भी कहते हैं। इस भाव से व्यक्ति के आध्यात्मिक जीवन का विचार किया जाता है। यह भाव जातकों के लिए बहुत ही शुभ होता है। इस भाव के अच्छा होने से जातक हर क्षेत्र में तरक्की करता है। आचार्य, पितृ, शुभम, पूर्व भाग्य, पूजा, तपस, धर्म, पौत्र, जप, दैव्य उपासना, आर्य वंश, भाग्य आदि को नवम भाव से दर्शाया जाता है।

नवम भाव के कारकत्व

कुंडली में नवम भाव दैवीय पूजा, भाग्य, क़ानूनी मामले, नाटकीय कार्य, गुण, दया-करुणा, तीर्थ, दवा, विज्ञान, मानसिक शुद्धता, शिक्षा ग्रहण, समृद्धि, योजना, नैतिक कहानी, घोड़े, हाथी, सभागार, धर्म, गुरु, पौत्र, आध्यात्मिक ज्ञान, कल्पना, अंतर्ज्ञान, धार्मिक भक्ति, सहानुभूति, दर्शन, विज्ञान और साहित्य, स्थायी प्रसिद्धि, नेतृत्व, दान, आत्मा, भूत, लंबी यात्राएँ, विदेशी यात्रा और पिता के साथ संचार आदि नवम भाव के कारकत्व हैं। पंडित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार जन्मकुंडली का नौवां घर सर्वाधिक शुभ घरों में गिना जाता है इस घर का अपना विशेष महत्व है मैंने जीवन में इस घर का प्रभाव स्वयं अनुभव करके देखा है अक्सर हम राजयोग के बारे में बात करते हैं। हर व्यक्ति की कुंडली में राजयोग और दरिद्र योग मिल जायेंगे | हर योग की कुछ समय अवधि रहती है दो तीन साल से लेकर पांच छह साल तक ही ये योग प्रभावशाली रहते हैं जिस राजयोग के विषय में मैं सोच रहा हूँ अलग है नवम भाव से बनने वाला योग पूरे जीवन में प्रभावकारी रहता है।किसी भी व्यक्ति की जन्म कुंडली में उसका भाग्य भाव, भाग्येश, तथा भाग्य भाव को प्रभावित करने वाले ग्रह महत्व रखते हैं। जन्म कुंडली में नवम भाव से भाग्य का आंकलन किया जाता है। किसी भी जन्म कुण्डली में जन्म लग्न से नौवीं राशि व चंद्र लग्न से नौंवी राशि महत्वपूर्ण होती है. क्योकि यह राशि भाग्य भाव अर्थात नवम भाव में आती है। जन्म लग्न अथवा चंद्र लग्न में से जो लग्न बली होता है उससे भाग्य भाव की गणना की जानी चाहिए। जन्म कुंडली में भाग्य भाव का स्वामी किस भाव में गया है आदि बातों का विचार करना चाहिए। भाग्येश का केन्द्र अथवा त्रिकोण आदि भावों में जाना शुभ प्रदान करने वाला माना गया है। भाग्येश चाहे बली हो अथवा अल्पबली हो तब भी वह योगकारक ही कहा जाता है।

