एक मात्रा से युक्त ओंकार की उपासना से ऋग्वेद की ऋचाएं विराट महिमा का अनुभव कराती हैं

स्वयं को अस्तित्व में समर्पित करना गुरूता है। यहां सब ‘एक’ है। सब अद्वैत है। यही परम है। यही ओंकार है। समस्या यही है कि इसे कहें कैसे?

Written by हृदय नारायण दीक्षित April 28, 2019 2:13 pm

नई दिल्ली। प्रश्नोपनिषद् का नाम बड़ा प्यारा है। यह प्रश्नो-प्रतिप्रश्नों व उनके उत्तरों से बनी उपनिषद् है। यह अथर्ववेद के पिप्पलाद-शास्त्रीय ब्राह्मण भाग के अंतर्गत है। प्रश्नोपनिषद् के रचनाकाल में प्रश्न और जिज्ञासा का वातावरण था। हम उस काल का सहज
अनुमान लगा सकते हैं। भारत के विभिन्न क्षेत्रों के 6 जिज्ञासु कश्मीर स्थित पिप्पलाद ऋषि के आश्रम पहुंचे थे। पिप्पलाद विद्वान थे। जिज्ञासु 6 प्रश्न प्रेमी भी साधारण मेधा के नहीं रहे होंगे। तब यातायात के साधन भी नहीं थे। ज्ञान प्राप्ति की अभिलाषा के कारण वे
लम्बी दूरी तय करके कश्मीर पहुंचे थे।

उपनिषद् के अनुसार “भरद्वाज के पुत्र सुकेशा, शिविकुमार सत्यकाम, गर्गगोत्री सौर्ययाणी, कौशल के निवासी आश्वलायन, विदर्भ देशीय भार्गव और कव्य के प्रपौत्र कबंधी ये 6 विद्वान वेदाभ्यासी ब्रह्मनिष्ठ व आदर्श आचरण वाले थे। वे परम सत्य की खोजी थे – अन्वेषमाणाः। इसी जिज्ञासा के साथ वे पिप्पलाद ऋषि के पास गये थे।” 1⁄4प्रश्न 1 पूर्व भूमिका 1⁄2 प्रश्नोपनिषद् की इस भूमिका मात्र से हम तत्कालीन जिज्ञासु वातावरण का अनुमान लगा सकते हैं। भारत प्रश्नाकुल धरती है। प्रकृति और अस्तित्व की गतिविधि को समझने के लिए प्रश्न परम्परा का विशेष महत्व रहा है। प्रश्नोपनिषद् की कथा वाले 6 विद्वानों की जिज्ञासा गहरी थी। पिप्पलाद ने उनकी प्रशंसा भी की लेकिन प्रश्नोत्तर को एक साल की प्रतीक्षा सूची में डाल दिया। उन्होंने कहा “तुम सब तपस्वी हो, वेद विद्वान हो लेकिन एक वर्ष तक यहीं मेरे आश्रम में तपस्यापूर्वक निवास करो। एक वर्ष बाद मैं तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर दूंगा।” उन्होंने प्रतीक्षा की।

पिप्पलाद ने उनके प्रश्नों के उत्तर भी दिये लेकिन इन प्रश्नों से अलग एक प्रश्न हमारा भी है कि “पिप्पलाद ने प्रश्नोत्तरों को एक वर्ष तक क्यों लटकाए रखा? वे तत्काल भी प्रश्नों के उत्तर दे सकते थे। उन्होंने एक वर्ष की प्रतीक्षा क्यों करवाई? संभवतः इसका उत्तर है – वातावरण से होने वाली चित्त शुद्धि और प्रतीक्षा के दौरान प्रश्नों के प्रति प्रश्नकर्ता की निष्ठा में ज्ञान प्राप्ति की इच्छा तीव्रता में वृद्धि। पिप्पलाद साधारण प्रतिभाशाली थे। उनके तप, आचार विचार व्यवहार से आश्रम के वातावरण में विशेष विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र का निर्माण हुआ हो तो आश्चर्य क्या है? पिप्पलाद ने सोचा होगा कि जिज्ञासु यहां 1 वर्ष रहकर आश्रम की गतिविधि से जुड़े रहकर चेतना के नए तल पर होंगे। तब
प्रश्नोत्तर का आनंद भी भिन्न होगा।

एक दूसरी बात भी विचारणीय है। पिप्पलाद ने उनकी प्रश्न निष्ठा की भी परीक्षा ली होगी कि वे प्रश्न निष्ठ होंगे तो प्रतीक्षा करेंगे वरना चले जाएंगे लेकिन जिज्ञासुओं ने प्रतीक्षा की। एक साल बाद प्रश्नोत्तर हुआ। जगत् जीवन प्रपंच से जुड़े प्रश्नोत्तर हुए। पूरा प्रश्नोत्तर आनंददायी है लेकिन यहां ओम् संदर्भ से जुड़ा प्रश्नोत्तर ही अभीष्ठ है। उपनिषद् में यह पांचवा प्रश्न है। तब ओम् साधना की महत्ता थी। ओम् की जिज्ञासा सर्वत्र थी। सत्यकाम ने पूछा “पूरे जीवन ओंकार की उपासना करने वाले को किस लोक की प्रप्ति होती है।” 1⁄4वही 5.21⁄2 यहां अन्य उपनिषदों की तरह ओम् की जिज्ञासा नहीं है। यहां ओम् उपासना का फल पूछा गया है लेकिन पिप्पलाद ने ओम् का परिचय भी कराया है “सत्यकाम! यह ओंकार ही ब्रह्म परम ब्रह्म है। इसलिए वह इसी एक ही अवलम्ब से अपने इष्ट को चाहने वाला मनुष्य इच्छानुसार लब्धि पाता है। एक मात्रा से युक्त ओंकार की उपासना से ऋग्वेद की ऋचाएं साधक को विराट महिमा का अनुभव कराती हैं। दो मात्राओं वाली  ओंकार उपासना से वह मनोमय चन्द्रलोक को प्राप्त करता है। यजुर्वेद के मंत्र उसे चन्द्रलोक का आनंद उलब्ध कराते हैं। तीन मात्राओं वाले ओम्कार उपासना से वह मुक्त होता है। सामगान के सुर मंत्र उसे सूर्य मण्डल ले जाते हैं। 1⁄4वही 3, 4, 51⁄2 यहां तक ओंकार की तीन मात्राओं का फल अलग-अलग है।

