धार्मिक भेदभाव न बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में हो, न अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में

Written by: November 29, 2019 6:17 pm

डॉ. रसाल सिंह

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान विभाग में डॉ. फ़िरोज़ खान की नियुक्ति का विरोध पिछले दिनों बौद्धिक संसार में विशेष चर्चा का विषय रहा है। संबंधित विभाग के छात्रों ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के संविधान और हिन्दू धर्मावलंबियों की आस्था का हवाला देते हुए यह विरोध किया है। उन छात्रों से अलग मत रखते हुए मैं इस नियुक्ति का स्वागत करता हूँ क्योंकि विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति के सन्दर्भ में विश्वविद्यालय की नियमानुसार गठित चयन-समिति का निर्णय अंतिम और सर्वोपरि होता है।

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माननीय उच्चतम न्यायालय ने भी विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता का सम्मान करते हुए नियमानुसार गठित चयन-समिति के निर्णय में कभी हस्तक्षेप नहीं किया है। हिन्दू धर्म अत्यंत उदार और सर्वसमावेशी है। उसमें कभी किसी ‘दुराग्रह’ को स्वीकृति नहीं मिली। साथ ही, भारत एक लोकतांत्रिक और निरंतर प्रगतिशील राष्ट्र है। यह नियुक्ति इस उदार दृष्टि का ही प्रतिफलन है। इस नियुक्ति का विरोध भाषा और धर्म दोनों को ही सीमित दृष्टि से देखने का सम्भव परिणाम है। उल्लेखनीय है कि संस्कृत भाषा ही नहीं, धर्मग्रंथों का भी पठन-पाठन एवं अनुवाद दाराशिकोह से लेकर मैक्समूलर तक ने किया है। हिन्दू देवी-देवताओं के उपासक और उनकी महिमा को समर्पित मार्मिक भक्ति-काव्य लिखने वाले मुस्लिम कवियों की सुदीर्घ परम्परा है। रसखान, रहीम और नज़ीर अकबराबादी उनमें अग्रणी हैं। भाषाविशेष पर धर्मविशेष का एकाधिकार श्रेयस्कर नहीं। वह चाहे संस्कृत पर हिंदुओं के एकाधिकार की बात हो या उर्दू/ फ़ारसी पर मुसलमानों और पंजाबी पर सिखों के सर्वाधिकार की बात हो। हालांकि, यह भी सर्वमान्य तथ्य है कि भाषा महज अभिव्यक्ति का माध्यम मात्र नहीं बल्कि संस्कृति की संवाहिका भी है। धर्म और संस्कृति का अन्यान्योश्रित संबंध है। इस सत्य की स्वीकार्यता के बावजूद एक प्रगतिशील और लोकतांत्रिक समाज में भाषाविशेष पर धर्मविशेष की इजारेदारी अस्वीकार्य है।

इस पृष्ठभूमि में यह भी समझने और स्वीकारने की आवश्यकता है कि धर्म, महज ज्ञान का ही विषय नहीं,भावना का विषय भी है। भाषा/साहित्य शिक्षण और धर्मशास्त्र शिक्षण एवं पौरोहित्य प्रशिक्षण में अंतर होता है। धर्मशास्त्र एवं पौरोहित्य के अध्यापन में सैद्धान्तिक पक्ष के अलावा व्यावहारिक/प्रायोगिक पक्ष भी है। इस्लाम धर्म और सनातन धर्म में “मूर्तिपूजा” जैसे कई विषयों पर गहरी असहमतियाँ हैं। आशा है, डॉ. फ़िरोज़ खान और उनके प्रवक्ता ऐसी तमाम बातों से अपरिचित न होंगे और इनका ध्यान और सम्मान करेंगे।

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प्रथमदृष्ट्या यह विरोध तार्किक और न्यायसंगत भले न लगे, मगर विचारणीय अवश्य है। छात्रों के इस विरोध ने कुछ आधारभूत प्रश्न खड़े किए हैं। निश्चय ही, वे भी विचारणीय हैं…