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नवम भाव अथवा नवमेश का संबंध किसी भी तरह से केन्द्र, त्रिकोण, धन भाव आदि से बन रहा हो तब इसे अत्यधिक शुभ माना गया है। यह उत्तम अवस्था होती है, 3 व 11 भाव से नवम भाव का संबंध बनने पर यह मध्यम स्थिति बनती है और छठे, आठवें व बारहवें भाव से नवम भाव का संबंध बनने पर सबसे खराब स्थिति मानी गई है। एक बात लेकिन तय है कि भाग्येश अति शुभ या अति अशुभ हो, वह सदा शुभ फल देने वाला ही माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार, नवम भाव से पवित्र स्थानों, कुओं, जलाशयों, बलिदान और दान आदि का विचार किया जाता है। इसके अतिरिक्त मंदिरों, मस्जिदों, चर्चों और सभी धार्मिक संस्थानों को कुंडली के नौवें भाव के माध्यम से देखा जाता है। यह अंतर्ज्ञान और मानसिक शुद्धि का भाव भी है। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि नवम भाव उच्च शिक्षा, उच्च विचार और उच्च ज्ञान का प्रतिनिधित्व करता है। नौवां भाव अनुसंधान, आविष्कार, खोज, अन्वेषण आदि का प्रतिनिधित्व करता है। हिन्दू लोग इस भाव को धर्म का भाव कहते हैं। नवम भाव प्रकाशन, विशेष रूप से धर्म, विज्ञान, कानून, दर्शन, यात्रा, अंतर्राष्ट्रीय मामलों आदि से संबंधित है। यह अच्छे लोगों, सम्मान और ईश्वर और बुजुर्गों के प्रति समर्पण, पिछले जन्म और पुण्य और परिवार से प्राप्त आशीर्वाद को भी दर्शाता है। कुछ लोगों को आगे बढ़ने के अवसर ही नहीं मिल पाते और कुछ लोग अवसर मिलते ही बहुत दूर निकल जाते हैं | बदकिस्मती जो जीवन बदल दे इसी घर की देन होती है | खुशकिस्मती जो अगली पीढ़ियों के लिए भी रास्ता साफ़ कर दे नवम भाव का प्रबल होना दर्शाती है | मनपसंद जीवनसाथी पाने की आस में पूरा जीवन गुजर जाता है उसके साथ जिसे कभी पसंद किया ही नहीं | जिन्दगी के साथ समझौता कर लेना या यह मान लेना कि यही नसीब था इन घटनाओं के लिए नवम भाव ही उत्तरदायी है | आस लगाकर बैठे हजारों हजार लोग भाग्य के पीछे भागते रहते हैं और यह भी सच है कि इस दौड़ में हम सब हैं | प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हर कोई भाग्य की और देख रहा है | किस्मत का यह ताना बाना अपने आप में विचित्र है | भाग्य को समझ पाना आसान नहीं परन्तु जन्मकुंडली के द्वारा एक कोशिश की जा सकती है | तो आइये जानते हैं कैसे आपकी जन्मकुंडली का नवम भाव आपके जीवन को प्रभावित करता है |

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जब नवम भाव अपने स्वामी या शुभ ग्रहों से युक्त अथवा दृष्ट हो तो मनुष्य भाग्यशाली होता है। नवमेश भी शुभ ग्रहों से युक्त अथवा दृष्ट हो तो सर्वदा शुभकारी होता है। यदि पाप ग्रह भी अपनी, मित्र, मूल त्रिकोण अथवा उच्च राशि में नवम् भाव में स्थित हो तो अपने बलानुसार शुभ फल देता है। जैसे शनि भाग्येश होकर भाग्य भाव में स्थित हो तो जातक जीवन पर्यन्त भाग्यशाली रहता है। लग्नेश यदि भाग्य भाव में स्थित हो तब भी जातक परम भाग्यशाली होता है। बृहस्पति नवम भाव का कारक ग्रह है। जब बलवान बृहस्पति नवम भाव में हो, या लग्न, तृतीय अथवा पंचम भाव में स्थित होकर नवम् भाव पर दृष्टिपात करें तो विशेष भाग्यकारक होता है। नवम भाव में सुस्थित बृहस्पति यदि शुक्र और बुध के साथ हो तो पूर्ण शुभ फलदायक होता है। परंतु इन पर शनि, मंगल व राहु की दृष्टि हो तो आधा ही शुभ फल मिलता है।

