एक देश, एक भाषा: आखिर हिंदी को क्यों ना मिले राष्ट्रभाषा का दर्जा?

एक देश, एक टैक्स… एक देश, एक चुनाव…..इसी तर्ज पर ‘एक देश, एक भाषा’ का नारा भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने दिया।

Avatar Written by: September 15, 2019 1:46 pm

नई दिल्ली। हिंदी हमारी मातृभाषा है, भारत की राजभाषा है और महात्मा गांधी के शब्दों में जनमानस की भाषा है। लेकिन यह कईयों के लिए आश्चर्य की बात है कि हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा नहीं है। बल्कि यूं कहें कि आजादी के 72 सालों बाद भी भारतवर्ष की कोई राष्ट्रीय भाषा नहीं है।

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संविधान तैयार करते वक्त इसपर गंभीरता से विचार किया गया था लेकिन संभवत देश में सैकड़ों भाषाओं के कारण इस पर एकमत नहीं बन पाया। आज देश में दो राजभाषा है – हिंदी और अंग्रेजी यानि संसद, कोर्ट या फिर किसी केंद्रीय व्यवस्था में इन दोनों भाषा में काम हो सकता है। जहां तक राज्यों की बात है तो 22 भाषाओं को आधिकारिक दर्जा मिला हुआ है।

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आजादी के बाद देश की जैसी संरचना थी, उसी के अनुसार संचार का माध्यम तैयार किया गया। लेकिन आज जब देश में पढ़े-लिखे वर्ग में लगातार वृद्धि हो रही है, आम जनता सजग है और विकास को आतुर है, तो इस दिशा में भी रिफार्म/सुधार की जरुरत है।

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एक देश, एक टैक्स… एक देश, एक चुनाव…..इसी तर्ज पर ‘एक देश, एक भाषा’ का नारा भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने दिया। हिंदी दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष जे पी नड्डा समेत विपक्षी पार्टियों के कई नेताओं ने भी मातृभाषा के मजबूती पर जोर दिया।

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कई भाजपा नेताओं ने महात्मा गांधी और सरदार बल्लबभाई पटेल के हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के सपने का जिक्र किया और देशवासियों को ज्यादा से ज्यादा इस प्रयोग में लाने को कहा।

हिंदी दिवस का जश्न लेकिन मच गया राजनीतिक बवाल

हिंदी दिवस के मौके पर जब भाजपा प्रमुख ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की अपील की, तो विपक्षी भड़क उठे और लगे राजनीतिक रोटियां सेंकने में। AIMIM प्रमुख असदुदीन ओवैसी ने इसे सियासी रंग दे दिया, दक्षिण भारत के कई नेताओं ने शाह से बयान वापस लेने की मांग शुरु कर दी जबकि कर्नाटक में तो सड़कों पर विरोध प्रदर्शन शुरु हो गये। कुछ नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार हिंदी को जबरदस्ती थोप रही है और यह उचित नहीं है।

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अमित शाह ने कहा था भारत में हर भाषा का अपना महत्व है लेकिन एक आवश्यक है कि देश में एक राष्ट्र भाषा हो, जो विश्व में देश को अलग पहचान दिला सके।

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और हो भी कोई नहीं हो – देश के कोने-कोने में यदि एक भाषा का प्रवाह होगा, तो ना केवल यह देश की एकता और अखंडता को मजबूती देगा बल्कि जनता को भी एक कड़ी में जोड़ने में अहम रोल निभायेगा। अमूमन जब उत्तर भारत के लोग दक्षिण जाते हैं या फिर vice-versa तो साधारण वार्तालाप में भी इतनी कठिनाई आती है मानो कि किसी विदेशी धरती पर आ गये हों। भारत की एक राष्ट्रभाषा होगी, तो विश्व पटल पर हमारी एक अलग पहचान होगी। विश्व के कई देश अपने भाषा, अपने संस्कृति से समझौता करने में यकीन नहीं करते – जैसे चीन या जापान या फिर खाड़ी देशों के नेता… अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भी अपने राष्ट्रभाषा का ही इस्तेमाल करते हैं।

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ऐसे में भारत और हिंदी भाषा पीछे क्यों रहे? आखिर पूरे विश्व में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा में हिंदी तीसरी सबसे बड़ी भाषा है। विश्व की करीब 4.5% आबादी हिंदी में संवाद करती है और गूगल के अनुसार इंटरनेट पर हिंदी पढ़ने वालों की संख्या में हर साल 94% की वृद्धि हो रही है। अंग्रेजी में यह दर सालाना मात्र 17 फीसदी ही है।

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