संवाद समाज के गठन का मूल आधार है

अस्तित्व रहस्यपूर्ण है। सृष्टि का उद्भव हजारों साल से विश्व जिज्ञासा है। भारतीय इतिहास के वैदिक काल में भी सृष्टि उद्भव पर असाधारण जिज्ञासा थी। सारी दुनिया के वैज्ञानिक सृष्टि संचालन की गतिविधि खोजने में जुटे रहे, अभी भी जुटे हैं। प्रश्नाकुलता का इतिहास पुराना है। वैदिक साहित्य प्रश्न बेचैनी से उफनाता दिखाई पड़ता है और विश्व विज्ञान भी। लेकिन ब्रह्माण्ड रहस्यों की खोज में जुटे स्टीफेन हाकिंग विरल थे। आक्सफोर्ड इंग्लैण्ड में साल 1942 में जन्मे हाकिंग ने सृष्टि संचालन की गतिविधि पर आश्चर्यजनक परिश्रम किया। पूरा शरीर लकवाग्रस्त होने के बावजूद में आजीवन अपनी धुन में जुटे रहे। 14 मार्च 2011 को उनका निधन हो गया। उन्हें बारंबार प्रणाम करते हुए चित्त शोकग्रस्त है। उनसे मिलने का सौभाग्य पाने वाले स्वाभाविक ही ज्यादा दुखी हैं लेकिन बिना मिले ही उनकी विरल प्रतिभा से आश्चर्यचकित लोगों की संख्या करोड़ो में है। मैं स्वयं उनके नाम और यश से 1974 से ही प्रभावित हूँ। मैं छात्र जीवन से ही प्रश्नाकुल हँू। स्टीफेन हाकिंग को पढ़ना अपने ढंग का रम्य रोमांस है। उनके चित्र और कथन को जब कब टेलीविजन पर देखता सुनता रहा हूँ। उनके निधन ने विश्व जिज्ञासुओं को व्यथित किया है।

बच्चे प्रश्न करते हैं। बूढ़े नहीं करते। जो प्रश्न नहीं करते वे बच्चे और तरूण भी निराश बूढ़ों जैसे होते हैं। स्टीफेन हाकिंग का ऐसा ही एक कथन बड़ा प्यारा है, “मैं एक ऐसा बच्चा हूं जो कभी बड़ा नहीं हो पाया। मैं अभी भी ‘क्यों और कैसे’ जैसे प्रश्न पूछता रहता हूँ।” प्रश्न बेचैन बने रहना ही तरूणाई है। यही ज्ञान यात्रा का मूल धर्म भी है। ईसाइयत की धारणा में ईश्वर ही दुनिया का कर्ताधर्ता है। वह गलत कामों के लिए दण्डित भी करता है। हाकिंग ईसाइयत के प्रभाव क्षेत्र में पले, बढ़े। इसके बावजूद उन्होंने ईश्वर के अस्तित्व पर तीखे प्रश्न उठाए।

मान्यता है कि ईश्वर ने दुनिया बनाई। हाकिंग का प्रश्न है, “ब्रह्माण्ड की रचना के पहले ईश्वर क्या कर रहा था?” ऋग्वेद के ऋषि ने ऐसा ही प्रश्न जगत् निर्माता भगवान विश्वकर्मा से पूछा था, “आपने जगत् बनाया। पहले जगत् नहीं था। तब आप जगत् बनाते समय कहां बैठे? जगत नहीं था तो निर्माण की सामग्री कहां से लाए।” हाकिंग ने कहा है कि मैं मानता हूं ब्रह्माण्ड वैज्ञानिक नियमों से संचालित होता है। संभव है कि ये नियम भगवान ने बनाए हों। लेकिन भगवान इन नियमों में कोई हस्तक्षेप नहीं करता।” ऋग्वेद के ऋषि भी ब्रह्माण्ड को नियम संचालित बता गए हैं। ऋग्वेद में इन नियमों का नाम ऋत है और सभी देवता इन नियमों से बंधे हुए हैं – इन्द्र, अग्नि, जल, वायु आदि सभी शक्तियां ऋत नियमों के भीतर हैं।

Stephen Hawking

हाकिंग आत्मा को नहीं मानते थे। एक प्रतिष्ठित पत्रिका में कहा गया है – निधन को लेकर उनकी आत्मा की शांति में विश्राम करने की बात न कहें। टिप्पणी है कि रेस्ट इन पीस नहीं रेस्ट इन फिजिक्स कहें। टिप्पणी में अन्तर्विरोध हैं। जब आत्मा है ही नहीं तो फिजिक्स में भी विश्राम करने की बात बेतुकी है। हाकिंग ने आत्मा का अस्तित्व नहीं स्वीकार किया। लेकिन यह निष्कर्ष अंतिम नहीं कहा जा सकता। विज्ञान और दर्शन में ज्ञान का अंत नहीं होता। आत्मा अभी भी शोध योग्य है। प्रकृति सदा से है, सदा रहती है। प्रलयकाल में भी प्रकृति पूरी की पूरी नहीं मरती। वह अतिसूक्ष्म होकर भी अस्तित्वमान रहती है। हाकिंग का देह-अवसान हुआ है। उनके शोध जीवित हैं, उनके बोध अभी भी वर्तमान हैं। जीवन सतत् विकासशील है। इसमें क्षर-नाशवान और अक्षर-अनाशवान दोनो ही हैं। हाकिंग को और जीना चाहिए था। अभी भी बहुत कुछ शोध के लिए शेष है। उन्हें वर्तमान में बने रहना होगा। “दि थ्योरी ऑफ इवरीथिंग” में उन्होंने अनेक काम भविष्य के वैज्ञानिकों के लिए छोडे हैं। भविष्य के वैज्ञानिक उनका विस्तार होंगे।