जानिए कैसे होता हैं नवम् भाव व नवमेश निर्बल अथवा पीड़ित होने पर जातक भाग्यहीन

भाग्य भाव से पंचम भाव लग्न भाव होता है। अतः उसका स्वामी (लग्नेश) भी भाग्यकारक होता है। ‘भावात् भावम्’ सिद्धांत के अनुसार नवम् से नवम् अर्थात पंचम भाव और पंचमेश भी भाग्यकारक होते हैं। ज्ञातव्य है कि नवम और पंचम (त्रिकोण भाव) को लक्ष्मी स्थान की संज्ञा दी गई है। जब ये तीनों ग्रह (नवमेश, लग्नेश और पंचमेश) बलवान हों तथा शुभ भाव में अपनी स्वयं, उच्च, अथवा मूलत्रिकोण राशि में शुभ दृष्ट हों, तो व्यक्ति जीवन पर्यन्त भाग्यशाली होता है। कारक बृहस्पति का संबंध शुभ फल में वृद्धि करता है।

नवम भाव भाग्य या किस्मत का है | यहां बैठे ग्रह आपके भाग्य को बहुत हद तक प्रभावित करते हैं | यदि यहां कोई भी ग्रह न हो तो भी यहां स्थित राशी के स्वामी को देखा जाता है | नवम भाव भाग्य का और दशम भाव कर्म का है | जब इन दोनों स्थानों के ग्रह आपस में किसी भी प्रकार का सम्बन्ध रखते हैं तब राजयोग की उत्पत्ति होती है | राजयोग में साधारण स्थिति में व्यक्ति सरकारी नौकरी प्राप्त करता है | नवम और दशम भाव का आपस में जितना गहरा सम्बन्ध होगा उतना ही अधिक बड़ा राज व्यक्ति भोगेगा | मंत्री, राजनेता, अध्यक्ष आदि राजनीतिक व्यक्तियों की कुंडली में यह योग होना स्वाभाविक ही है |

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नवम भाव और दुर्भाग्य का सम्बन्ध

पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि यदि नवम भाव का स्वामी ग्रह सूर्य के साथ 10 डिग्री के बीच में हो तो निस्संदेह व्यक्ति भाग्यहीन होता है | यदि नवमेश नीच राशी में हो तो व्यक्ति चाहे करोडपति क्यों न हो एक न एक दिन उसे सड़क पर आना पड़ ही जाता है | यदि नवमेश 12वें भाव में हो तो व्यक्ति का भाग्य अपने देश में नहीं चमकता | विदेश में जाकर वहां कष्ट उठाकर जीना पड़ता है | उसकी यही मेहनत उसके भाग्य का निर्माण करती है | नवम भाव का स्वामी बलवान हो या निर्बल, उसकी दशा अन्तर्दशा में व्यक्ति को अवसर खूब मिलते हैं | यदि नवमेश अच्छी स्थिति में होगा तो व्यक्ति अवसर का लाभ उठा पायेगा | अन्यथा अवसर पर अवसर ऐसे ही निकल जाते हैं जैसे मुट्ठी में से रेत | पाप ग्रह इस स्थान में बैठकर भाग्य की हानि करते हैं और शुभ ग्रह मुसीबतों से बचाते हैं | इस स्थान पर बुध, शुक्र, चन्द्र और गुरु का होना व्यक्ति के उज्ज्वल भविष्य को दर्शाता है | मंगल, शनि, राहू और केतु इस स्थान में बैठकर व्यक्ति को दुर्भाग्य के अवसर प्रदान करते हैं | सूर्य का यहाँ होना निस्संदेह एक बहुत बड़ा राजयोग है | सूर्य स्वयं ग्रहों का राजा है और जब राजा ही भाग्य स्थान में बैठ जाए तो राजयोग स्पष्ट हो जाता है | कोई भी ग्रह चाहे वह पाप ग्रह मंगल, शनि ही क्यों न हों, इस स्थान में यदि अपनी राशी में हो तो व्यक्ति बहुत भाग्यशाली हो जाता है | पाप ग्रहों से अंतर केवल इतना पड़ता है कि उसके अशुभ कर्मों में भाग्य उसका साथ देता है | नवम भाव धर्म का भाव है | धर्म कर्म में व्यक्ति की रूचि तभी होगी जब यह स्थान शुभ ग्रहों से विभूषित होगा | यदि यहाँ पाप ग्रहों का साया हो तो व्यक्ति नास्तिक होता है | बुद्धिजीवी होने के फायदे हों न हों परन्तु धर्म कर्म के प्रभाव को समझना बुद्धिजीवियों के वश की बात नहीं | इसीलिए वे प्रकृति के इस वरदान से वंचित रह जाते हैं | धर्म के रास्ते में चमत्कार अक्सर देखे सुने जाते रहे हैं परन्तु धर्म में रूचि ही नहीं होगी तो क्या लाभ | मैं बात कर रहा हूँ उन मन्त्रों की जो व्यक्ति के दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने की क्षमता रखते हैं

