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कोरोना महामारी है। महमारी की इस अवधि में हजारों विद्वान व विशेषज्ञ प्रकट हो गए हैं। हमारे जैसे विद्यार्थी हलकान हैं। ढेर सारे विद्वान, ढेर सारे विशेषज्ञ, ढेर सारे चैनल। पुराना फिल्मी गीत याद आता है- किस किस को प्यार करूं? टीवी पर बहसे ही बहसें।

कोरोनावायरस के कारण जहां दुनिया भर में खौफ का माहौल है। वहीं अबतक इस महामारी ने पूरी दुनिया में ऐसा कोहराम मचाया कि तीन लाख से ज्यादा लोगों की इसकी वजह से मौत हो चुकी है और 46 लाख से ज्यादा लोग इसके संक्रमण के शिकार हैं।

भारत में 130 करोड़ जनता पर लगभग 8 लाख पंजीकृत एलोपैथिक डॉक्टर हैं। अर्थात 1500 पर एक डॉक्टर जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO)की मानें तो 1000 पर एक डॉक्टर होना चाहिए।

समुदाय की भागीदारी और पहल के लिए प्रशंसा और आभार ने पीएम नरेंद्र मोदी के संबोधन को चिह्नित किया। डॉक्टरों, नर्सों, पैरामेडिक्स सहित अग्रिम पंक्ति के देखभालकर्ताओं द्वारा किए गए असाधारण कार्यों पर प्रकाश डालते हुए, उन्होंने शिक्षण समुदाय के कार्य की भी जमकर सराहना की।

अथर्ववेद भारतीय अनुभूति का मधुरस है। निस्संदेह इसके पूर्व ऋग्वेद में दर्शन और विज्ञान के ज्ञान अभिलेख हैं, प्रकृति के प्रति गहन जिज्ञासा है। मनुष्य को आनंदित करने वाली जीवनदृष्टि है।

घर आनंद है, घर में होना अपनत्व में रहना है। बच्चे बाहर खेलने जाते हैं, खेलने के बाद घर लौट आते हैं। हम सब पूरे दिन बाहर काम करते हैं, काम के बाद घर लौट जाते हैं।

कोरोनावायरस से फैली महामारी के समय में व्यक्तिगत तौर पर मुझे लग रहा है कि भावनाओं पर क़ाबू नहीं रह रहा है। समय-समय पर तरह-तरह के भाव मन में आ रहे हैं, अपने बारे में सबकुछ जानने के बाद भी बहुत खुश होने का भाव भी उनमें एक है।

यही वजह है जो मैं आपके समक्ष उन मंदिर तथा मठों की एक सूची प्रस्तुत कर रहा हूँ जो यह सिद्ध कर रहा है कि इस विकट परिस्थिति में, तमाम मंदिर एवं मठ, राष्ट्र निर्माण एवं जनकल्याण हेतु अपने सहयोग की घोषणा कर चुके हैं।

आपत्काल का प्रभाव दोधारी तलवार जैसा होता है। आपदाएं असहाय होने का भाव जगाती हैं। निराश करती हैं। निराशा मन की विशेष चित्तदशा है।