आयुर्वेद आयु का वेद है। प्राचीन चिकित्सा विज्ञान का उद्देश्य कारोबार या व्यापार नहीं था। मनुष्य को रोगरहित दीर्घजीवी बनाना ही आयुर्विज्ञान का लक्ष्य था। वैद्य समाजसेवी थे।

सत्याग्रह सत्य का आग्रह है। भारत में सत्य के तमाम पहलुओं पर विचार की प्राचीन परम्परा है। वैदिक दर्शन के अनुसार काल से अप्रभावित सत्ता सत्य है। इसके लिए सुंदर शब्द प्रयोग हुआ है त्रिकाल अबाधित। सत्य पर भूत, भविष्य और वर्तमान का प्रभाव नहीं पड़ता। यह परिभाषा दर्शन की है और श्रेय है। दैनिक जीवन में हम सबका सत्य प्रत्यक्ष सत्य है। प्रत्यक्ष का सामान्य अर्थ आंख के सामने होता है। इस शब्द में अक्ष का अर्थ आंख है। साक्षात्कार का अर्थ भी लगभग ऐसा ही है। इसमें आंख के सामने उपस्थित आकार की महत्ता है।

इसके लिए सुंदर शब्द प्रयोग हुआ है- त्रिकाल अबाधित। सत्य पर भूत भविष्य और वर्तमान का प्रभाव नहीं पड़ता। यह परिभाषा दर्शन की है और श्रेय है।

सभी प्राणी बोलते है। अनेक पक्षी साथ-साथ बोलें तो कलरव। बोली अच्छी लगे तो कहते हैं कि पक्षी गीत गा रहे हैं। कोयल को बहुधा गायक कहा जाता है। सही बात कोयल ही जानती होगी कि वह गा रही है या किसी परिस्थितिवश बड़बड़ा रही है। कौवे खूब बोलते हैं। हम उनके प्रवचन को ‘‘कांव कांव’’ कहते हैं। मेढक भी बोलते हैं।

भारत पाक के मध्य युद्ध की स्थिति है। पाकिस्तान की तरफ से मुसलसल युद्ध है। आमने सामने के युद्धों में वह हारता रहा है। भारतीय सेना ने उसे हर दफा पीटा है। पाकिस्तानी फौज व खुफिया एजेंसी आई0एस0आई0के संयोजन में यहां आतंकवादी भेजे जाते हैं। पाकिस्तान आतंकवादी ट्रेनिंग की खुली यूनिवर्सिटी है।

भारत का स्वभाव राष्ट्रभाव है। कश्मीर पुलवामा की घटना के बाद यही राष्ट्रभाव चारों ओर प्रकट हो रहा है। यह अतिराष्ट्रवाद नहीं है। यह राजनैतिक दल तंत्र के किसी अभियान का परिणाम नहीं है। यह स्वाभाविक है। यह भारत के सभी राज्यों क्षेत्रों में एक समान प्रकट हो रहा है। यह राष्ट्रध्वज लेकर सड़क पर आक्रोश प्रकट करने वाले जनगण का स्वाभाविक मन है।

सतत् कर्म का कोई विकल्प नहीं है। प्रकृति की सभी शक्तियां गतिशील हैं। हम पृथ्वी से हैं, पृथ्वी में हैं। पृथ्वी माता है। पृथ्वी सतत् गतिशील है। वह सूर्य की परिक्रमा करते हुए अपनी धुरी पर नृत्य मगन रहती है। माता पृथ्वी के अंतस् में अपनी संतति को सुखी बनाए रखने की अभिलाषा है। इसलिए वह कोई अवकाश नहीं लेती।

स्वयं को जानना कठिन है। असंभव तो नहीं है लेकिन है बड़ा जटिल। जानने की गतिविधि में कम से कम दो भाग होते हैं। पहला जानने का इच्छुक व्यक्ति होता है और दूसरा जानने का विषय। ज्ञान प्राप्ति का इच्छुक व्यक्ति जानने के विषय से जुड़ता है। इन्द्रियबोध निर्णय देता है। हम उस विषय के जानकार हो सकते हैं। यहां इन्द्रियबोध का अर्थ आंख, कान, नाक, स्वादेन्द्रिय व स्पर्श नाम के पांच उपकरणों द्वारा प्राप्त संदेश है। स्वयं को जानने की कार्रवाई में हम स्वयं ज्ञान प्राप्ति की इच्छा करते हैं।

अमृत प्राचीन प्यास है। कोई मरना नहीं चाहता लेकिन सभी जीव मरते हैं। मृत्यु को शाश्वत सत्य कहा गया है। जीव मृत्यु बंधु है। मृत और अमृत परस्पर विरोधी जान पड़ते हैं पर हैं दोनों साथ-साथ।

स्वयं को जानना कठिन है। असंभव तो नहीं है लेकिन है बड़ा जटिल। जानने की गतिविधि में कम से कम...