द्रोणाचार्य अरुण जेटली को उनकी एक शिष्या की भावभीनी श्रद्धांजलि

मुमताज भल्ला ने अरुण जेटली के निधन के बाद उनको याद करते हुए लिखा कि शब्द किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व के साथ न्याय नहीं कर सकते हैं।

Written by: August 29, 2019 9:00 pm

24 अगस्त को भारतीय राजनीति का सबसे चमकदार ‘अरुण’ अस्त हो गया। देश ने अरुण जेटली के रूप में एक शानदार राजनेता, प्रखर वक्ता, सच्चा देशभक्त, बेहतरीन इंसान और अपनी सोच के जरिए समय से आगे सोचने की क्षमता रखनेवाले एक महान नेता को खो दिया। अरुण जेटली के असामयिक निधन ने पूरे देश के जनमानस को शोक में धकेल दिया। राजनीति में भी क्या पक्ष क्या विपक्ष सभी ने अरुण जेटली के इस असामयिक निधन पर अपनी संवेदना व्यक्त की। लेकिन अरुण जेटली के साथ काम करनेवाली उनकी एक शिष्या ने जिस तरह से उन्हें याद किया है वह आपकी आंखों में आंसू लाने के लिए काफी है। अरुण जेटली को याद करते हुए उनकी शिष्या मुमताज भल्ला ने बेहद ही भावुक आलेख लिखा है। मुमताज भल्ला ने अरुण जेटली के साथ लंबे समय तक काम किया।  मुमताज भल्ला ने अरुण जेटली को लेकर जो लिखा है वह सच में किसी को भी भावुक कर सकता है। भल्ला के इस पूरे आलेख को आप पढ़ेंगे तो आपको पता चलेगा कि अरुण जेटली का व्यक्तित्व कितना बड़ा था। वह एक राजनेता से इतर एक अच्छे इंसान थे जो हमेशा हर किसी की सहायता करने के लिए खड़े रहते थे। मुमताज भल्ला ने अरुण जेटली के निधन के बाद उनको याद करते हुए लिखा कि शब्द किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व के साथ न्याय नहीं कर सकते हैं, लेकिन जो शब्द मेरे पास आज हैं उससे उनके व्यक्तित्व को बेहतर तरीके से मैं लोगों के सामने रख सकती हूं वह भी तब जब मेरे गुरु मुझे छोड़कर चले गए हैं। मैं स्कूल में विज्ञान की छात्रा थी, मैंने कभी भी वकील बनने के बारे में ना तो सोचा था ना ही कभी कानून के बारे में जानने में मेरी ज्यादा रूची थी। मैं अरुण सर के चैंबर में एक प्रशिक्षु(इंटर्न) के रूप में शामिल हुई, लेकिन समय के साथ उनसे सिखते समझते मैं उनकी कंपनी में नौकरी करने लगी। उनके साथ काम करते हुए हमेशा मैंने उनकी उम्मीदों पर खरा उतरने की कोशिश की। वह एक ऐसे बॉस थे जो हमेशा कठिन परिश्रम को महत्व देते थे, वह अपने जूनियर्स के साथ हमेशा कार्यस्थल पर बेहतरीन समय बिताते और उन्हें कभी भी असहज करने की कोशिश नहीं करते। सभी जुनियर्स की बातें वह सहजता से सुनते और उसका निराकरण कर सबको सहज बनाए रखने की हरसंभव कोशिश करते। वह एक ऐसे गुरु थे, जो “उदाहरण के लिए अग्रणी” में विश्वास करते थे ताकि उनके शिष्य (वास्तव में हर कोई) जो उनके साथ काम करते थे हमेशा सफलता की दिशा में काम करने के लिए प्रेरित हों। दो दशकों से मैं उनको जानती थी। इन समयों में मैंने उन्हें कभी किसी अन्य वकील की योग्यता को लेकर कुछ गलत कहते नहीं सुना, खासकर वह जो हमारे प्रतिस्पर्धी थे। हमारे खिलाफ मुकदमा लड़ते रहे। उनके पास केवल और केवल हर वकील के बारे में अच्छी बातें थीं। उन्होंने यह महसूस नहीं किया कि दूसरों को नीचा दिखाकर आगे बढ़ा जा सकता है। वह यह सुनिश्चित करके बढ़ने में विश्वास करते थे कि उनके साथ सभी आगे बढ़ें।

