कब और कैसे करें महालय वर्ष 2019 में श्राद्ध

यदि उक्त विधि को करना किसी के लिए संभव न हो, तब वह जल को पात्र में काले तिल डालकर दक्षिण दिशा की ओर मुँह करके तर्पण कर सकता है।

भाद्रपद (भादों मास) की पूर्णिमा से प्रारंभ होकर आश्विन मास की अमावस्या तक कुल सोलह तिथियां श्राद्ध पक्ष की होती है। इस पक्ष में सूर्य कन्या राशि में होता है। इसीलिए इस पक्ष को कन्यागत अथवा कनागत भी कहा जाता है। श्राद्ध का ज्योतिषीय महत्त्व की अपेक्षा धार्मिक महत्व अधिक है क्योंकि यह हमारी धार्मिक आस्था से जुड़ा हुआ है। पितृलोक के स्वामी अर्यमा सभी मृत (आत्मा) प्राणियों को अपने-अपने स्थान पर श्राद्ध का अवसर प्रदान करते हैं। आश्विन कृष्ण पक्ष में जब सूर्य कन्या राशि पर गोचर कर रहा हो, तब पितरों के निमित्त श्रद्धापूर्वक किया गया दान, तर्पण, भोजन पिण्ड आदि उन्हें मिलता है।

जिस तिथि में जिस पूर्वज का स्वर्गवास हुआ हो उसी तिथि को उनका श्राद्ध किया जाता है जिनकी परलोक गमन तिथि ज्ञान न हो, उन सबका श्राद्ध अमावस्या को किया जाता है।

विशेष — श्राद्ध पक्ष 2019 पर—

ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया की शतभिषा नक्षत्र में शुरू हो रहे पितृ आराधना के पर्व में श्राद्ध करने से सौ प्रकार के तापों से मुक्ति मिलेगी। इस वर्ष भाद्रपद माह की पूर्णिमा पर 13 सितंबर 2019 ( शुक्रवार) को शततारका (शतभिषा) नक्षत्र,धृति योग,वणिज करण एवं कुंभ राशि के चंद्रमा की साक्षी में श्राद्ध पक्ष का आरंभ हो रहा है।शास्त्रीय गणना से देखें तो पूर्णिमा तिथि के स्वामी चंद्रमा हैं। शततारका नक्षत्र के स्वामी वरुण देव तथा धृति योग के स्वामी जल देवता हैं

विशेष बात यह है कि श्राद्ध पक्ष का समापन 28 सितंबर 2019 को शनिश्चरी अमावस्या के संयोग में होगा। दिन पितरों की पूजा के साथ ही शनिदेव की पूजा का विशेष रूप से महत्व है। पण्डित दयानन्द शास्त्री जी कहते हैं की इस दिन शनिदेव की पूजा करने से, उनके निमित्त उपाय करने से शनिदेव बहुत जल्दी खुश होते हैं, साथ ही जन्मपत्रिका में अशुभ शनि के प्रभाव से होने वाली परेशानियों, जैसे शनि की साढे-साती, ढैय्या और कालसर्प योग से भी छुटकारा मिलता है। 28 सितम्बर 2019 को सर्वपितृ अमावस्या पर शनिश्चरी का संयोग 20 वर्ष बाद बन रहा है जब भाद्रपद मास की पूर्णिमा से श्राद्ध पक्ष का आरंभ होगा। हालांकि पक्षीय गणना से अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से पितृ पक्ष बताया गया है। चूंकि पंचागीय गणना में मास का आरंभ पूर्णिमा से होता है। इसलिए पूर्णिमा श्राद्ध पक्ष का पहला दिन माना गया है।इसके बाद पक्ष काल के 15 दिन को जोड़कर 16 श्राद्ध की मान्यता है।

