राम मंदिर आंदोलन की शुरुआत से लेकर अब तक क्या-क्या हुआ आपको यहां मिलेगी पूरी जानकारी तथ्यों के साथ

अयोध्या राम जन्मभूमि(राम मंदिर) विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई समाप्त होने के बाद अब इस मामले में फैसले का इंतजार है। इसपर फैसले को ध्यान में रखते हुए दोनों ही पक्षों की तरफ से सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने की अपील की जा रही है।

Written by: November 6, 2019 4:05 pm

नई दिल्ली। अयोध्या राम जन्मभूमि(राम मंदिर) विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई समाप्त होने के बाद अब इस मामले में फैसले का इंतजार है। इसपर फैसले को ध्यान में रखते हुए दोनों ही पक्षों की तरफ से सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने की अपील की जा रही है। इस मामले पर फैसला जो भी आए वह अभी भविष्य के गर्भ में है। लेकिन यूपी सरकार जरूर इस मामले को लेकर सतर्क हो गई है। पूरे राज्य में कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए लगातार बैठकों का दौर जारी है। ऐसे में राम जन्मभूमि मंदिर के इतिहास उसके अन्य तथ्य और साथ ही कई ऐसे बिंदू जिससे आज हम आपको रू-ब-रू कराने जा रहे हैं। जिसे पढ़कर शायद आपको इस पूरे मामले के भूत और वर्तमान के आपके मन में उठते सारे सवालों का जवाब मिल जाएगा।

Ram Mandir Supreme Court

 अयोध्या संघर्षगाथा : 1528 से 1949

1528 ई. अर्थात आज से लगभग 491 वर्ष पूर्व बाबर के आदेश पर उसके सेनापति मीर बाकी ने भगवान् श्रीराम का मन्दिर नष्ट करवाकर उसके ऊपर बाबरी ढांचे का निर्माण करवाया।ram mandir

दो बार राणा सांगा से मार खाने के बाद बाबर ने हिन्दू संस्कृति के आराध्य श्रीराम की जन्मभूमि से आक्रमण किया और विजयी हुआ । हिन्दू धर्मगुरु श्यामानंद के कथित मुस्लिम फ़कीर शिष्यों–ख्वाजा अब्बास मूसा और जलालशाह ने ही बाबर को हिन्दू श्रद्धा के अभिन्न केंद्र श्रीराम मन्दिर को नष्ट करने की सलाह दी ।

1526 से 1530 तक बाबर ने भारत पर शासन किया लेकिन उस जिहादी आततायी के निशाने पर लगातार भारतीय आस्था के श्रेष्ठ धर्मस्थल ही रहे । सभी स्थलों की रक्षा के लिए हिन्दू समाज ने यथाशक्ति प्रतिरोध किया ।

अंग्रेज इतिहासकार कनिंघम ने उल्लेख किया है कि बाबर के आदेश पर जब मीर बाकी ने तोप से भगवान श्रीराम का मन्दिर नष्ट करवाया तो हिन्दुओं ने कड़ा विरोध व संघर्ष किया जिसमें लगभग 1लाख 23 हजार रामभक्त बलिदान हुए थे ।

उन्मादी बाबर ने श्रीराम मन्दिर के ऊपर उसी निर्माण सामग्री के साथ न केवल बाबरी ढांचा स्थापित करवाया बल्कि साथ ही यह आदेश भी जारी कर दिया कि हिन्दुस्थान के किसी भी सूबे से अयोध्या में हिन्दू का प्रवेश वर्जित होगा ।

अबुल फजल की आईने-अकबरी (1598) अकबर के शासनकाल के प्रशासनिक और वित्तीय मामलों के साथ भगवान राम के महलों और अन्य भवनों का उल्लेख करती है और अयोध्या को हिंदुओं का सबसे प्राचीन और पवित्रम स्थानों में से एक बताती है।Ayodhya-Ram-Mandir

मीर बाकी के प्रशासनिक अधिकारी और इतिहासकार हैमिल्टन ने बाराबंकी के गजेटियर में रामजन्मभूमि के लिए बाबर के समय से लेकर हुमायूँ और अकबरकालीन हिन्दू संघर्ष का पर्याप्त वर्णन किया है ।

अपने आराध्य और इष्टदेव श्रीराम के जन्मस्थल की मुक्ति के लिए हिन्दू समाज का संघर्ष कभी रुका नहीं,इस कारण यहाँ मुस्लिम समाज ढांचा होने के वावजूद कभी  नमाज अता करता हुआ नहीं दिखाई दिया । भारतीय मुसलमान ने हमेशा इसे श्रीराम मंदिर ही माना केवल आक्रान्ता व विदेशी मुसलमानों ने इस पर प्रश्न खड़ा किया ।

