‘भारत में चिकित्सा की खोज ऋग्वैदिक काल में ही हो चुकी थी’

आयुर्वेद आयु का वेद है। प्राचीन चिकित्सा विज्ञान का उद्देश्य कारोबार या व्यापार नहीं था। मनुष्य को रोगरहित दीर्घजीवी बनाना ही आयुर्विज्ञान का लक्ष्य था। वैद्य समाजसेवी थे।

Written by हृदय नारायण दीक्षित April 14, 2019 1:32 pm

चिकित्सा विज्ञान की परम्परा प्राचीन है। उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घ जीवन भारतीय मनीषियों की प्राचीन इच्छा रही है। उन्होंने सुव्यवस्थित आयुर्विज्ञान का तंत्र खड़ा किया था। भारत में चिकित्सा की खोज ऋग्वैदिक काल में ही हो चुकी थी। ऋग्वेद में रोगी, चिकित्सा व चिकित्सक के वर्णन हैं।

ऋग्वेद का नवां मण्डल सोम की स्तुति है। सोम मुख्य औषधि हैं। 10वें मण्डल (सूक्त 9) के ऋषि कहते हैं “सृष्टि के प्रारम्भ में देवों द्वारा पैदा की गई औषधियों के 10 स्थानों की हमकों जानकारी है। ये औषधियाँ सैकड़ो हैं, जैसे घोड़ा तेज चलता है, वैसे ही ये औषधियां रोग हर लेती हैं।” अश्विनी कुमारों ने बू़ढ़े च्यवन ऋषि को नवयौवन दिया था। विपश्ला को कृत्रिम पैर लगाने का उल्लेख भी ऋग्वेद में है। वैदिक सूक्तों में अग्नि, रूद्र वरूण इन्द्र भी वैद्य हैं। अथर्ववेद में चिकित्सा विज्ञान का अच्छा खासा वर्णन है। यहां स्नायुतंत्र और हृदय सहित समूचा देह-शास्त्र है और हजारों रोगों के उपचार का वर्णन है। अथर्ववेद, केन उपनिषद् व छान्दोग्य उपनिषद् में शरीर विज्ञान सम्बंधित महत्वपूर्ण जानकारियाँ हैं। ऐसी जानकारियाँ आधुनिक चिकित्सा विज्ञान द्वारा सही पाई गयीं हैं।

महाभारत शांतिपर्व (117.19-26) में दिलचस्प शरीर विज्ञान है। लिखा है “शरीर पांच महाभूतों पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश से बना है। त्वचा, मांस, हड्डी, मज्जा और स्नायुतंत्र – पांच अंग पृथ्वी तत्व से हैं। तेज, क्रोध, आंख, ताप और भूख ये 5 अग्नि तत्त्व से निर्मित है। जल से कफ, पित्त, पसीना, चर्बी और रक्त ये पांच हैं। वायु भी 5 तरह की है – प्राणवायु गतिशीलता करती है। व्यानवायु बल है। अपान नीचे सरकती है। समान वायु हृदय में रहती है। उदानवायु उच्छवास है, कंठ तालु और शिरस्थान को भेदकर ध्वनि देती है। आकाश के भी 5 स्थान है – कान, नाक, मुख, हृदय और कोशिकां। आकाश का गुण शब्द है, यह 7 प्रकार का होता है – पड्ज, ऋषम, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद।” संगीत के सात सुर स, रे, गा, म, प, ध, नि इन्हीं सात का संक्षिप्त संकेत है। वाल्मीकि रामायण में भी शरीर की व्याधियों का उल्लेख है।


चरक संहिता विश्व चिकित्सा विज्ञान की मूल पीठिका है। इसमें ऋग्वेद, अथर्ववेद और उपनिषद् ज्ञान की वैज्ञानिक परम्परा का आश्चर्यजनक विकास हुआ है। यहां सारा जोर उपनिषदों के तत्वदर्शन और सदाचार पर है। यूरोपीय चिकित्सा पद्धति रोगों का विश्लेषण करती है, उपचार सुझाती है। चरक संहिता प्रारम्भ में ही रोग का कारण बताती है “काल, बुद्धि और इन्द्रिय विषयों का मिथ्यायोग अयोग, और अतियोग होना शरीर और मन की आधारभूत व्याधियों का त्रिविध संग्रह यहां निर्दिष्ट है।” यहां समय, बुद्धि और इन्द्रिय विषयों का मिथ्या योग, अयोग और अतियोग बीमारी का कारण है। प्राकृतिक जीवन, योग और सदाचार दीर्घजीवी होने के मार्ग हैं। प्रकृति तथ्य है, अतियोग, मिथ्यायोग विकृति है। इनसे बचते हुए प्रसन्नचित्त जीवन जीना ही उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घजीविता का विज्ञान है। गांधी जी के सत्य के प्रयोगो और व्रत, उपवास आदि शारीरिक शुद्धीकरण के कार्यक्रमों में यही स्थापना है। भारतीय चिकित्साविज्ञान का जोर सदाचार पर है, यूरोपीय चिकित्सा विज्ञान का जोर उपचार पर है।


