जानें भारत में वेदों के प्रति आस्था के बारे में

ऋग्वेद में अग्नि और आकाश के भी आत्मीय सम्बंध हैं। मनुष्य और अग्नि के मध्य भी आत्मीयता है। मनुष्य और पक्षियों के मध्य भी रागात्मक सम्बंध हैं।

Written by हृदय नारायण दीक्षित June 2, 2019 12:12 pm

वेद लोकमान्य हैं। ऋग्वेद प्राचीनतम है ही। प्राचीनतम को जानने की रूचि स्वाभाविक हैं। विश्व के सभी देशों में ऋग्वेद को समझने की रूचि बढ़ी है। भारत में वेदों के प्रति आस्था है। इस आस्था के अनेक कारण है। पहला कारण सर्वविदित हैं। तमाम श्रद्धालु इन्हें ईश्वर वाणी मानते हैं लेकिन श्रद्धालुओं का बड़ा वर्ग उन्हें अपने प्राचीन पूर्वजों का इतिहास, कथन, काव्य भी मानता है। ऋग्वेद हजारों वर्ष प्राचीन है। माना जाता है कि यह अपने में पूर्ण है। श्रुति परम्परा में आचार्यो ने शिष्यों को लगातार सुनाया। याद भी कराया है तो भी बहुत कुछ लुप्त हो गया होगा। प्रख्यात दर्शनशास्त्री डाॅ0 राधाकृष्णन् ने “इंट्रोडक्शन टू दि प्रिंसपल उपनिषद्स” में लिखा है “ऋग्वेद के वृहद् कलेवर के बनने में खासा समय लगा होगा। हमें स्मरण रखना चाहिए कि जो कुछ आज बचा है वह लुप्त हो गए का शायद एक लघु भाग है।” उन्होंने मैक्समूलर के ग्रंथ ‘सिक्स सिस्टम ऑफ इण्डियन फिलास्फी’का उदहारण भी दिया है “वैदिक काल में विद्यमान धार्मिक और लौकिक काव्य का सौंवा भाग भी आज हमें उपलब्ध है, यह हम दावे के साथ नहीं कह सकते।”

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ऋग्वेद अन्य बड़े और आदरणीय ग्रंथों की तरह एक सुनिश्चित विषय वाला ग्रंथ नहीं है। इसमें सैकड़ो विषय हैं। अनेक ऋषि हैं। यहां संसार और सृष्टि के सम्बंध में अनेक प्रश्न हैं। ऐसे प्रश्न स्वयं ऋषि कवियों ने उठाये हैं। उन्होंने तमाम प्रश्नों के उत्तर भी दिये हैं लेकिन तमाम प्रश्न अनुत्तरित भी हैं। गीता में प्रश्न ही प्रश्न हैं। सभी प्रश्नों के उत्तर भी हैं। ऋग्वेद में सभी प्रश्नों के उत्तर नहीं हैं। इसका कारण है ऋग्वैदिक काल में संदेह और संशय। संदेह या संशय ज्ञान के उपकरण हैं। इनमें दर्शन और विज्ञान की भूमिका है। वैदिक पूर्वजों का ध्येय अपना मन थोपना नहीं था। पूरे ऋग्वेद में कहीं भी आदेशात्मक मंत्र नहीं हैं। यह स्तुतियों से भरापूरा है। प्रार्थनाएं ही प्रार्थनाएं हैं। इन प्रार्थनाओं के भीतर आनंदवर्द्धन प्रकृति वर्णन हैं। तमाम जिज्ञासाएं हैं।

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ऋग्वेद के ऋषियों की प्रश्नाकुल मनोभूमि में दर्शन की प्रेरणा है। इसमें सर्वाधिक स्तुतियां इन्द्र से हैं। इन्द्र वैदिक ऋषियों के प्रिय देवता हैं। ऋग्वेद में अग्नि, सूर्य, नदी, वायु, जल, सिंधु आदि प्रत्यक्ष देवता हैं। वे प्रकृति की शक्तियां हैं। इनसे की गई स्तुतियां प्रत्यक्ष देवों की है लेकिन इन्द्र प्रत्यक्ष नहीं है। ऋषि कहते हैं “वे किससे प्रार्थना करते हैं? वे कहां हैं? उनके विषय में यह भी कहा जाता है कि वे नहीं है।” लगता है कि कुछ ऋषि इन्द्र को मानते थे, कुछ नहीं मानते थे। ऋग्वेद में विचार विविधता है।

