इसे देखकर आप भी ये मानेंगे ही नहीं बल्कि कहेंगे भी कि ऐसा होना आसान नहीं था !

  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

गुजरात में प्रधानमंत्री मोदी और राहुल गांधी की धड़ाधड़ होती रैलियों ने वहां के चुनाव को काफी रोचक बना दिया था। इस सब के बीच गुजरात में भाजपा ने छठी बार जीत दर्ज करके कांग्रेस को एक बार फिर दिखा दिया की प्रधानमंत्री मोदी जनता के दिलों पर अभी भी राज कर रहे हैं और गुजरात की जनता के दिलों में अभी भी उनके लिए काफी जगह बची है। भाजपा ने यहां बहुमत हासिल करके राहुल गांधी की तमाम कोशिशों पर पानी फेर दिया है।

लगातार छठी बार चुनाव जीतना किसी भी पार्टी के लिए किसी करिश्मे से कम नहीं। खासतौर से तब जब वो पार्टी केंद्र में सत्ताधारी हो और उसके पीएम के गृहराज्य में चुनाव हो। जिस तरह से नोटबंदी-जीएसटी को लेकर गुजरात में माहौल बना उससे भाजपा के लिए राज्य में सत्ताविरोधी लहर की आशंकाएं प्रबल हो रही थीं। लेकिन पीएम मोदी और अमित शाह के कुशल नेतृत्व ने वहां की जनता को अपने पक्ष में करने कामयाब रहे।

ये चुनाव भाजपा के लिए जितनी अहमियत रखता था, उससे कहीं ज्यादा ये कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए अहम था, फिलहाल राहुल गांधी की ताजपोशी का असर गुजरात के चुनाव में दिखा, इसलिए इस चुनाव से कांग्रेस को सबक लेना चाहिए और उसे अपना आंकलन करना चाहिए कि वो किन-किन मु्द्दों पर कमजोर पड़े, जिसकी वजह से वो जीतते-जीतते हार गए।

किसी भी राज्य के चुनाव में वहां की क्षेत्रीय भाषा में संबोधन का बड़ा महत्व होता है, इसलिए पीएम मोदी ने जब गुजरातियों से गुजराती में बात की तो लोगों को लगा कि ये तो अपना आदमी है, जबकि राहुल गांधी के भाषणों में इसकी कमी देखी गई। इसका मतलब ये हुआ कि कांग्रेस के पास गुजरात में कोई भी ऐसा गुजराती बड़ा नेता नहीं था, जो कि मंच पर गुजराती भाषा के जरिए मोदी को टक्कर दे सके, ये वो भारी कमी है, जिस पर कांग्रेस को काफी मेहनत करनी होगी। मोदी का गुजरात की जनता से जुड़ाव जिस दर्जे का है वो स्थानीय कांग्रेसी नेता भी 22 साल में नहीं बना सके हैं।राहुल गांधी ने 17 दिन गुजरात में बिताए और दिन-रात एक करते लोगों को लुभाने की कोशिश की लेकिन ऐसा क्या हुआ कि उनकी मेहनत वोट में तब्दील नहीं हो पाई, इसका सीधा कारण ये है कि कांग्रेस को संगठनात्मक रूप में ग्राउंड लेवल में काम करने की जरूरत है, तभी वो भाजपा को उनके गढ़ में हरा सकती है।

कांग्रेस ने इस बार चुनाव में खुला जातिकार्ड खेला। जिग्नेश-अल्पेश-हार्दिक के समर्थन की बदौलत गुजरात में वो विकास की जगह जातियों के समीकरण में उलझ कर रह गई और यही उसकी सबसे बड़ी गलती मानी जा सकती है।

मोदी हमेशा ही 6 करोड़ गुजरातियों की बात करते आए हैं और उन्होंने इस बार भी प्रचार में किसी एक पक्ष की तरफदारी नहीं की। मोदी भले ही गुजराती अस्मिता की बात करते हों लेकिन गुजरात के चुनाव नतीजों ने साबित कर दिया कि गुजरात के लिए ये चुनाव मोदी अस्मिता से जुड़े थे। भले ही उनके मन के किसी कोने में जीएसटी को लेकर नाराजगी रही हो लेकिन वो नाराजगी चुनाव में बदला लेने के लिए नहीं थी।