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इस दिन पितरों के नाम की धूप देने से मानसिक व शारीरिक तौर पर तो संतुष्टि या कहें शांति प्राप्त होती ही है लेकिन साथ ही घर में भी सुख-समृद्धि आयी रहती है। सभी प्रकार के कष्ट दूर हो जाते हैं। हालांकि प्रत्येक मास की अमावस्या तिथि को पिंडदान किया जा सकता है लेकिन आश्विन अमावस्या विशेष रूप से शुभ फलदायी मानी जाती है। पितृ अमावस्या होने के कारण इसे पितृ विसर्जनी अमावस्या या महालया भी कहा जाता है। मान्यता यह भी है कि इस अमावस्या को पितृ अपने प्रियजनों के द्वार पर श्राद्धादि की इच्छा लेकर आते हैं। यदि उन्हें पिंडदान न मिले तो शाप देकर चले जाते हैं जिसके फलस्वरूप घरेलू कलह बढ़ जाती है व सुख-समृद्धि में कमी आने लगती है और कार्य भी बिगड़ने लगते हैं। इसलिये श्राद्ध कर्म अवश्य करना चाहिये।पितृ जल से तृप्त होकर सुख-समृद्धि तथा वंश वृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। इसलिए श्राद्ध पक्ष की शुरुआत में पंचांग के पांच अंगों की स्थिति को अतिविशिष्ट माना जा रहा है।श्राद्ध पक्ष का आरंभ शतभिषा (शततारका) नक्षत्र में हो रहा है।

क्यों हैं बना विशेष संयोग–

नक्षत्र मेखला की गणना से देखें तो शतभिषा नक्षत्र (शततारका) के तारों की संख्या 100 है। इसकी आकृति वृत्त के समान है। यह पंचक के नक्षत्र की श्रेणी में आता है। यह शुक्ल पक्ष में पूर्णिमा के दिन विद्यमान है। इसलिए यह शुभफल प्रदान करेगा। श्राद्ध पक्ष में श्राद्धकर्ता को पितरों के निमित्त तर्पण पिंडदान करने से लौकिक जगत के 100 प्रकार के तापों से मुक्ति मिलेगी । वहीं वणिज करण की स्वामिनी माता लक्ष्मी हैं। ऐसे में विधि पूर्वक श्राद्ध करने से परिवार में माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होगी।

सर्वपितृ अमावस्या तिथि – 28 सितंबर 2019, शनिवार

कुतुप मुहूर्त – 11:48 से 12:35

रौहिण मुहूर्त – 12:35 से 13:23

अपराह्न काल – 13:23 से 15:45

अमावस्या तिथि आरंभ – 03:46 बजे (28 सितंबर 2019)

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अमावस्या तिथि समाप्त – 23:56 बजे (28 सितंबर 2019)

शनि अमावस्या को करें इन चीजों का दान करें–

  1. शनि अमावस्या के दिन काली उड़द काले जूते, काले वस्‍त्र, काली सरसों का दान करें।
  2. 800 ग्राम तिल तथा 800 ग्राम सरसों का तेल दान करें।
  3. काले कपड़े, नीलम का दान करें।
  4. हनुमानजी को चोला चढ़ाएं। हनुमान चालीसा का अधिक से अधिक दान करें। काले कपड़े में सवा किलोग्राम काला तिल भर कर दान करें। पीपल के वृक्ष पर सात प्रकार के अनाज चढ़ाकर बांट दें।

ध्यान रखें, शनि अमावस्या के दिन गलती से भी अपने घर लोहा या लोहे से बनी चीजें, नमक, काली उड़द दाल, काले रंग के जूते और तेल घर में नहीं लाना चाहिए। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि इन चीजों को घर लाने से दरिद्रता आती है।

ऐसे करें भगवान शनि को प्रसन्न 

अगर जन्मपत्रिका में शनि दोष के कारण आपके काम ठीक से नहीं बन पा रहे हैं, आपके कामों में अड़चनें आ रही हैं, तो शनि अमावस्या के दिन घर पर शमी, जिसे खेजड़ी भी कहते हैं, का पेड़ लाकर गमले में लगाइए और उसके चारों तरफ गमले में काले तिल डाल दीजिये।