उनके साथ मैंने जितना काम किया उसमें मुझे नहीं लगता कि मैंने उनसे 10 से अधिक मौकों पर बात की होगी। क्योंकि मैं उनके सामने कोई भी ऐसी बात नहीं करना चाहती थी जो मूर्खतापूर्ण लगे। उनके साथ काम करते हुए कभी भी ऐसा समय नहीं आया जब किसी भी मुद्दे पर उनका व्यवहार किसी मामले के प्रति उदासीन रवैये से भरा हो। उनके साथ जितना भी वक्त काम करते हुए गुजरा उन्होंने हमेशा इस बात की कोशिश की कि हम बेहतर और बेहतर काम करते रहें हमारी प्रोडेक्टिविटी हमेशा अव्वल हो। उनके द्वारा तैयार किए गए शोध प्रस्ताव बिल्कुल अलग होते थे। वह लगभग हर मौके पर जब वह बहस करने के लिए न्यायालय में उपस्थित होते तो अपने तर्कों से सभी को दंग कर देते थे। कई मामलों में तो उन्होंने जज साहब के सामने ऐसे उदाहरण पेश कर दिए की पूरे परिसर में उनकी तारीफ करते लोग थकने नहीं लगे। उनकी वाकपटुता बेजोड़ थी। जिसकी वजह से लोगों की रुचि उनको जिरह करते हुए सुनने पर मजबूर कर देती थी। एक बार जब एक न्यायाधीश के सामने अदालत में जिरह करते हुए कुछ कहासुनी हो गई, तो उन्होंने उस सुबह अखबार में पढ़े अपने राजनीतिक बयानों का हवाला दिया, और सर ने स्पष्टीकरण में लिप्त हुए बिना, न्यायपालिका के लिए सर्वोच्च संबंध रखने के लिए सम्मानपूर्वक अपने मामले का तर्क दिया और अदालत कक्ष छोड़ दिया।

सर ने इस पेशे को कई तरीकों से मजबूत करने में योगदान दिया, जैसे कि सम्मेलनों में मुख्य अतिथि के तौर पर अपने वक्तव्य से, कानून के छात्रों/वकीलों को सेमिनार के जरिए मार्गदर्शन करके, एनएलयू दिल्ली के प्रबंधन में शामिल होकर। उन्होंने भारत में लॉ फर्मों की पहचान को बल देते हुए सोसाइटी ऑफ इंडियन लॉ फर्म का उद्घाटन किया, जिसमें यह स्वीकार किया गया कि भारतीय फर्म इंटरनेशनल फर्मों से कम नहीं हैं।gst 1 arun jaitley

मेरे गुरु ने मुझे न केवल कानून के गुर सिखाए, बल्कि मुझे व्यक्तिगत तौर पर समतावादी और मानवीय होना भी सिखाया। मुझे याद है कि उनका स्टाफ सदस्य एक महिला को जो उनसे कुछ मांगने आई थी उनसे मिलने नहीं देना चाहता था। लेकिन सर ने उस स्टाफ को इसकी अनुमति नहीं दी। स्टाफ के सदस्य ने सर को पैसा देने से मना कर दिया, लेकिन उन्होंने अपनी पेटेंट शैली में “सिर हिलाया” और लड़के को उसके लिए चेक पर हस्ताक्षर करने का निर्देश दिया। हम सभी को चकित देखकर (जब हम उसके साथ एक ग्राहक सम्मेलन में थे) उन्होंने कहा, “वह मेरे दोस्त की पहली पत्नी है। वह अब नहीं है और वह अपनी दूसरी पत्नी के लिए अपनी संपत्ति छोड़ गया है और यह महिला लगभग निराश्रित है। अगर मैं उसकी इस मदद नहीं करूंगा तो भी कोई बात नहीं…लेकिन इससे मेरे प्रति उसके विश्वास को ठेस पहुंचेगी।” यह हमारे लिए थे “अरुण जेटली”। करुणा, प्रेम और हमेशा सबसे गर्मजोशी से मिलने वाले।