हुमायूं के शासनकाल में 1555 ई. तक भी रामजन्मभूमि के लिए बहुत संघर्ष हुआ, हुमायूं ने जन्मभूमि पर कब्जा करने के लिए अपनी सेना भेजी थी । राजा रणविजय सिंह, महारानी जयराजकुमारी व महेश्वरानंद के नेतृत्व में असंख्य रामभक्तों ने अपने प्राणों की बलि दी ।

अयोध्या में पवित्र ब्रह्मकुंड है जिसके दर्शन करने 1537 में गुरु नानकदेव आये थे । नानकदेव ने यहां अकाल पुरुष की आराधना की और अयोध्यावासियों को एक ओंकार के अस्तित्व का उपदेश दिया था ।Ram Mandir Karyashala

यह सत्य सर्वविदित है कि इस काल में अयोध्या में कभी अजान की आवाज भी  नहीं सुनायी दी ,साथ ही यहाँ वजू के लिए जरूरी पानी का तालाब भी नहीं मिला ।

हुमायूं की मृत्यु के बाद 1556 ई. में अकबर गद्दी पर बैठा । 1580 ई. में अकबर ने अपने साम्राज्य को 12 सूबों में बांटा । इन 12 सूबों में एक अवध था जिसकी राजधानी  अयोध्या थी ।

अकबर के समय में भी रामभक्तों ने स्वामी बलरामाचार्य के नेतृत्व में जन्मभूमि की मुक्ति हेतु बीसियों बार मुग़लसेना से संघर्ष किया ।

अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि के लिए वर्षों से जारी हिन्दू संघर्ष के समाधान के लिए अकबर ने दोनों समुदायों के बीच वार्ता व मध्यस्थता के लिए  टोडरमल और बीरबल को भेजा ।

टोडरमल और बीरबल ने बहुसंख्य हिन्दू समाज की आस्था का सम्मान करते हुए ढांचे के निकट राम चबूतरा बनवाकर पूजा की अनुमति दे दी ।

जहांगीर { 1559-1627} और शाहजहां [1592-1666 }के शासनकाल में भी रामजन्मभूमि की मुक्ति का संघर्ष पूर्ववत जारी रहा ।

अंधेरे का प्रतीक हिन्दू विरोधी जिहादी व क्रूर शासक औरंगजेब { 1618-1707} बाबर की ही प्रतिच्छाया था जिसके काले कारनामे इतिहास में अंकित हैं । औरंगजेब का पहला शाही फरमान ही यह था कि अयोध्या में राममंदिर के खंडहरों और रामचबूतरे को पूरी तरह नष्ट किया जाए ।

औरंगजेब की पोती ने (17वीं शताब्दी के अंत में) ‘सफिहा-ए-चहल नसीह बहादुर शाही’ में स्वीकारा है कि बाबरी ढांचे के निर्माण के लिए राम मन्दिर नष्ट किया गया । वह लिखती है-‘‘मथुरा, बनारस और अवध जैसे नगरों के निवासी काफिर हिंदू (मुशरिक हिंदू) के सभी पूजा स्थलों, जिन्हें ये दुष्ट और अपात्र (कुफ्र-ए-नकबार) अपनी आस्था के तहत कन्हैया (भगवान कृष्ण) का जन्मस्थान (मौलाद गाह), सीता की रसोई (भगवान राम से संबंधित), लंका विजय के बाद रामचंद्र द्वारा स्थापित हनुमान गढ़ी के नाम से पूजते रहे थे, को ध्वस्त करके मस्जिदों का निर्माण किया गया ताकि इस्लाम मजहब को मजबूत किया जा सके।’’