‘शमी शम्यते पापं’, यानी शमी का पेड़ पापों का शमन करता है और परेशानियों से मुक्ति दिलाता है। अतः आज के दिन शमी का पेड़ जरूर लगाएं और उसके आगे सरसों के तेल का दीपक जलाकर

“ऊँ शं यो देवि रमिष्ट्य आपो भवन्तु पीतये, शं योरभि स्तवन्तु नः।”

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मंत्र का 11 बार जप करें। इससे शनिदेव आपसे प्रसन्न होंगे और आपको जल्द ही परेशानियों से छुटकारा मिलेगा।

अगर आप पर शनि देव की टेढ़ी नजर है, यानी साढ़ेसाती और ढैय्या का प्रभाव चल रहा है, तो काली गाय को बूंदी के लड्डू खिलाएं।

शनि पीड़ा शमन के लिए करें इन मंत्र का जाप–

नीलान्जन समाभासम् – रविपुत्रम यमाग्रजम छाया मार्तण्ड सम्भूतम- तम नमामि शनैश्चरम कोणस्थ: पिंगलो बभ्रु: कृष्णौ रौद्रोंतको यम: सौरी: शनिश्चरो मंद:पिप्पलादेन संस्तुत: ॐ प्रां प्रीं प्रौं शं शनैश्चराय नम: ॐ शं शनैश्चराय नम:।।

इस वर्ष महालय (पितृ पक्ष) 2019 के निमित्त श्राद्ध की तिथियां ये रहेगी–

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13 सितंबर- पूर्णिमा श्राद्ध

14 सितंबर- प्रतिपदा

15 सितंबर- द्वितीया

16 सितंबर– तृतीया

17 सितंबर- चतुर्थी

18 सितंबर- पंचमी, महा भरणी

19 सितंबर- षष्ठी

20 सितंबर- सप्तमी

21 सितंबर- अष्टमी

22 सितंबर- नवमी

23 सितंबर- दशमी

24 सितंबर- एकादशी

25 सितंबर- द्वादशी,

26 सितंबर- त्रयोदशी

27 सितंबर- मघा चतुर्दशी  श्राद्ध,

28 सितंबर- सर्वपित्र अमावस्यासर्वपितृ अमावस्या – 28 सितंबर 2019

पितृ पक्ष का अन्तिम दिन सर्वपित्रू अमावस्या या महालय अमावस्या के नाम से जाना जाता है। पितृ पक्ष में महालय अमावस्या सबसे मुख्य दिन होता है।

जानिए वेद पुराण और स्मृतिग्रंथों के अनुसार श्राद्ध कौन कर सकता है ??

किसी भी मृतक के ‘अन्तिम संस्कार’ और श्राद्धकर्म की व्यवस्था के लिए प्राचीन वैदिक ग्रन्थ ‘गरुड़पुराण’ में कौन-कौन से सदस्य पुत्र के नहीं होने पर श्राद्ध कर सकते है, उसका उल्लेख अध्याय ग्यारह के श्लोक सख्या- 11, 12, 13 और 14 में विस्तार से किया गया है, जैसे-