ओंकार की उपयोगिता असंदिग्ध है। अलग अलग ध्येय या एक ध्येय निष्ठा के बावजूद इनसे मिलने वाला चेतन तत्वबोध ज्ञानी को विचलन से बचाता है। वह परमबोध को प्राप्त करता है। 1⁄4वही 61⁄2 पिप्पलाद को संभवतः अनुमान था कि अब तक बताए गए विवरण में
थोड़ी जटिलता है। इसलिए वे वैदिक मंत्र विभागों के उल्लेख को दोहराते जान पड़ते हैं। कहते हैं “एक अंग को या एक मात्रा को ध्यान में रखकर की गई उपासना से ऋग्वेद की ऋचाएं उसे इसी लोक में प्रतिष्ठा देती हैं।” इस लोक की प्रतिष्ठा सर्वसाधारण की इच्छा है। ऋग्वेद इसमें सहायक है। ऋग्वेद में जबर्दस्त इहलोकवाद है। आनंदपूर्ण जीवन की अभिलाषा है। आगे कहते हैं “दो अंगों या दो मात्राओं वाले ध्येय भूत उपासक को यजुर्वेद के मंत्र अंतरिक्ष में चन्द्रलोक ले जाते हैं। ओम्कार की त्रिमात्रा उपासना वाले साधक को साममंत्र गान सूर्यलोक या ब्रह्मलोक ले जाते हैं। यह लोक परम शांत, बुढ़ापा रहित, मृत्युरहित भयरहित परम है।” 1⁄4वही 71⁄2 मजेदार बात है कि यह उपनिषद् अथर्ववेदीय ब्राह्मण भाग के अंतर्गत है। लेकिन इसमें ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद की प्रतिष्ठा है। अथर्ववेद का उल्लेख भी नहीं है। ऋग्वेद
को इसी लोक, यजुर्वेद को चन्द्रलोक व सामवेद को सूर्यलोक से जोड़ा गया है। यहां साम श्रेष्ठ है। ऋग्वेद तीसरा है और यजुर्वेद दूसरा।
सामवेद ज्ञान गान है। ज्ञान का सामान्य हस्तांतरण शब्दों द्वारा किया जाता है लेकिन अनुभूति का हस्तांतरण शब्दों से नहीं होता। गीत हृदय से हृदय का संवाद होते हैं।

 

सरस प्रवाह से भरेपूरे होते हैं। ज्ञान गान होकर अनुभूति का भिन्न तल अनुभव कराता है। इसलिए सामगान की श्रेष्ठता है। श्रीकृष्ण ने गीता में अर्जुन से कहा है कि “वेदों में सामवेद मैं ही हूं।” ठीक बात है। ब्रह्म सत्य की अभिव्यक्ति साम में ज्यादा संभव है। श्रीकृष्ण परम की ही अभिव्यक्ति बताए गए हैं। वे प्रकृति के 16 कलाओं से युक्त अवतार कहे गए हैं। वे परम हैं। उपनिषद् में पिप्पलाद ने भी ओम् को परम ब्रह्म बताया है। अपनी-अपनी अनुभूति और प्रतीति। यह अपनापन स्वयं की अस्मिता गढ़ लेता है। निजी अस्मिता अस्तित्व अनुभूति से पृथक है। उपनिषद् दर्शन में अपना पराया, निज वैयक्तिक आभासी है। स्वयं को इकाई जानना लघुता है। स्वयं को अस्तित्व में समर्पित करना गुरूता है। यहां सब ‘एक’ है। सब अद्वैत है। यही परम है। यही ओंकार है। समस्या यही है कि इसे कहें कैसे?

 

पहले तो समझना जानना ही कठिन है, दूसरे जानकर भी इसे कहना समझाना और भी कठिन। ओ3म् उपासना और धारणा निरी आस्था नहीं है। यहां भौतिक सुख की इच्छाएं है, पराभौतिक आनंद की अभिलाषा के साथ साथ परम तत्त्व की अभीप्सा भी है। ओ3म् सृष्टि की सम्पूर्णता के साथ एकात्म हो जाने वाले बीज गणित का परम बीज है। बीज में अनंत संभावनाएं होती हैं। वह टूटकर पौध बनता है। फूल देता है। फूल फल बनते हैं। फल बीज बनते हैं और बीज फिर से आगे के प्रवाह की निरंतरता। क्या ओ3म् को परम आनंद का बीज कह सकते हैं?