उन्होंने कभी अपने बच्चों और अपने सहायक स्टाफ के बच्चों के बीच अंतर नहीं किया। उनके स्टेनो की बेटी, कुक के बच्चे और उनके क्लर्क के बच्चे उसी विश्वविद्यालय में गए, जहां उनके अपने बच्चे पढ़ते थे और उनकी शिक्षा का पूरा खर्च भी उन्होंने ही उठाया। 2009 की शुरुआत में, उनके जूनियर्स ने उनसे अपनी फीस बढ़ाने का आग्रह किया लेकिन उन्होंने मुस्कुराते हुए मना कर दिया। उन्होंने यह कहते हुए इस बात को मानने से इनकार कर दिया कि उसे जो मिल रहा है वह उसके लिए पर्याप्त है। उन्होंने कहा कि वह चाहते हैं कि जिन लोगों को वास्तव में इसकी जरूरत है वह उसे वह कुछ दें ताकि वह सक्षम हो सकें। वास्तव में, उन्होंने जोर देकर कहा कि उनकी फीस का 10 प्रतिशत उनके क्लर्कों के कल्याण के लिए एक अलग खाते (अरुण जेटली क्लर्केज अकाउंट) में जमा किया जाना चाहिए।Arun Jaitley 1

उन्होंने हमेशा पेशे के साथ-साथ अपने शौक को भी आगे रखा। क्रिकेट पर चर्चा हमेशा उन्हें भाती थी और वह स्टेडियम में मैच देखना पसंद करते थे। जब कोई उन्हें स्टेडियम में देखता था, तो यह समझना मुश्किल था कि वह एक गंभीर सीनियर एडवोकेट हैं। उनके रूप में एक युवा क्रिकेट फैन सामने की सीट पर हमेशा होता था। 2008 में, जब किसी ने कश्मीर और भाजपा की सोच पर उनसे चर्चा की, तो उन्होंने उस व्यक्ति के सामने स्पष्ट कहा था कि जम्मू-कश्मीर में युवा नौकरी और प्रगति चाहते हैं। हिंदू-मुस्लिम विभाजन का युग चला गया है। उन्हें यकीन था कि मुसलमानों का भी भाजपा में विश्वास बढ़ेगा अगर वह प्रगति का रास्ता दे सकें। 2014 के चुनाव में भाजपा के विकास के एजेंडे के पीछे सर का बड़ा दिमाग था, जो चुपचाप काम कर रहा था।

उन्होंने अपने सभी कर्तव्यों का निर्वहन मोदी 1.0 सरकार में पूरी निष्ठा के साथ किया। उन्होंने मुझे तब ज्यादा प्रेरित किया जब बिना बीमारी का बहाना किए वह सतत अपने काम को करते रहे। मुझे भी उनके इस व्यवहार से काम करने की खूब प्रेरणा मिली। जब मैं एम्स में भर्ती होने से लगभग 10 दिन पहले उन्हें देखने गई, तो वह कमजोर दिख रहे थे, लेकिन कानून और राजनीति दोनों के नवीनतम घटनाक्रमों पर उनकी तब भी पैनी नजर बनी हुई थी। उन्होंने तब मुझे आश्वस्त किया था कि वह ठीक हो रहे हैं। वह बहुत जल्द चले गए, इतने लोगों के दिलों को तोड़कर। मुझे उम्मीद है कि मैं उनके दिखाए रास्ते पर चलने में सक्षम हो पाउंगी। 24.08.2019, मेरे जीवन का सबसे बुरा दिन मेरे दिमाग में हमेशा के लिए रह जाएगा…शब्द “जेटली साहब नहीं रहे” मेरे दिमाग में हमेशा गूंजता रहेगा…कोई भी शब्द मेरे दुख को व्यक्त नहीं कर सकता…लेकिन जब मैं दुखी होती हूं, तो मैं चल पड़ती हूं उनके द्वारा दिखाए गए मार्ग पर…उनकी अपेक्षाओं के बोझ के साथ…यह आसान नहीं है, लेकिन मुझे यकीन है कि वह मुझे प्रकाश दिखाएंगे…लेकिन मुझे इस तथ्य के साथ हमेशा रहना होगा कि अब ऐसे पुरुषों को भगवान नहीं बनाते हैं…एक और “अरुण जेटली” कभी नहीं होंगे…मेरे गुरु चले गए…लेकिन वह मुझे देख रहे हैं… मुझे उम्मीद है कि मैं उनके सिद्धांतों का हमेशा पालन करूंगी। मिस यू सर।