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ऋग्वेद में जागरण के गीत हैं। कहते हैं “जो जागे हुए हैं, ऋचा/मंत्र उनकी कामना करते हैं। प्रकृति का संगीत उनके पास आता है। सामगान उसके पास जाते हैं। यह जागरण निद्रा को त्याग कर सामान्य रूप में जाग जाना नहीं है। यह स्वबोध है। स्वयं को स्वयं द्वारा देखने वाला जागरण है। फिर जागने वाले का उदाहरण है “अग्नि जागे हुए हैं। जागृत हैं। ऋचाएं/मंत्र उनकी कामना करते हैं। सामगान उनके पास आते हैं। सोम आनंद उन्हें मिलता है। अन्यत्र कहते हैं “ऋचा मंत्र परम व्योम में रहते हैं। वे जागे हुए लोगों के चित्त में प्रवेश करना चाहते हैं। जो यह सब बातें नहीं जानते उनका मंत्र पाठ बेकार है – किं ऋचां करष्यिति?”प्रकृति के रूप यथार्थ हैं। ऋग्वेद के ऋषि इनमें सौंदर्य देखते हैं। सौन्दर्य बोध से काव्य सृजन का उल्लास बढ़ता है। वे प्रकृति के रूपों में दिव्यता देखते है। पृथ्वी प्रत्यक्ष देव है, आकाश उन्हें आकर्षित करता है। सो ऋग्वेद में पृथ्वी केवल देवता ही नहीं माता भी हैं और आकाश पिता है। यूनानी देवतंत्र में भी जियस देव आकाश पिता के रूप में पृथ्वी माता से जुड़ा हुआ है। प्राचीन यूनानियों ने भी प्रकृति के तमाम तत्वों को देवता माना था। ऋग्वेद में अग्नि, सूर्य, वायु, जल, रात्रि और ऊषा आदि प्राकृतिक शक्तियां देवता है। इन्द्र, वरूण, मित्र, रूद्र अदिति, विष्णु और अश्विनी कुमार द्वय देवता हैं।