गुजरात के चुनाव में कांग्रेस ने जिस तरह से नोटबंदी और जीएसटी को मुद्दा बनाया वो अब साल 2019 के चुनाव के लिए भी बेमानी साबित हो गए क्योंकि गुजरात के नतीजों ने बता दिया कि पीएम मोदी का फैसला कबूल है। ऐसे में कांग्रेस को साल 2019 के महारण में उतरने के लिए नए मौकों और मुद्दों की तलाश होगी क्योंकि अबतक केंद्र की मोदी सरकार ने ऐसा कोई मौका नहीं दिया जिसने जनता का भरोसा तोड़ने का काम किया हो।

ऐसे में गुजरात चुनाव में कांग्रेस की हार के लिए जिम्मेदार कोई और नहीं बल्कि कांग्रेस की कमजोर चुनावी रणनीति और उनकी प्रधानमंत्री मोदी को लेकर कमजोर सोच रही है। पीएम मोदी गुजराती अस्मिता के प्रतीक बन गए हैं। राज्य के लोग इस बात पर गर्व करते रहे हैं कि उनके बीच का एक गुजराती देश का प्रधानमंत्री है। इसलिए पीएम मोदी ने जब गुजरातियों से अपने बेटे को जिताने की भावुक अपील की, तो राज्य के लोगों को इससे प्रभावित होना ही था। चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में की गई मोदी की अपील से गुजराती अस्मिता को लेकर संवदेनशील गुजरातियों ने भाजपा का साथ देना उचित समझा।

राहुल गांधी ने मेहनत तो बहुत की, लेकिन वे बाहरी होने और हिंदी भाषी होने की वजह से गुजरातियों से उस तरह से कनेक्ट नहीं हो पाए, जैसे कि पीएम मोदी। मोदी ने अपने सभी भाषण गुजराती में दिए जिससे स्वाभाविक रूप से ज्यादा से ज्यादा गुजरातियों तक वो अपनी बात पहुंचा पाए। दूसरी तरफ, राहुल गांधी हिंदी में भाषण दे रहे थे, जिसकी वजह से उनके भाषणों का मोदी के तुलना में ज्यादा असर नहीं रहा।

राज्य में कांग्रेस ने पाटीदार आंदोलन का समर्थन कर जाति कार्ड खेलने की पूरी कोशिश की। ऐसा लगता था कि अब तक जो गुजरात विकास और धार्मिक विभाजन के लिए जाना जाता था, अब वहां जातीय ध्रुवीकरण की राजनीति चलेगी। लेकिन नतीजों से ऐसा लगता है कि कांग्रेस की यह रणनीति कारगर नहीं हो पाई। खासकर अल्पेश ठाकुर और जिग्नेश मेवाणी अपनी सीट तो किसी तरह जीत गए लेकिन वो कांग्रेस के समर्थन में कोई बड़ा जातीय ध्रुवीकरण करने में नाकाम रहे।

मणिशंकर अय्यर द्वारा ऐन चुनाव अभियान के बीच पीएम मोदी को ‘नीच’ कहना और कपिल सिब्बल द्वारा राम मंदिर मामले की पैरवी में मामले को आगे टालने की अपील करना भी कांग्रेस के लिए भारी पड़ गया। पीएम मोदी ने अय्यर के इस बयान को लपक लिया और गुजरात के चुनाव अभियान में इस मसले को जमकर उठाया और इसे अपनी गरीबी और जाति से जोड़ दिया। राज्य की जनता मोदी का अपमान बर्दाश्त नहीं करती ये सोनिया गांधी के मौत के सौदागर वाले बयान से 2007 में ही साफ हो गया था। 10 साल बाद फिर वही कहानी दोहराई गई।

