ज्योतिष

माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को सरस्वती की पूजा के दिन के रूप में भी मनाया जाता है। धार्मिक ग्रंथों में ऐसी मान्यता है कि इसी दिन शब्दों की शक्ति ने मनुष्य के जीवन में प्रवेश किया था।

कन्या ग्रहण के विषय में मनु ने कहा है कि वह कन्या अधिक अंग वाली, वाचाल, पिंगल, वर्णवाली रोगिणी नहीं होनी चाहिए।

प्राचीन भारतीय संस्कृति में युवक-युवतियों को विवाह पूर्व मिलने-जुलने की अनुमति नहीं थी। माता- पिता अच्छा वर और खानदान देखकर उसका विवाह कर देते थे, लेकिन वर और कन्या की जन्म-कुण्डलियों का मिलान करवाना अत्यावश्यक समझा जाता था।

सप्तम भाव लन्म कुण्डली में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। लग्न से सातवाँ भाव ही दाम्पत्य व विवाह-कारक माना गया है। इस भाव एवं इस भाव के स्वामी के साथ ग्रहों की स्थिति व दृष्टि संबंध के अनुसार उस जातक पर शुभ-अशुभ प्रभाव पड़ता है।

विवाह मे आशौच आदि की सभावना हो तो 10 दिनो पहले नान्दी मुख श्राद्ध करना चाहिये नान्दी मुख श्राध्द के बाद विवाह सम्पन्न आशौच होने पर भी वर-वघु को और करना चाहिये

यह अमावस्या दुख-दारिद्र्य दूर करने तथा और सभी को सफलता दिलाने वाली मानी गई है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान से विशेष पुण्यलाभ प्राप्त होता है।

विवाह होने वाला है, वह जातक क्या करें या किस देवी-देवता का पूजन करें, ताकि उनके गृहस्थ जीवन में सुख, शांति व वैभव बना रहे।

कन्या का विवाह यदि सही समय पर न हो तो माता-पिता का चिंतित होना जरुरी है। वर्तमान समय में यह एक आम समस्या हो गई है। अगर आप चाहते हैं कि आपकी लड़की की शादी जल्दी किसी अच्छे घर में हो जाएं तो नीचे लिखा टोटका करने से आपकी यह समस्या दूर हो जाएगी।

बृहस्पति को देवताओं का गुरु माना जाता है इनकी पूजा से विवाह के मार्ग में आ रही सभी अड़चनें स्वत:...