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ऋग्वेद के रचनाकाल में पुस्तक तकनीकी नहीं थी। आधुनिक काल में पुस्तके हैं। इंटरनेट सहित अन्य तमाम साधन भी हैं। इसलिए अब मनुष्य की स्मृति शक्ति घटी है। अब स्मृति के तमाम विकल्प हैं। वैदिक काल में स्मृति की शक्ति आश्चर्यजनक जान पड़ती है। ज्ञान विज्ञान को स्मृति अंश बनाने की आचार्य परंपरा भी थी। वैदिक ज्ञान संपदा को संजोए बचाए रखने की श्रम साधना का सम्मान भी था। यह ज्ञान आनंदवर्द्धन था। इसे बचाए रखने की आवश्यकता थी। संभवतः इसलिए इसे दिव्य ज्ञान या ईश्वरवादी कहा गया था। वैसे ऋग्वेद में ईश्वर की स्पष्ट धारणा नहीं है। नीति नियम मानव समाज में होते हैं। मनुष्य और समाज के बीच आदर्श सम्बंधों का विकास नीति और नैतिकता है। मनुष्य और संपूर्ण सृष्टि के मध्य आदर्श आचार संहिता का नाम धर्म है। लेकिन ऋग्वेद में अग्नि और आकाश के भी आत्मीय सम्बंध हैं। मनुष्य और अग्नि के मध्य भी आत्मीयता है। मनुष्य और पक्षियों के मध्य भी रागात्मक सम्बंध हैं। एक ऋषि बाज पक्षी से प्रार्थना करते हैं कि वह सामने बैठी चिड़िया को न मारे। समुद्र पृथ्वी पर चढ़ आता है। ऋषि प्रार्थना करते हैं कि हे माता पृथ्वी समुद्र तेरी क्षति न करे। प्रकृति के अंतरंग नियमों का नाम ऋग्वेद में ऋत है। जो ऋत है, वही सत्य है। आनंदपूर्ण जीवन का मूल आत्मीयता है। इस आत्मीयता की धुरी सत्य है। मित्र और वरूण से प्रार्थना है कि ‘‘आपके सत्यमार्ग से हम पार हो।’’ यहां जोर सत्यमार्ग पर है। ऋत और सत्य मार्ग सदा से हैं। ऋग्वेद के देवता भी ऋत सत्य के नियम नहीं तोड़ सकते। वे सर्वशक्ति संपन्न नहीं हैं। उनके शक्तिशाली होने का रहस्य ऋत सत्य नहीं है। उनके शक्तिशाली होने का रहस्य ऋत सत्य पालन है। जैसे आधुनिक राज व्यवस्था की सभी संस्थाएं संविधान से शक्ति पाती हैं वैसे ही सभी देव ऋत विधान के पालन से ही आदरणीय बने हैं। अग्नि देवता है वे ऋत आचरण में बंधे हुए हैं। नदियां भी ऋतावरी हैं। वरूण नियम मानते हैं, मनवाते भी हैं। वरिष्ठों के सम्मान से समाज आनंद रस पाते हैं। यूरोपीय सभ्यता में उपयोगितावाद है। ऐसे समाज में माता-पिता और अग्रज वरिष्ठ अनुपयोगी होते हैं। लेकिन ऋग्वेद के समाज में माता-पिता देवों जैसे सम्माननीय हैं। माता पिता अपनी संतति को पालते हैं। संस्कार देते हैं, शिक्षित भी बनाते हैं। प्रार्थना है कि हे देव! हमको वैसे ही ज्ञान दो जैसे हमें हमारे पिता ज्ञान देते हैं। पिता माता के प्रति सम्मान भाव के कारण ही ऋग्वेद में विशाल पृथ्वी माता हैं और अनंत आकाश पिता है। माता पिता अति महत्वपूर्ण हैं। वे न होते तो हम भी न होते। ऋग्वेद में पुत्र को पिता का यश बढ़ाने वाला कहा गया है। माता पिता के साथ यहां ऋषियों वरिष्ठों को भी नमस्कार किया गया है। ‘‘इदं नमः ऋषिभ्यः, पूर्वेभ्यः पूर्वजेम्याः- ऋषियों को नमस्कार, वरिष्ठों को नमस्कार, पूर्वजों को नमस्कार।’’

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नमस्कार और प्रणाम आंतरिक आदर की प्रकट अभिव्यक्ति हैं। इससे सामाजिक सामूहिक आत्मीयता बढ़ती है। नमस्कार प्रीतिपूर्ण भावना है। मुख से बोला गया विनम्र नमस्कार वातावरण में प्रीतिरस घोलता है। ऋग्वेद में ‘नमस्कार’ भी देवता है। ऋषियों ने नमस्कार को भी नमस्कार किया है। श्रद्धा भी नमस्कार की तरह आंतरिक भावानुभूति है। ऋग्वेद में श्रद्धा भी एक देवता हैं। ऋषियों ने श्रद्धा को भी नमस्कार किया है- एक बार नहीं तीन बार। ऋग्वेद के ऐसे अंश अनुकरणीय हैं और समाज को संगीतपूर्ण बनाने वाले हैं। प्रकृति में बहुत कुछ है। जल हैं, नदियां है। पशु पक्षी हैं। कीट पतिंग हैं। मेंढक हैं। ऋषि अपने मंत्रों सूक्तों में सबका ज्ञान करते हैं। आकाश हैं, बादल हैं। वे बादलों को देखते हैं, मंत्र गाते हैं। वायु उन्हें सहलाती हुई बहती है। वे मधु अच्छादित वायु प्रवाह चाहते हैं। मधु उनका प्रिय आलम्बन है। वे धरती के प्रत्येक कण में मधु व्याप्ति की स्तुति करते हैं। वे गो दुग्ध में भी मधुरस के अभिलाषी हैं। वे समाज को मधुमय देखना बनाना चाहते हैं। ऋग्वेद मधुअभिलाषी ऋषियों द्वारा गाया हुआ मधुमय ज्ञान है। आधुनिक जीवन के लिए उपयोगी है ऋग्वेद का मधुबोध।