  1. क्या उदारता की अपेक्षा सिर्फ हिन्दू धर्म के अनुयायियों से ही की जानी चाहिए या सभी धर्मों को उदार और समावेशी होने की आवश्यकता है?
  2. अल्पसंख्यक संस्थानों (अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, सेंट स्टीफेंस कॉलेज, जीसस एन्ड मैरी कॉलेज आदि ) में धर्म विशेष को दिए जाने वाले विशेषाधिकार और वरीयता कितनी न्यायसंगत है? क्या आधुनिक, प्रगतिशील और लोकतांत्रिक समाज में इसप्रकार के विशेषाधिकार और वरीयता साम्प्रदायिक पहचान और भेदभाव को पुष्ट नहीं करते?
  3. इन तथाकथित अल्पसंख्यक संस्थानों में दलितों,पिछड़ों और वंचित वर्गों की उपस्थिति और हिस्सेदारी नगण्य है। उनके सशक्तिकरण और हिस्सेदारी के लिए किये गये संवैधानिक प्रावधान आरक्षण को इन संस्थानों में लागू क्यों नहीं किया जाना चाहिए? इन संस्थानों में चल रही “जनेऊ लीला” तथाकथित सामाजिक न्याय के पैरोकारों को क्यों नज़र नहीं आती?
  4. क्या मुस्लिम समुदाय जैसे जनसांख्यिक और प्रतिनिधित्व की दृष्टि से भारत के दूसरे बड़े समुदाय को अल्पसंख्यक समुदाय मानना न्यायसंगत और तार्किक है?
  5. क्या यह विरोध और विवाद समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड) की महत्ता, उपयोगिता और आवश्यकता को स्थापित नहीं करता है? क्या धर्म विशेष के आधार पर मिलने वाले विशेषाधिकारों की समीक्षा करते हुए सभी धर्मानुयायियों को सार्वजनिक स्थानों और सरकारी संस्थानों एवं संस्थाओं में एक समान अधिकार सुनिश्चित करने की आवश्यकता नहीं है? धर्मविशेष के विशेषाधिकारों की सार्वजनिक स्वीकार्यता से ही ऐसे विरोध का आधार बनता है।क्या तुष्टिकरण उदार और लोकतांत्रिक समाज की विषबेल नहीं है? धार्मिक मान्यताओं, रूढ़ियों और अंधविश्वासों की वजह से समाज के किसी भी वर्ग के अधिकारों का हनन रोका जाना चाहिए। यह लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और न्यायप्रिय समाज की आधारभूमि है। साथ ही, विधि के समक्ष समता की अवधारणा के तहत सभी के साथ समानता का व्यवहार भी होना चाहिए।

भारतीय संविधान के भाग 4 के अनुच्छेद 44 में समान नागरिक संहिता का उल्लेख है। जिसका उद्देश्य व्यक्तिगत कानूनों (धार्मिक ग्रंथों और रीति-रिवाजों पर आधारित कानूनों) को प्रतिस्थापित कर देश के समस्त नागरिकों (चाहे वह किसी धर्म या पंथ से संबंधित हों) के लिये समान नागरिक कानून लागू करना है। यह किसी भी धर्म या जाति के सभी निजी कानूनों से ऊपर होता है। शिक्षित व्यक्ति ही समान नागरिक संहिता के लाभ-हानि और गुण-दोष का विवेचन-विश्लेषण कर सकते हैं।

DR. Firoz Khan BHU

जब देश के विभिन्न प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में भी धर्म के नाम पर आजतक भेदभाव विद्यमान है, और उसे वैधता प्राप्त है तो वह इसीप्रकार के  साम्प्रदायिक असंतोष, अशांति, अराजकता,विद्वेष, वैमनस्य और संकीर्णता का कारण बनेगा। आज यदि ज्ञानार्जन और अध्ययन-अध्यापन में ‘धार्मिक पूर्वग्रह’ बाधक बनकर उपस्थित हुआ है तो यह सभी धर्मावलम्बियों के लिए विचारणीय विषय है और इसमें उनके लिए एक स्पष्ट सन्देश अन्तर्निहित है कि कम-से-कम ज्ञानकेंद्रों को निजी (धार्मिक) कानूनों से मुक्त करें।

भारत जैसे वैविध्यपूर्ण और बहुल देश में ‘समान नागरिक संहिता’ लागू करके ही ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका  विश्वास’ हासिल किया जा सकता है। भारतीय संस्कृति विश्व-बंधुत्व की संस्कृति है। इस  विश्व-बंधुत्व भाव में ही संकीर्णताओं की समाप्ति और समान नागरिक संहिता के बीज भी विद्यमान हैं-

“अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।”

42 वें संशोधन द्वारा भारतीय संविधान की प्रस्तावना में पंथ निरपेक्ष शब्द को शामिल किया गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारतीय संविधान का उद्देश्य और मंतव्य भारत के नागरिकों के साथ धार्मिक आधार पर होने वाले किसी भी भेदभाव को समाप्त करना है। लेकिन आजतक समान नागरिक संहिता लागू न हो पाने के कारण भारत में नागरिक समाज का एक बड़ा हिस्सा अभी तक धार्मिक कारणों की वजह से अपने अनेक अधिकारों और अवसरों से वंचित है। वहीं, एक हिस्सा धर्म विशेष की आड़ में बहुत से विशेषाधिकारों का लाभ ले रहा है।