ज्योतिष में नवम भाव का महत्व

“प्रसन्नज्ञान” में “भट्टोत्पल” के अनुसार, नौवां भाव कुएं, झीलों, टैंकों, मंदिरों, तीर्थयात्रा और शुभ कर्मों का प्रतिनिधित्व करता है। वहीं कालिदास के अनुसार, दान, गुण, पवित्र स्थानों की यात्रा, अच्छे लोगों के साथ संबंध, वैदिक बलिदान, अच्छा आचरण, दिमाग की शुद्धता, बुजुर्गों, तपस्या, औषधि, दवा, किसी की नीति, भगवान की पूजा, उच्च शिक्षा का अधिग्रहण, गरिमा, पौराणिक कथाओं, नैतिक अध्ययन, लंबी यात्रा, पैतृक संपत्ति, घोड़े, हाथी और भैंस (धार्मिक उद्देश्यों से जुड़े), और धन का संचलन नवम भाव के द्वारा देखा जाता है। कुंडली में स्थित नवम भाव “विश्वास का भाव” भी है। इस भाव के माध्यम से यह ज्ञात होता है कि व्यक्ति के पिछले जन्मों के अच्छे कार्यों का फल वर्तमान जीवन में भाग्य के रूप में प्राप्त होता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने पिछले जीवन में किए गए कार्यों के आधार पर फल पाने का पात्र है। नवम भाव जातक को भाग्य के माध्यम से सफलता की ऊँचाइयों पर पहुँचाता है।कुंडली में नवम भाव के प्रभाव से जातक का स्वभाव धार्मिक, समर्पित, रूढ़िवादी और दयालु होता है। “काल पुरुष कुंडली” में इस भाव की राशि “धनु” है और धनु राशि का प्राकृतिक स्वामी “बृहस्पति” ग्रह होता है। पाश्चात्य ज्योतिष में, दसवें भाव को पिता का भाव कहा जाता है, जबकि हिंदू ज्योतिष में, नौवें भाव को पिता के भाव के रूप में माना जाता है। पिता के लिए नवम और दशम भाव की भविष्यवाणियों की जाँच करने के बाद, यह सिद्ध होता है नवम भाव ही पिता का वास्तविक भाव होता है। इसलिए वास्तविक रूप से नवम भाव पिता को इंगित करता है जबकि दशम भाव पिता की आयु को बताता है।

