अयोध्या विवाद: मस्जिद में नमाज इस्लाम का हिस्सा नहीं.. इन जगहों पर तोड़ दी जाती हैं मस्जिदें ?

Avatar Written by: September 27, 2018 5:48 pm

नई दिल्ली। अयोध्या विवाद से भले ही जुड़ा ना हो मस्जिद में नमाज पढ़ने का मामला, पर हकीकत यह है कि इस पर आया फैसला ही भविष्य में राम मंदिर के बनने और ना बनने के फैसले को प्रभावित करेगा । आज सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस अशोक भूषण ने संयुक्त फैसला सुनाते हुए कहा कि 1994 के पुराने फैसले को बदलने की जरूरत नहीं है, वो फैसला वैसा ही रहेगा। बता दें कि वो फैसला भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा ही दिया गया था।babri-masjidजिसके बाद अब कहा जा रहा है कि अयोध्या मामले पर सुनवाई में तेजी आएगी। और जल्द इस ऐतिहासिक रामजन्मभूमि विवाद पर फैसला आ सकता है। बता दें कि अयोध्या मामले पर 29 अक्टूबर से सुनवाई शुरू होगी, जिसकी सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की नई बेंच करेगी। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस्माइल फारूकी केस का असर इस मामले पर नहीं पड़ेगा।आज सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुराना फैसला उस वक्‍त के तथ्‍यों के मुताबिक था। इस्‍माइल फारूकी का फैसला मस्जिद की जमीन के मामले में था। जस्टिस भूषण ने कहा कि ‘फैसले में दो राय, एक मेरी और एक चीफ जस्टिस की, दूसरी जस्टिस नजीर की। जिस मामले पर आज सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया है। मस्जिद में नमाज केस में जस्टिस भूषण ने कहा- हर फैसला अलग हालात में होता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केस बड़ी बेंच को भेजने की जरूरत नहीं है।

जानिए, (1994) इस्माइल फारूकी केस क्या है ?

उस फैसले में सबसे अहम यह था कि हिंदू उस जगह पर पहले की तरह पूजा कर सकेंगे। और अब आए फैसले के बाद फिर से साफ हो गया है कि रामजन्मभूमि स्थल पर हिंदुओं को पूजा की परमिशन है।

5 दिसंबर 2017 को जब अयोध्या मामले की सुनवाई शुरू हुई थी। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये मामला महज जमीन विवाद है, लेकिन इसी दौरान मुस्लिम पक्षकार की ओर से पेश राजीव धवन ने कहा कि यहां नमाज पढ़ने का अधिकार है और उसे बहाल किया जाना चाहिए। नमाज अदा करना धार्मिक प्रैक्टिस है और इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। कहा गया कि ये इस्लाम का अभिन्न अंग है। क्या मुस्लिम के लिए मस्जिद में नमाज पढ़ना जरूरी नहीं है? धवन ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट ने 1994 में दिए फैसले में कहा था कि मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है।इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला 1994 के जजमेंट के आलोक में था और 1994 के संवैधानिक बेंच के फैसले को आधार बनाते हुए फैसला दिया था जबकि नमाज पढ़ना इस्लाम का अभिन्न अंग है और जरूरी धार्मिक गतिविधि है और ये इस्लाम का अभिन्न अंग है। इस संदर्भ में देखा जाए तो सबसे पहले 1994 के संवैधानिक बेंच के फैसले को दोबारा विचार करने की जरूरत है क्योंकि उस जजमेंट के तहत मस्जिद में नमाज पढ़ने का अधिकार खत्म होता है। अदालत ने कहा कि मामले में कोर्ट इस पहलू पर फैसला लेगा कि क्या 1994 के सुप्रीम कोर्ट से संवैधानिक बेंच के फैसले को दोबारा देखने के लिए मामले को संवैधानिक बेंच भेजा जाए या नहीं।

मुख्य जमीन विवाद मामला (रामजन्मभूमि) (टाइटल विवाद)

राम मंदिर के लिए होने वाले आंदोलन के दौरान 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिरा दिया गया था। इस मामले में आपराधिक केस के साथ-साथ दीवानी मुकदमा भी चला। टाइटल विवाद से संबंधित मामला सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है। 30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिए फैसले में कहा था कि तीन गुंबदों में बीच का हिस्सा हिंदुओं का होगा जहां फिलहाल रामलला की मूर्ति है। निर्मोही अखाड़ा को दूसरा हिस्सा दिया गया इसी में सीता रसोई और राम चबूतरा शामिल हैं बाकी एक तिहाई हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया गया। इस फैसले को तमाम पक्षकारों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। 9 मई 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगाते हुए यथास्थिति बहाल कर दिया।

इस मामले में टाइटल विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई और तमाम दस्तावेज के ट्रांसलेंशन किए गए। लेकिन पहले दिन ही सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्षकारों के वकील कपिल सिब्बल ने ये दलील देकर विवाद खड़ा कर दिया था कि सुनवाई में इतनी जल्दी क्यों है। सुनवाई जुलाई 2019 के बाद होनी चाहिए। उनका इशारा आम चुनाव के बाद सुनवाई करने को लेकर था। सिब्बल का कहना था कि ये साधारण जमीन विवाद नहीं है। वहीं हिंदू पक्षकारों के वकील हरीश साल्वे की दलील थी कि मामला सात साल से पेंडिंग है। कोर्ट को इससे मतलब नहीं होता कि बाहर क्या हो रहा है और जुलाई 2019 तक सुनवाई टालने से गलत संदेह जाएगा।

क्या मस्जिद इस्लाम का हिस्सा है, जानिए

वरिष्ठ पत्रकार और इस्लामिक मामलों के जानकार पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ के मुताबिक, इस्लाम में मस्जिद का धर्म से कोई मतलब नहीं है, मस्जिद इस्लाम का हिस्सा नहीं है। इस्लाम में कहा गया है कि सड़क पर हो, चौराहे पर हो, घर पर हो या कहीं भी हो, किसी भी जगह हो, आप नमाज अदा करना चाहे तो कार्पेट बिछाकर काबे की तरह मुंह करके नमाज अदा कर सकते हैं, आपकी नमाज कबूल होगी।

पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ के मुताबिक, मस्जिद को अल्ला का निवास स्थान नहीं माना जाता, इसे सिर्फ इबादत की एक जगह माना जाता है।

हालांकि ये भी सत्य है कि सऊदी अरब और बाकी इस्लामिक मुल्कों में जब सड़क चौड़ी करनी हो, होटल बनाना हो या किसी भी प्रकार का सार्वजनिक कार्य करना हो, तब मस्जिदों को ढहा दिया जाता है, और उस जगह पर दूसरा निर्माण कर दिया जाता है। जिसका मतलब है कि मस्जिदों को स्थानांतरित किया जा सकता है। और इसका इस्लाम से सीधा-सीधा कोई वास्ता नहीं है, अगर होता तो कभी सऊदी अरब जैसे देश में कभी मस्जिदें नहीं तोड़ी जाती, जबकि वहां किसी भी प्रकार की जरूरत पड़ने पर मस्जिद को तोड़ दिया जाता है।