पुत्राभावे वधु कूर्यात ..भार्याभावे च सोदनः।

शिष्यो वा ब्राह्मणः सपिण्डो वा समाचरेत॥

ज्येष्ठस्य वा कनिष्ठस्य भ्रातृःपुत्रश्चः पौत्रके।

श्राध्यामात्रदिकम कार्य पु.त्रहीनेत खगः॥

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अर्थात “ज्येष्ठ पुत्र या कनिष्ठ पुत्र के अभाव में बहू, पत्नी को श्राद्ध करने का अधिकार है। इसमें ज्येष्ठ पुत्री या एकमात्र पुत्री भी शामिल है। अगर पत्नी भी जीवित न हो तो सगा भाई अथवा भतीजा, भानजा, नाती, पोता आदि कोई भी यह कर सकता है। इन सबके अभाव में शिष्य, मित्र, कोई भी रिश्तेदार अथवा कुल पुरोहित मृतक का श्राद्ध कर सकता है। इस प्रकार परिवार के पुरुष सदस्य के अभाव में कोई भी महिला सदस्य व्रत लेकर पितरों का श्राद्ध व तर्पण और तिलांजली देकर मोक्ष कामना कर सकती है।

अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य :-

जिन व्यक्तियों की सामान्य मृत्यु चतुर्दशी तिथि को हुई हो, उनका श्राद्ध केवल पितृ पक्ष की त्रयोदशी अथवा अमावस्या को किया जाता है। जिन व्यक्तियों की अकाल-मृत्यु (दुर्घटना, सर्पदंश, हत्या, आत्महत्या आदि) हुई हो, उनका श्राद्ध केवल चतुर्दशी तिथि को ही किया जाता है। सुहागिन स्त्रियों का श्राद्ध केवल नवमी को ही किया जाता है।

नवमी तिथि माता के श्राद्ध के लिए भी उत्तम है।

संन्यासी पितृगणों का श्राद्ध केवल द्वादशी को किया जाता है।

पूर्णिमा को मृत्यु प्राप्त व्यक्ति का श्राद्ध केवल भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा अथवा आश्विन में कृष्ण पक्ष की अमावस्या को किया जाता है।

नाना-नानी का श्राद्ध केवल आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को किया जाता है।

पितरों के श्राद्ध के लिए ‘गया’ को सर्वोत्तम माना गया है, इसे “तीर्थों का प्राण” तथा “पाँचवा धाम” भी कहते है।

माता के श्राद्ध के लिए काठियावाड़ में ‘सिद्धपुर’ को अत्यन्त फलदायक माना गया है। इस स्थान को ‘मातृगया’ के नाम से भी जाना जाता है।

गया में पिता का श्राद्ध करने से पितृऋण से तथा सिद्धपुर में माता का श्राद्ध करने से मातृऋण से सदा-सर्वदा के लिए मुक्ति प्राप्त होती है।

श्राद्ध में आमंत्रित ब्राह्मण के पैर धोकर आदर सहित आसन पर बैठाना चाहिए तथा तर्जनी से चंदन-तिलक लगाना चाहिए। श्राद्धकर्म में अधिक से अधिक तीन ब्राह्मण पर्याप्त माने गये हैं। श्राद्ध के लिए बने पकवान तैयार होने पर एक थाली में पाँच जगह थोड़े-थोड़े सभी पकवान परोसकर हाथ में जल, अक्षत, पुष्प, चन्दन, तिल ले कर पंचबलि (गाय, कुत्ता, कौआ, देवता, पिपीलिका) के लिए संकल्प करना चाहिए।पंचबलि निकालकर कौआ के निमित्त निकाला गया अन्न कौआ को, कुत्ते का अन्न कुत्ते को तथा अन्य सभी अन्न गाय को देना चाहिए। तत्पश्चात् ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। ब्राह्मण भोजन के पश्चात उन्हें अन्न, वस्त्र, ताम्बूल (पान का बीड़ा) एवं दक्षिणा आदि देकर तिलक कर चरणस्पर्श करना चाहिए। ब्राह्मणों के प्रस्थान उपरान्त परिवार सहित स्वयं भी भोजन करना चाहिए। श्राद्ध के लिए शालीन, श्रेष्ठ गुणों से युक्त, शास्त्रों के ज्ञाता तथा तीन पीढि़यों से विख्यात ब्राह्मण का ही चयन करना चाहिए। योग्य ब्राह्मण के अभाव में भानजे, दौहित्र, दामाद, नाना, मामा, साले आदि को आमंत्रित किया जा सकता है। श्राद्ध के लिए आमंत्रित ब्राह्मण की जगह किसी अन्य को नहीं खिलाना चाहिए। श्राद्धभोक्ता को भी प्रथम निमंत्रण को त्यागकर किसी अन्य जगह नहीं जाना चाहिए। भोजन करते समय ब्राह्मण को मौन धारण कर भोजन करना चाहिए तथा हाथ के संकेत द्वारा अपनी इच्छा व्यक्त करनी चाहिए।