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सत्य संहिता के लेखक कहते हैं कि कुंडली के इस भाव से शेष भावों और दूसरों से अनुकूलता की जाँच की जाती है। मेदिनी ज्योतिष के अनुसार, कुंडली में नवम भाव न्यायिक-व्यस्था, सुप्रीम कोर्ट, न्यायाधीश, क़ानून, अदालत, वैश्विक क़ानून, नैतिक, धर्म, राजनयिक, विदेशी मिशन, प्रगति और विकास को दर्शाता है। नवम भाव से हवाई यात्रा, नौवहन, समुद्री यातायात, विदेशी आयात और निर्यात, समुद्र और तटों के आसपास मौसम की स्थिति और लंबी दूरी की यात्रा का विचार किया जाता है। यह संयुक्त राष्ट्र, विश्व संगठन, विदेश मामलों के मंत्रालय, राजनयिक, विदेशी देशों के साथ संबंध, विदेशी देशों, नौवहन, नौसेना, नौसैनिक मामलों के साथ व्यवहार का प्रतिनिधित्व करता है। यह भाव प्रकाशन उद्योग – विज्ञापन और सार्वजनिक मामलों से भी संबंधित है। नवम भाव धर्म, मस्जिद, मंदिर, चर्च, धार्मिक किताबें जैसे वेद, पुराण, बाइबिल, कुरान आदि पवित्र स्थानों तथा वस्तुओं से संबंध रखता है। यह वाणिज्यिक शक्ति, केबल, तार, रेडियो, टीवी आदि जैसे लंबी दूरी के संचार को भी दर्शाता है। यह क़ानून मंत्रालय का प्रतिनिधित्व करता है।

कुंडली में नवम भाव से क्या देखा जाता है?

धार्मिक जीवन

भाग्य

राजयोग

संतान

गुरु

पिता

धार्मिक यात्रा

नवम भाव का अन्य भावों से संबंध

ज्योतिष में नवम भाव कुंडली के अन्य भाव से भी अंतर्संबंध रखता है। यह शिक्षकों, प्रचारकों, तीर्थयात्रा, आदि का प्रतिनिधित्व करता है। यदि आप किसी लाचार व्यक्ति की मदद करते हैं तो आपका नवम सक्रिय हो जाता है। यह भाव विदेश यात्रा और आध्यात्मिक ज्ञान, ब्रह्मांड, दर्शन, गुरु, स्नातकोत्तर शिक्षा, पीएचडी, मालिकों, शक्तियों की छिपी शक्ति, विदेशी स्थानों से पैसे कमाने की क्षमता, पारिवारिक संपदा का विनाश, पारिवारिक संपदा का अंत आदि को भी दर्शाता है। कुंडली में नवम भाव से आपके भाई-बहनों के जीवनसाथी, स्वास्थ्य, बीमारी और माता का कर्ज एवं बाधाएं; बच्चों, संतान की रचनात्मक अभिव्यक्ति, दुश्मन आदि को देखा जाता है। जन्म कुंडली के नवम भाव से निवास, मामा की धन जायदाद, जीवनसाथी के भाई-बहन, संचार-शैली, छुपी हुई क्षमता, बेरोज़गारी और नौकरी या करियर, करियर से संबंधित यात्रा, छोटे भाई-बहन आपके पिता और पिता के संचार कौशल, पिता और दादी माँ का आध्यात्मिक दृष्टिकोण को देखा जाता है। यह भाव जातक के आध्यात्मिक जीवन के कर्मों का प्रतिनिधित्व करता है। इसके साथ आध्यात्मिक मार्ग, दान-पात्र के स्थान, पानी का भंडारण इत्यादि को दर्शाता है।

लाल किताब के अनुसार नवम भाव

लाल किताब के अनुसार, यह भाव पिता, दादा, भाग्य, धर्म, कर्म, घर का फर्श, परिवार के बड़े व्यक्ति, पुराने घर से प्राप्त धन या विरासत का प्रतिनिधित्व करता है। कुंडली के नवम भाव के द्वारा जीवन में समृद्धि और खुशहाली को भी देखा जाता है। यदि तीसरे और पांचवें भाव में कोई ग्रह नहीं है तो इस भाव पर स्थित ग्रह निष्क्रिय रहेंगे। पांचवें भाव में ग्रह की उपस्थिति इस भाव के घरों को सक्रिय बनाती है। इस प्रकार आप देख सकते हैं कि नवम भाव सभी भावों में कितना प्रमुख है। इस भाव से आपका भाग्य और जीवन में प्राप्त होने वाले लाभांश को देखा जाता है। यह ध्यान रखने वाली बात है कि कोई भी व्यक्ति अपनी किस्मत से ज्यादा और समय से पहले कुछ भी प्राप्त नहीं करता है।