भारतीय संविधान में नागरिकों को प्रदत्त मूल अधिकारों में विधि के शासन की भावना विद्यमान है। लेकिन इस अवधारणा के बावजूद धार्मिक और लैंगिक असमानता व्याप्त है। विधि के शासन की अवधारणा का अर्थ है कि देश के सभी नागरिकों के लिए एक समान विधि होनी चाहिए अर्थात विधि के सामने सभी नागरिक समान होने चाहिए। समान नागरिक संहिता का लागू न होना एक तरह से विधि के शासन और संविधान की प्रस्तावना का उल्लंघन है। सामासिक संस्कृति के नाम पर किसी धर्म विशेष के अनुयायियों के विशेषाधिकार संविधान की मूलभावना के साथ खिलवाड़ हैं। संविधान की मूलभावना के साथ की गयी इस छेड़छाड़ से ही कई प्रकार की असमानता और भेदभाव का बीजवपन होता है।

banaras hindu university

राजनीतिक लाभ के लिए कई बार सरकारें/राजनीतिक दल ऐसे धार्मिक मुद्दों पर बहस या बदलाव से बचते हैं। सरकारों को ऐसे मामलों को धार्मिक दृष्टि के बजाय कानून और न्याय की दृष्टि से देखना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा शाहबानो मामले में लिए गए निर्णय को तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने धार्मिक दबाव में आकर संसद के कानून के माध्यम से पलट दिया था। यह एक प्रतिगामी कदम था। सर्वोच्च न्यायालय ने संपत्ति पर समान अधिकार, मंदिर में महिलाओं एवं दलितों का प्रवेश, तीन तलाक की समाप्ति जैसे न्यायिक निर्णयों के माध्यम से समाज में समानता हेतु उल्लेखनीय प्रयास किया है। लेकिन सरकार तथा न्यायालय को समता को लागू करने की दिशा में और भी प्रयास करने की आवश्यकता है।

आज समान नागरिक संहिता का मुद्दा एक संवैधानिक मुद्दा या  सामाजिक/ व्यक्तिगत अधिकारों के मुद्दे से हटकर एक राजनैतिक मुद्दा बन गया है। इसलिए जहां एक ओर कुछ राजनीतिक दल इस मामले के माध्यम से राजनीतिक तुष्टिकरण कर रहे हैं,वहीं दूसरी ओर उसकी प्रतिक्रिया में धार्मिक ध्रुवीकरण भी हो रहा है। किसी भी धर्म के मामलों में बदलाव को सुगम और स्वीकार्य बनाने के लिए उस धर्म के बहुसंख्यक समर्थन की आवश्यकता पड़ती है।

इसलिए राजनीतिक तथा न्यायिक प्रक्रिया के साथ – साथ धार्मिक समूहों के साथ निरंतर  चर्चा-परिचर्चा करते हुए मानसिक बदलाव का प्रयास किया जाना भी आवश्यक है। सांस्कृतिक विशिष्टताओं का भी सम्मान किया किया जाना चाहिए किन्तु सरकार और विधि के सामने सबकी समानता सुनिश्चित की जानी चाहिए। राष्ट्र में किसी भी धार्मिक समूह को वरीयता और अन्य की उपेक्षा असंतोष और अशांति पैदा करती है।

स्वतंत्रता के 72 वर्ष बाद भी नागरिक समाज का एक बड़ा हिस्सा अपने मूलभूत अधिकारों से वंचित है और उनके लिए आजतक संघर्ष कर रहा है। अल्पसंख्यक संस्थानों या धर्म विशेष के संस्थानों में सामाजिक न्याय या वंचित वर्गों के लिए आरक्षण का न होना अनुचित है और विचारणीय है। धर्मविशेष के अनुयायियों को लाभ/ सुविधा देना क्या समाज में समता, उदारता तथा समुचित  विकास को प्रोत्साहित करता है?

धर्मविशेष के अनुयायियों को प्रश्रय और अन्य धर्मानुयायियों की उपेक्षा पारस्परिक विद्वेष, प्रतिस्पर्धा और विरोध पैदा करता है। यह भेदभाव समकालीन आधुनिक और लोकतांत्रिक युग में संकुचित दृष्टिकोण का परिचायक है और अलगाववादी और विभाजनकारी विचारों को  परिपुष्ट करता है। इसप्रकार के धार्मिक और लैंगिक भेदभाव के विरुद्ध आवाज उठाना आधुनिक और प्रगतिशील नागरिक समाज का प्राथमिक कर्तव्य है। आज भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में “एक देश,एक क़ानून” जैसा आह्वान करने की आवश्यकता है। ऐसा होने पर ही एक संतुलित, समतामूलक और न्यायपूर्ण समाज का सपना साकार हो सकेगा और डॉ. फ़िरोज़ खान की नियुक्ति के विरोध जैसे विवादों से बचकर विश्वविद्यालय ज्ञान-विज्ञान और संस्कृति-संस्कार के सच्चे केंद्र बन सकेंगे।

BHU Sanskrit

अस्तु, डॉ. फ़िरोज़ खान की नियुक्ति संस्कृत भाषा, हिन्दू धर्म और भारतवर्ष के लिए शुभ और मंगलकारी होगी। यह भारतीय समाज को और भी समन्वयधर्मी और सर्वसमावेशी बनाएगी।

(प्राध्यापक, किरोड़ीमल कॉलेज, दिल्ली

सदस्य, विद्वत परिषद्, दिल्ली विश्वविद्यालय

संपर्क- 8800886847

ईमेल- [email protected])