कांग्रेस कोई दमदार सीएम चेहरा नहीं पेश कर पाई। राज्य के दिग्गज नेता शंकर सिंह वाघेला पार्टी से बाहर हैं। कांग्रेस में शक्ति सिंह गोहिल, अुर्जन मोढवाडिया जैसे नेता थे, लेकिन वो खुद ही चुनाव नहीं जीत पा रहे। भरत सिंह सोलंकी ने तो चुनाव भी नहीं लड़ा। जाहिर है विजय रूपाणी के सामने कांग्रेस की ओर से कोई नहीं था। ऐसे में मुकाबला सीधे मोदी बनाम राहुल हो गया जिसमें राहुल कहीं नहीं टिक पाए।

राज्य की जनता में भाजपा से भले ही कुछ नाराजगी थी, लेकिन वह पीएम मोदी के मुकाबले राहुल गांधी पर भरोसा कम कर पाई। राहुल गांधी को अब तक अनिच्छुक राजनीतिज्ञ माना जाता रहा है और उनके नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी को कई राज्यों में हार का सामना करना पड़ा है। इन चुनावों में राहुल ने अपनी छवि सुधारी लेकिन वो मोदी के मुकाबले ज्यादा भरोसेमंद नहीं बन पाए इसलिए लोगों ने कांग्रेस की बजाय भाजपा को ही चुना।

कांग्रेस के जातीय ध्रुवीकरण की तुलना में भाजपा ने धार्मिक ध्रुवीकरण की अपनी पुरानी परिपाटी को इस बार भी आजमाया। राम मंदिर मुकदमे को टालने की कपिल सिब्बल की कोशिश से जहां हिंदू एकजुटता को बढ़ावा मिला, वहीं मणिशंकर अय्यर के घर हुई मीटिंग के खुलासे के बाद नरेंद्र मोदी ने बड़ी चालाकी से यह प्रचारित करना शुरू किया कि पाकिस्तान भी गुजरात में बीजेपी को हराना चाहता है। यही नहीं, जम्मू-कश्मीर के नेता सलमान निजामी के तमाम पुराने ट्वीट को प्रचारित कर भाजपा ने यह साबित करने की कोशि‍श की कि कांग्रेस के नेता देश विरोधी तत्वों का समर्थन करते हैं। इससे देशभक्ति और राष्ट्रवाद की भावना ने जोर पकड़ा और वोटर कांग्रेस से नहीं जुड़ पाए।

कांग्रेस का प्रचार अभियान शुरू में तो काफी जोरदार रहा, लेकिन बाद में जब पीएम मोदी ने अपना प्रचार अभियान तेज किया तो, राहुल गांधी इस रेस में पिछड़ गए। लोकसभा चुनाव के बाद पहली बार हुआ है कि भाजपा ने किसी राज्य के लिए इतनी मेहनत की है। गुजरात की सभी 182 सीटों को मोदी ने छूने की कोशिश की और 34 रैलियां कीं। कांग्रेस के ‘विकास पागल है’ अभियान को भी शायद इसलिए ज्यादा स्वीकार्यता नहीं मिल पाई, क्योंकि गुजरातियों का तो विकास पर भरोसा है ही।

ऐसा लगता है कि गुजरात का व्यापारी जीएसटी एवं नोटबंदी से परेशान और नाराज जरूर था, लेकिन जब वोट देने की बात आई तो वह भाजपा को छोड़ नहीं पाया। असल में व्यापारी समुदाय परंपरागत रूप से भाजपा का वोटर रहा है। सूरत में तमाम व्यापारी मीडिया से बातचीत में ऐसे संकेत भी दे रहे थे कि वे जीएसटी और नोटबंदी पर भले मोदी सरकार से नाराज हों, लेकिन वोट के दिन उनका मन बदल सकता है और शायद ही वे कांग्रेस को वोट दे पाएं।

चुनाव के मौके पर राहुल गांधी का मंदिर-मंदिर घूमना और पार्टी द्वारा उन्हें ‘जनेऊधारी ब्राह्मण’ बताना जनता को रास नहीं आया। ऐसा माना जा रहा है कि इस बार कांग्रेस ने सॉफ्ट हिंदुत्व कार्ड खेलने की कोशिश की और इसीलिए उसने अपने कोर वोटर मुसलमानों की कोई चर्चा भी नहीं की। लेकिन इन सबको कांग्रेस की चालबाजी ही समझा गया और जनता इसको मन से स्वीकार नहीं कर पाई।

Facebook Comments