Stephen Hawking

हाकिंग की जिज्ञासाएं वैदिक दर्शन से मिलती जुलती हैं। निष्कर्ष स्वाभाविक रूप में भिन्न हो सकते हैं लेकिन बिंग बैंग या महाविस्फोट के बाद विश्व निर्माण का निष्कर्ष ऋग्वेद से मिलता जुलता है। हाकिंग उसे बिग बैंग कहते हैं। ऋग्वेद का ऋषि इसके पहले समयहीन वायुहीन, मृत्यु और अमरत्वहीन स्थिति कहता है। तब देवता भी नहीं है। ऋग्वेद में देवताओं के पहले भी एक समय है। बिग बैंग के पहले भी ऐसा ही है। तब प्रकृति का सारा भूत और ऊर्जा एक बिन्दु पर हैं। ऋग्वेद में प्रकृति अव्यक्त से व्यक्त हुई। हाकिंग के संदर्भ में महाविस्फोट हुआ। आकाश छोटे और बड़े टुकड़ों से भर गया। ऋग्वेद के संदर्भ में देव नाचें। उनके नृत्य से आकाश धूलि कणों से भर गया। हाकिंग शरीर से कमजोर थे। मेधा और वैज्ञानिक प्रतिभा में विरल थे। लेकिन उनके पास पूर्वकालिक ज्ञान संपदा थी। अनेक निष्कर्ष और उपकरण भी थे। ऋग्वेद के ऋषियों के पास ऐसे साधन नहीं थे। अदम्य जिजीवीषा उनके पास भी थी, हाकिंग के पास भी थी। दोनो अविस्मरणीय हैं। ‘ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम’ खूबसूरत किताब है। हाकिंग की इस किताब को पढ़ने का अवसर कोई 10 वर्ष पहले मिला था। सभी वस्तुओं, घटनाओं और जीवन का इतिहास होता है। इतिहास प्रत्यक्ष भौतिक प्रपंचों या निष्कर्षो का समय विवरण होता है। इतिहास घटनाओं की समय तालिका है। क्या समय की भी कोई समय तालिका हो सकती है? क्या समय का भी इतिहास हो सकता है? ऋग्वेद के ऋषि ने नासदीय सूक्त में ‘तब न दिन था, न रात’ कहकर समयहीन स्थिति का उल्लेख किया है। समय का अस्तित्व गति में है। गति ही समय की माता है। समय का जन्म गति के गर्भ से हुआ।  हाकिंग ने भी समय का इतिहास बताते हुए लगभग ऐसी ही धारणाएं दी है। विज्ञान अभी भी प्रत्येक वस्तु, पदार्थ या घटना का अंतिम सिद्धांत नहीं तय कर पाया है। ईश्वर अभी भी असिद्ध है लेकिन उस जैसा प्रसिद्ध तत्व दुनिया में दूसरा नहीं। असिद्ध होकर भी प्रसिद्ध होना आश्चर्यजनक है। हाकिंग प्रसिद्ध वैज्ञानिक थे। बेशक वैज्ञानिकों को सिद्ध पर ही ध्यान देना चाहिए लेकिन प्रसिद्ध की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। उसे भी सोच विचार और वैज्ञानिक अध्ययन का विषय बनाए रखने में कोई नुकसान नहीं।संवाद समाज के गठन का मूल आधार है। विज्ञान में समाज की कोई चिन्ता नहीं होती। मनुष्य के अन्तर्मन की सुंदर अभिव्यक्ति सभ्यता है। सत्य, शिव और सुन्दर का प्रवाह संस्कृति है। वैज्ञानिक की रूचि सत्य में होती है शिव और सुंदर में नहीं। लेकिन हाकिंग ने समाज और मनुष्यता की भी चिन्ता की। कहा कि समाज, सभ्यता और संस्कृति के सरोकारों के पक्ष में होना जरूरी है। इसके अभाव में अपने समय की तीव्र बुद्धि का विकास नहीं हो सकता। यह खूबसूरत अवधारणा है कि संस्कृति के अभाव मं समाज की तीव्र बुद्धि का विकास नहीं होता। संस्कृति के विकास में संवाद की महत्ता है।

Stephen Hawking

उन्होंने संवाद की महत्ता पर कहा था, “मनुष्य की बड़ी सफलताएं संवाद से प्राप्त हुई हैं और विफलताएं संवादहीनता से। वे बिगड़ते पर्यावरण से चिंतित थे। सत्य और लोक कल्याण से जुड़े पृथ्वी ग्रह के इस परिपूर्ण मानव का निधन सारी दुनिया की क्षति है। कमजोर शरीर या शारीरिक अपंगता से जूझ रहे लोगों की प्रेरणा है उनका जीवन। दुनिया के सारे विद्यार्थियों को उनका अध्ययन करना चाहिए। बड़ी उम्र के मेरे जैसे विद्यार्थियों के लिए उनका जीवन प्रेरणादायी है। मृत्यु जब आएगी तब देखा जाएगा, अभी आज ही और आज से ही ज्ञानयात्रा की गति को तेज रफ्तार करने में उनका स्मरण प्रेरक है। उनकी स्मृति को प्रणाम।