चरक संहिता में अध्यात्म भी द्रव्य है। अध्यात्म द्रव्य के गुण भी बताए गए हैं। बताते हैं “मन, मन के विषय, बुद्धि यानी चक्षु, कान, नाक, जीभ एवं स्पर्श इन्द्रिय त्वचा और आत्मा यह सब अध्यात्म द्रव्य हैं।” यहां आंख, कान, नाक आदि द्रव्य नहीं इन्द्रियाँ है, इनके विषय ही द्रव्य है। आत्मा भी एक द्रव्य है। इन्हें समझने का विषय अध्यात्म है। यहां अध्यात्म आस्था नहीं विज्ञान है। आगे कहते हैं “मन का विषय अध्यात्म है, चिन्त्य विषय का समयोग, अतियोग, हीनयोग और मिथ्यायोग मन और मनोबुद्धि की प्रकृति और विकृति का कारण है।” इसलिए निर्देश है “मन सहित सभी इन्द्रियों को विकृति से बचाने के लिए प्रयत्नशील रहें। बुद्धि से भलीभांति विचार करें। ठीक कर्म करें। देश, काल, आत्मा के गुणों के विपरीत गुण वाले आहार विहार के सेवन से बचते हुए सद्वृत्ति का आचरण करें।” यहां सदाचरण पर ही जोर है।

चरक ने ‘सद्वृत्ति’ शब्द का इस्तेमाल किया है। आगे ‘सद्वृत्ति’ की परिभाषा है “देवता, गाय, विद्वान्, आचार्य, वृद्ध, तपस्वी का सम्मान, आदर और अग्नि की उपासना, नियमित स्नान, आंख, कान, नाक, मुख, रोमकूप आदि मलाशयों की नियमित सफाई, केश कटाई करें। प्रसन्नचित्त रहे।” अच्छे स्वास्थ्य के लिए विद्वानों वृद्धों का सम्मान ध्यान देने योग्य है।

चरक संहिता की विषय सूची लम्बी है। दीर्घ आयु पर बड़ा अध्याय है। आहार पर विशेष सामग्री है। ऋतुओं और उनके प्रभाव का विस्तृत वर्णन हैं। योग, व्यायाम की विशद् व्याख्या है। रोग प्रतिरोध का विशेष विवेचन है। इच्छा, अभिलाषा जैसे मनोवैज्ञानिक विषयों का सूक्ष्म विश्लेषण है। अन्न और औषधियों का व्यापक वैज्ञानिक विवेचन है। धूम्रपान, सुरापान, का भी गहन अध्ययन है। हृदयरोगों पर पूरा एक अध्याय है। पाचनतंत्र, स्नायुतंत्र और समूचे शरीर की अंतःरचना पर आश्चर्यजनक वैज्ञानिक सामग्री है। बेशक आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने बड़ी उन्नति की है। बात टेस्टट्यूब बेबी तक पहुंच गयी है। ताजा शोध भौचक करते हैं। लेकिन मनुष्य का समग्र अध्ययन विवेचन अधूरा है। आधुनिक शोधार्थियों के पास अत्याधुनिक उपकरण हैं। यहां आधारभूत साहित्य है। चरक संहिता के रचनाकाल और उसके भी पहले वैदिक काल में ऐसे उपकरणों का अभाव था बावजूद इसके प्राचीन विद्वानोें के विश्लेषण चैकानें वाले हैं।


आयुर्वेद आयु का वेद है। प्राचीन चिकित्सा विज्ञान का उद्देश्य कारोबार या व्यापार नहीं था। मनुष्य को रोगरहित दीर्घजीवी बनाना ही आयुर्विज्ञान का लक्ष्य था। वैद्य समाजसेवी थे। तब ज्ञानी वैद्य ही सम्मान का पात्र था। चरक बताते हैं, “जो चिकित्सक रोगी की परीक्षा देशकाल के अनुसार करता है व उचित मात्रा में औषधियों के योग को जानता है वही उत्तम वैद्य है।” तब नकली चिकित्सक भी रहे होंगे। आधुनिक काल में इनकी भरमार है। अयोग्य चिकित्सक खतरनाक होते हैं। चरक संहिता में कहते हैं “इन्द्र का वज्र शिर पर गिरे तो शायद मनुष्य बच सकता है लेकिन मूर्ख वैद्य की दवाई से कोई नहीं बच सकता।”ऐसे नकली वैद्य के सामाजिक बहिष्कार का भी निर्देश है, “बिना ज्ञान ही स्वयं को विद्वान् समझने वाला बिना सोचे समझे औषधि देता है, यह अधर्मी, पापी, साक्षात्, यमराज है ऐसे वैद्य से बातचीत करना भी पाप है। उससे संभाषण करने वाला नरक जाता है।” नरक जाता हो, न जाता हो लेकिन उसकी बातों में फंसकर दवा लेकर मृत्यु मार्ग को तो जाता ही है।

चरक ने अच्छे वैद्य की 4 वृत्तियां बताई हैं “प्राणि मात्र से मित्रता, रोगियों पर दयाभाव, प्रेमपूर्वक चिकित्सा करना और चैथी वृत्ति है असाध्य रोगों में रोग की उपेक्षा। लेकिन चरक संहिता में धनलोभी वैद्य की जोरदार निन्दा की गयी है, “सर्प का विष पीकर प्राण गंवाना, उबाले हुए ताम्र जल को पीकर अपना शरीर नष्ट करना या अग्नि में तपाए हुए लोहे के गोले को खा लेना अच्छा है लेकिन रोग से दुखी, शरण में आए रोगी से अन्न और धन लेना अच्छा नहीं है।” भारत की यही चिकित्सा पद्धति और इसके आदर्श अरब पहुंचे। अरबों से यूनान होते हुए सारी दुनिया में प्रतिष्ठित हुए। पश्चिम की सभ्यता समर्थकों ने आदर्श छोड़ दिये। चिकित्सा मुनाफे का व्यवसाय बनी। सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं रूग्ण हैं। निजी चिकित्सा केन्द्र मुनाफाखोर व्यवसाय बन गये हैं। निजी प्रैक्टिस वाले डाक्टर महंगे हैं। प्राचीन भारतीय परम्परा का चिकित्सक आदरणीय था। राष्ट्र का लोकमंगल उसका लक्ष्य था।