‘मानसागरी’ ग्रंथ के अनुसार:-

‘‘विहाय सर्वं गणकैर्विचिन्त्यो भाग्यालयः केवलमन्न यलात्।’’

अर्थात्’ ‘‘एक ज्योतिषाचार्य को दूसरे सब भावों को छोड़कर केवल नवम् भाव का यत्नपूर्वक विचार करना चाहिए, क्योंकि नवम् भाव का नाम भाग्य है।

समझें भाग्योदय काल को

त्रिक भावों (6, 8, 12) के अतिरिक्त अन्य भाव में स्थित नवमेश अपने बलानुसार उस भाव के कारकत्व के फल में वृद्धि करता है। नवमेश, नवम भाव स्थित ग्रह तथा नवम भाव पर दृष्टि डालने वाले ग्रहों की दशा में भाग्योदय होता है। ‘फलित मार्तण्ड’ ग्रंथ के अनुसार नवमेश, नवम भाव स्थित ग्रह व नवम भाव पर दृष्टिपात करने वाले बलवान ग्रह अपने निर्धारित वर्ष में जातक का भाग्योदय करते हैं।

ग्रहों के भाग्योदय वर्ष इस प्रकार हैं

सूर्य- 22, चंद्रमा- 24, मंगल- 28, बुध-32, बृहस्पति -16 (40), शुक्र-21 (25), शनि-36, राहु-42 और केतु -48 वर्ष।

बृहत पाराशर होरा शास्त्र ग्रंथ के अनुसार

  1. भाग्य स्थान में बृहस्पति और भाग्येश केंद्र में हो तो 20वें वर्ष से भाग्योदय होता है।
  2. यदि नवमेश द्वितीय भाव में और द्वितीयेश नवम भाव में हो तो 32वें वर्ष से भाग्योदय, वाहन प्राप्ति और यश मिलता है।
  3. यदि बुध अपने परमोच्चांश (कन्या राशि-150 ) पर और भाग्येश भाग्य स्थान में हो तो जातक का 36वें वर्ष से भाग्योदय होता है।

सौभाग्यकारी गोचर

  1. जब गोचर में नवमेश की लग्नेश से युति हो, या फिर परस्पर दृष्टि विनिमय हो अथवा लग्नेश का नवम भाव से गोचर हो तो भाग्योदय होता है। परंतु उस समय नवमेश निर्बल राशि में हो तो शुभ फल नहीं मिलता।
  2. नवमेश से त्रिकोण (5, 9) राशि में गुरु का गोचर शुभ फलदायक होता है।
  3. जब जन्म राशि से नवम्, पंचम या दशम भाव में चंद्रमा आए उस दिन जातक को शुभ फल की प्राप्ति होती है।

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दुर्भाग्य को नष्ट करने के उपाय

चाहे आपको ज्योतिष का ज्ञान हो या न हो, अपने भाग्य की स्थिति का ज्ञान तो हर व्यक्ति को होता है | अब यदि दुर्भाग्य पीछा न छोड़ रहा हो तो क्या ऐसा करें कि दुर्भाग्य सौभाग्य में बदल जाए| यह संभव है क्योंकि नवम भाव का स्वामी मारक नहीं होता इसलिए उसका रत्न अधिकतर फायदा ही देता है | नवम भाव के उपाय हमेशा काम करते हैं | यदि नवमेश का गहराई से अध्ययन करके उसके बलाबल का पता लगाया जाये तो आसान से उपायों से सौभाग्य को आमंत्रित किया जा सकता है |