  • 1729 ई. में दसवें सिख गुरु और महायोद्धा गुरु गोविन्द सिंह भी अयोध्या आये थे और उसके पश्चात उन्होंने रामजन्मभूमि के लिए कई बार युद्ध किया ।
  • अवध के नवाब शुजाउद्दौला {1754-1775} ने अयोध्या से 3 मील पश्चिम की ओर फैजाबाद नगर बसाया ।
  • 1789 में हिन्दू राजा महादजी सिंधिया ने दिल्ली विजय की । अयोध्या में अपने प्रतिनिधि शाह आलम के माध्यम से उन्होंने गोवध पर रोक लगवाई । साथ ही शाह आलम ने मथुरा, वृन्दावन व काशी के तीर्थस्थल हिन्दुओं को सौंपने की घोषणा की ।
  • मिर्जा जान 1855 में वाजिद अली शाह के शासन के दौरान अमीर अली अमेठी के नेतृत्व में हुए जिहाद का चश्मदीद गवाह था उसने ‘हदीस-ए-शोहदा (1856)’ इस जिहाद को जो बाबरी ढांचे से सौ गज की दूरी पर स्थित हनुमान गढ़ी को हिंदुओं से छीनकर उस पर पुन: कब्जा करने के लिए किया गया था।
  • 1853 में रामजन्मभूमि की मुक्ति के लिए हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच भयंकर संघर्ष हुआ । 1855 में हमुमानगढ़ी विवाद के संघर्ष ने भयावह रूप ले लिया । अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह {1822-1887 }ने इसे हिन्दुओं को सौंप दिया ।
  • नाना फडनवीस के कहने पर शाह आलम श्रीराम जन्मभूमि हिन्दुओं को सौंपने की तैयारी कर रहा था किन्तु अंग्रेजों के विरुद्ध 1857 के स्वातंत्र्यसमर में दोनों ही देश के लिए समर्पित हो गए जिस कारण यह नेक कार्य नहीं हो पाया ।
  • इसके पश्चात देशभक्त बुद्धिजीवी मुस्लिम अमीर अली खान ने एक बड़े सम्मेलन में मुस्लिम समाज के समक्ष प्रस्ताव रखा कि श्रीराम जन्मभूमि सद्भाव के साथ हिन्दुओं को सौंपी जाए ,”अंग्रेजों की फूट डालो.राज करो” नीति ने इसे सफल नहीं होने दिया ।ram mandir
  • ‘30 नवंबर, 1858 को मोहम्मद असगर और बाबरी मस्जिद के खातिब और मुअज्जन ने बैरागिया-ए-जन्मस्थान के बारे में कानूनी कार्रवाई शुरू करने के लिए एक याचिका दायर की, जिसमें बाबरी मस्जिद को मस्जिद-ए-जन्मस्थान तथा मेहराब और चबूतरे के नजदीक स्थित आंगन को मुकाम-ए-जन्मस्थान कहकर इंगित किया गया है। वे चाहते थे कि बैरागियों ने आंगन में जो चबूतरा बना दिया है, उसे नष्ट किया जाए।
  • 1859 में अंग्रेजों ने जन्मभूमि स्थल पर चारों ओर से तार बाड़ करवा दी और हिन्दुओं व मुसलमानों दोनों के लिए पूजा-अर्चना के लिए अलग-अलग स्थल तय कर दिए ।
  • 1877 में सैयद मोहम्मद असगर ने मुतालवी के रूप में फैजाबाद के कमिश्नर को हिन्दुओं को रामजन्मभूमि पर दावा रोकने की याचिका दी,लेकिन हिन्दुओं ने कभी जन्मभूमि पर दावा नहीं छोड़ा ।
  • इस मामले में फैजाबाद के डिस्ट्रिक्ट जज कर्नल एफईए चेमियर ने किसी प्रकार की अनुमति देने से इंकार कर दिया लेकिन साथ ही स्वीकार किया कि “यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हिन्दुओं के पवित्र स्थल व आस्था केंद्र के ऊपर मस्जिद बनाई जाए ।
  • हिन्दू समाज ने सैकड़ों वर्षों से चल रहे अपने आराध्य श्रीराम को समर्पित इस संघर्ष को थमने नहीं दिया । लगातार रामजन्मभूमि की मुक्ति के लिए अंग्रेज सेना के साथ 1912 से लेकर 1934 तक संघर्ष जारी रहा । कुल मिलाकर रामजन्मभूमि की मुक्ति के लिए 76 युद्ध लडे गए ।
  • 1934 में रामभक्तों ने बाबरी ढाँचे को नष्टप्रायः कर दिया था,जिसका फैजाबाद के डिप्टी कमिश्नर जे.पी.निकल्सन ने जीर्णोद्धार करवाया था ।
  • 1940 से पूर्व अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि के इस स्थल को मस्जिद-ए- जन्मस्थान कहा जाता था ।

शोध सन्दर्भ -विहिप साहित्य,पांचजन्य / ऑर्गनाइजर प्रो. मक्खनलाल, तरुण विजय  व नरेंद्र सहगल के लेख