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विकलांग अथवा अधिक अंगों वाला ब्राह्मण श्राद्ध के लिए वर्जित है। श्राद्धकर्ता को सम्पूर्ण पितृ पक्ष में दातौन करना, पान खाना, तेल लगाना, औषध-सेवन, क्षौरकर्म (मुण्ड़न एवं हजामत) मैथुन-क्रिया (स्त्री-प्रसंग), पराये का अन्न खाना, यात्रा करना, क्रोध करना एवं श्राद्धकर्म में शीघ्रता वर्जित है। माना जाता है कि पितृ पक्ष में मैथुन (रति-क्रीड़ा) करने से पितरों को वीर्यपान करना पड़ता है।श्राद्धकर्ता को प्रतिदिन पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए स्नान के बाद तर्पण करना चाहिए। श्राद्धकर्म में दौहित्र (पुत्री का पुत्र), कुतप (मध्यान्हः का समय), काले तिल एवं कुश अत्यन्त पवित्र माने गये है। संध्या और रात्रि के समय श्राद्ध नहीं करना चाहिए, किंतु ग्रहण काल में रात्रि को भी श्राद्ध किया जा सकता है। उज्जैन स्थित गया कोठा या सिद्धवट पर, गया जी,सिद्धपुर गुजरात के मातृगया , नारायणी शिला जो हरिद्वार में हैं गंगा किनारे पर, पिशानमोचन कुंड प्रयाग, ब्रह्म सरोवर कुरुक्षेत्र तथा अन्य प्रमुख तीर्थों में श्राद्ध करने से पितर सर्वदा सन्तुष्ट रहते हैं। श्राद्धकर्म में श्रद्धा, शुद्धता, स्वच्छता एवं पवित्रता पर विशेष ध्यान देना चाहिए, इनके अभाव में श्राद्ध निष्फल हो जाता है। श्राद्धकर्म से पितरों को शांति एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है तथा प्रसन्न एवं तृप्त पितरों के आर्शीवाद से हमें सुख, समृद्धि, सौभाग्य, आरोग्य तथा आनन्द की प्राप्ति होती है

ध्यान रखने योग्य तथ्य :-

श्राद्धकर्म में कुछ विशेष बातों का ध्यान रखा जाता है, जैसे-

श्राद्ध के दिन पवित्र भाव से पितरों के लिए भोजन बनवाएँ और श्राद्ध कर्म सम्पन्न करें।

मध्याह्न में कुश के आसन पर स्वयं बैठें और ब्राह्मण को भी बिठाएँ। एक थाली में गाय, कुत्ता और कौवे के लिए भोजन रखें। दूसरी थाली में पितरों के लिये भोजन रखें। इन दोनों थाली में भोजन समान ही रहेगा। सबसे पहले एक-एक करके गौ, कुत्ता और कौवे के लिए अंशदान करें और उसके बाद अपने पितरों का स्मरण करते हुए निम्न मंत्र का तीन बार जाप करें-

“ॐ देवाभ्य: पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च।

नम: स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव भवन्तु ते।।”

यदि उक्त विधि को करना किसी के लिए संभव न हो, तब वह जल को पात्र में काले तिल डालकर दक्षिण दिशा की ओर मुँह करके तर्पण कर सकता है।

यदि घर में कोई भोजन बनाने वाला न हो, तो फल और मिष्ठान आदि का दान कर सकते हैं।