हृदय नारायण दीक्षित

ऋग्वेद अतिप्राचीन असाधारण काव्य रचना है। इसके भीतर ऋग्वेद से भी पूर्व के वैदिक समाज के विवरण हैं। ऋग्वेद की भाषा व्यवस्थित है। इस स्तर की भाषा के विकास के लिए हजार दो हजार वर्ष का समय पर्याप्त नहीं है।

ऋग्वेद के रचनाकाल के पहले भी एक संस्कृति थी, सभ्यता थी और दर्शन भी था। ऋग्वेद में उपलब्ध संस्कृति व सभ्यता के तत्व पूर्व वैदिक काल का विस्तार हैं।

ऋग्वेद की इस अनुभूति का विस्तार अथर्ववेद में भूमि सूक्त है। यहां पृथ्वी हमारी माता है हम सब इसके पुत्र हैं - पुत्रो अहम् पृथित्याः। ऋग्वेद की इसी प्रेरणा से गंगा यमुना आदि नदियां माता हैं।

ऋग्वेद में दर्शन के बीज हैं। वे पौध बनने को आकुल व्याकुल हैं। अदिति और पुरूष जेसे प्रतीकों में वेदांत दर्शन का जन्म दिखाई पड़ता है। मन सम्बंधी प्रश्नों में परवर्ती योग दर्शन के सूत्र हैं। सांख्य वैशेषिक दर्शन व मीमांसा के भी सूत्र ऋग्वेद में हैं।

अग्नि ऋग्वेद के प्रतिष्ठित देवता हैं। ऋग्वेद के मंत्रोदय के पहले से ही भारत के लोग अग्नि उपयोग व तत्वदर्शन से सुपरिचित थे। वैदिक ऋषियों ने अग्नि की सर्वव्यापकता और सर्वसमुपस्थिति का साक्षात्कार किया था।

कारीगरों व श्रमिकों के सामजिक सम्मान व यश प्रतिष्ठा के मंत्र सूक्त बड़े प्यारे हैं। आधुनिक काल में सामाजिक न्याय की चर्चा होती है। संप्रति शिक्षित विद्वानों का आदर प्रथम है लेकिन वैदिक समाज के कारीगर ऋषियों से भी ज्यादा सम्मानित है।

वैदिक कवियों की भाव प्रकट करने की अपनी काव्यशैली है। वे गाय के प्रति आदरभाव से युक्त हैं। गाय संरक्षण योग्य है। ऋग्वेद में वह अबध्य बताई गई है। अथर्ववेद  में कहते हैं “जो गाय के कान को पीड़ा देते हैं वे देवों पर प्रहार करते हैं।” कुछ लोग अपनी गाय की पहचान के लिए परिचय चिन्ह बनाते रहे होंगे।

ऋग्वेद में अग्नि और आकाश के भी आत्मीय सम्बंध हैं। मनुष्य और अग्नि के मध्य भी आत्मीयता है। मनुष्य और पक्षियों के मध्य भी रागात्मक सम्बंध हैं।

जीवन दिक्काल में है। कभी-कभी काल का अतिक्रमण भी करता है जीवन, इसलिए जीवन की कालगणना सतही है। कालगणित के पैमाने पर कोई 100 वर्ष जीता है तो कोई 25 या 30 बरस। कीट पतंगे कम समय का जीवन पाते हैं। सर्प आदि की उम्र बहुत ज्यादा होती है। ऋग्वेद के पूर्वजों ने 100 शरद् जीवन की स्तुतियां की थी- जीवेम शरदं शतं। अनुवाद में गड़बड़ हुई। 100 शरद का अर्थ 100 वर्ष हो गया। शरद् में गहन आनंदबोध है।

ऋग्वेद के अनुसार ‘हम सब मृत्युबंधु हैं। क्षरणशील हैं। निस्संदेह व्यक्त हैं, व्यक्ति हैं लेकिन एक दिन मृत्यु अवश्यम्भावी है। ऋग्वेद (10.13.1) व यजुर्वेद (11.5) में एक साथ आए एक मंत्र में हम सब अमृतपुत्र हैं।