ऐतिहासिक विवरण

1634 में थॉमस हरबर्ट अयोध्या आये थे ,उन्होंने अयोध्या में पंडितों के द्वारा श्रीरामधुन व स्तुति का वर्णन किया है,किसी मस्जिद का उल्लेख उनके विवरण में नहीं है । विलियम फिंच अयोध्या आए थे। उन्होंने रामकोट के खंडहरों के अस्तित्व की पुष्टि की है, जहां श्रीराम का जन्म हुआ था ।

38 वर्ष तक भारत में रहने वाले जोसेफ टेफेन्थैलर (1710-1785) अस्ट्रियाई मूल के यूरोपीय मिशनरी पादरी थे, लैटिन भाषा में लिखी पुस्तक  ‘हिस्ट्री ऐंड ज्योग्राफी ऑफ़ इंडिया’ में उन्होंने  जो विवरण अंकित किया है इसमें अयोध्या का भी वर्णन है।

फ्रांसीसी विद्वान जोसेफ बर्नौली ने 1786 में टेफेन्थैलर की पुस्तक का फ्रेंच अनुवाद प्रकाशित किया था। इसमें प्रस्तुत तथ्य ब्रिटिश दस्तावेजों विशेषकर 1838 में मोंटगोमरी मार्टिन द्वारा राम जन्मभूमि मंदिर के संबंध में प्रस्तुत ब्योरों के मुकाबले ज्यादा प्राचीन हैं।

‘मंदिर-मस्जिद स्थल’ के बारे में टेफेन्थैलर लिखते हैं: ‘‘बादशाह औरंगजेब ने रामकोट नाम के एक किले को नष्ट कर दिया और उसी स्थान पर तीन गुंबदों वाला एक इस्लामी ढांचा बनाया ।”

1838 में ब्रिटिश सर्वेक्षक मांट गोमेरी मार्टिन ने लिखा कि बाबरी ढाँचे में जो स्तम्भ थे वे हिन्दू मंदिर से लिए गए थे ।

ऐसे अनगिनत स्रोत हैं जिनमें बार-बार अयोध्या का उल्लेख किया गया है, जहां राम जन्मस्थान और अन्य मंदिरों को नष्ट करके ‘मस्जिदों’ का निर्माण करवाया गया।

उनमें से कुछ इस प्रकार हैं – ब्रिटिश सर्वेयर मोन्टगोमेरी मार्टिन की रिपोर्ट ‘बाई मोन्टगोमेरी मार्टिन(1838)’, एडवर्ड थर्नटन का ‘ईस्ट इंडिया कंपनी गजेटियर (1854)’, पीक़ार्नेगी का ‘हिस्टोरिकल स्केच ऑफ़ फैजाबाद (1870)’, ‘गजेटियर ऑफ़ दि प्रोविन्स ऑफ़ अवध (1877)’,‘फैजाबाद सेटलमेंट रिपोर्ट, (1880)’, ‘इंपीरियल गजेटियर ऑफ़ इंडिया (1881)’, कर्नल एफ़ ई़ ए़ चमियर, जिला न्यायाधीश, फैजाबाद की ‘कोर्ट वर्डिक्ट(1886)’, ए़ फ्यूहरर की ‘आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया रिपोर्ट (1891)’, एच़ आर नेविल का ‘बाराबंकी डिस्ट्रिक गजेटियर (1902)’, एच़ आर नेविल का ‘फैजाबाद डिस्ट्रिक गजेटियर (1905)’और ‘आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया रिपोर्ट (1934)’।

                                                                श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर का इतिहास

                                                      महाराज विक्रमादित्य द्वारा श्रीराम मन्दिर का निर्माणram mandir Babri Masjid

  • धर्म ग्रन्थों के आधार पर समाज की धारणा है कि जब श्रीराम जी प्रजा सहित दिव्यधाम को प्रस्थान कर गए तो सम्पूर्ण अयोध्या, वहाँ के भवन, मठ-मन्दिर सभी सरयू में समाहित हो गए| अयोध्या का भूभाग शेष रहा। अयोध्या बहुत दिनों तक उजड़ी रही।
  • तत्पश्चात महाराज कुश जो कुशावती (कौशाम्बी) में राज्य करने लगे थे, पुनः अयोध्या आए और अयोध्या को बसाया, इसका उल्लेख कालिदास ने ‘रघुवंश’ ग्रन्थ में किया है।
  • लोमश रामायण के अनुसार उन्होंने कसौटी पत्थरों के खम्भों से युक्त मन्दिर जन्मभूमि पर बनवाया।
  • जैन ग्रन्थों के अनुसार दुबारा उजड़ी अयोध्या को पुनः ऋषभदेव ने बसाया।
  • भविष्य पुराण में लिखा है कि उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने मोक्षदायिनी सप्त पुरियों को बसाया था। ईसा से 57 वर्ष पूर्व विक्रमादित्य उज्जैन के राज्य सिंहासन पर आरुढ़ हुए तभी से विक्रम संवत् प्रारम्भ हुआ।
  • विक्रमादित्य के पूर्व अयोध्या एक बार पुनः उजड़ चुकी थी। ग्रन्थों में आए वर्णन के निर्दिष्टानुसार उन्होंने सरयू नदी के लक्ष्मण घाट को आधार बनाकर विभिन्न स्थलों को चिन्हित करके 360 मन्दिर बनाए। उनके द्वारा चिन्हांकित विशेष स्थलों में रामकोट-राम जन्मभूमि, नागेश्वरनाथ मन्दिर, मणिपर्वत आदि प्रमुख हैं।
  • भगवान विष्णु के परमभक्त होने के कारण विष्णुपद नामक पर्वत पर विष्णुध्वज की स्थापना की तथा श्रीराम जन्मभूमि पर एक भव्य मन्दिर का निर्माण करवाया।

सालार मसूद का श्रीराम जन्मभूमि पर आक्रमण एवं राजा सुहेलदेव द्वारा उसका वध

  • आक्रमणकारी सालार मसूद ने 1033 ई0 में साकेत अथवा अयोध्या में डेरा डाला था तथा उसी समय जन्मभूमि के द्वारा प्रसिद्ध मन्दिर को भी ध्वस्त किया था ।
  • सालार मसूद जब मन्दिर को तोड़कर वापिस जा रहा था तभी बहराइच में घनघोर युद्ध में सालार मसूद का वध 14 जून, 1033 को वीर पराक्रमी राजा सुहेलदेव ने किया।
  • महाराजा सुहेलदेव के भीषण युद्ध से आक्रान्ता इतने भयभीत हो गए कि सैकडों वर्ष तक किसी की हिम्मत भारत आने की नहीं हुई।
  • गहड़वाल वंशीय राजाओं ने पुनः मन्दिर का निर्माण कराया।

बाबर का अयोध्या पर आक्रमणram mandir Babri Masjid Case

  • सन् 1526 में बाबर अयोध्या की ओर आया। उसने अपना डेरा सरयू के उस पार डाला। वह भारत पर विजय प्राप्त करना चाहता था, वह अपने धर्मगुरु से मिला।
  • उन्होंने बाबर को अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि के मन्दिर को तोड़ने की सलाह दी, जो हिन्दू सैनिकों के मनोबल को प्रभावित करेगी।
  • इस प्रकार बाबर ने अपने सेनापति मीरबाकी को जन्मभूमि मन्दिर तोड़ने का आदेश दिया।
  • सन् 1528 में अयोध्या में आक्रमण करके जन्मभूमि पर बने मन्दिर को तोड़कर, मस्जिद निर्माण करने का प्रयास किया पर प्रचण्ड हिन्दू प्रतिकार के कारण वह सफल नहीं हुआ।
  • इसी कारण वहाँ मीनारें नहीं बन सकी, वजू करने का स्थान भी नहीं बन सका। इस प्रकार वह मात्र एक ढांचा था, मस्जिद कदापि नहीं।
  • ढाँचे के बाहर लगा हुआ फारसी में लिखा पत्थर “फरिस्तों का अवतरण स्थल” उस स्थान के जन्मभूमि होने की पुष्टि करता है।
  • एक जगह पर सीता पाक स्थान भी लिखा था। लगातार आक्रमण और संघर्ष के कारण अयोध्या में बहुत स्थान खाली हो गया था|
  • जन्मभूमि को पुनः प्राप्त करने के लिए किये गये संघर्षों की श्रृंखला

संदर्भ- https://vhp.org/

इस पूरे मामले पर सुनिए चंपत राय से क्या-क्या हुआ अब तक…
राजीव गांधी ने जब पूछा कि राम जन्मभूमि को लेकर इतना बड़ा आंदोलन आखिर कैसे खड़ा हो गया…सुनिए इस सवाल के जवाब में चंपत राय ने क्या कहा…

आखिर राम जन्मभूमि आंदोलन में क्यों दिया गया इस पूरी यात्रा को कार सेवा का नाम सुनिए चंपत जी की राय

योगी सरकार के यूपी में आने के बाद कैसे सरकार के वकीलों ने ली अदालत में केस से जुड़े कागजों के अनुवाद की जिम्मेदारी…सुनिए चंपत राय से