ऋग्वेद दुनिया की प्राचीनतम काव्यों में से एक

ऋग्वेद अतिप्राचीन असाधारण काव्य रचना है। इसके भीतर ऋग्वेद से भी पूर्व के वैदिक समाज के विवरण हैं। ऋग्वेद की भाषा व्यवस्थित है। इस स्तर की भाषा के विकास के लिए हजार दो हजार वर्ष का समय पर्याप्त नहीं है।

Written by हृदय नारायण दीक्षित August 11, 2019 2:03 pm

ऋग्वेद दुनिया का प्राचीनतम काव्य है और प्राचीनतम ज्ञानोदय। लेकिन इसके रचनाकाल पर यूरोपीय दृष्टिकोण वाले विद्वानों के कारण बहस चलती है। मैक्समुलर के अनुसार ऋग्वेद ईसा से 1200-1000 वर्ष पूर्व की रचना है। ‘हिस्ट्री आफ एंशियेन्ट संस्कृत लिटरेचर’ (1959) में उन्होंने समूचे वैदिक साहित्य को तीन कालखण्डों में बांटा – पहला – मन्त्रकाल, इस समय मंत्र रचे गये। दूसरा – संहिताकाल, इस समय मन्त्रों का संग्रह हुआ और तीसरा ब्राह्मण काल, इस समय बाद का सारा वैदिक साहित्य रचा गया। उन्होंने प्रत्येक काल का समय 200 वर्ष बताया। अध्ययन श्रम न करने वाले लेखको/इतिहासकारों ने उनका यह विचार जस तस मान लिया। प्राचीन भारतीय समाज को असभ्य सिद्ध करने में संलग्न साम्राज्यवादी विचारकों को यह बात उपयोगी लगी। लेकिन मैक्समुलर ने कोई प्रमाण नहीं दिये। मैक्समुलर ने यह अटकल 19वीं सदी में की थी। अटकल भारी पड़ी। इसकी जबर्दस्त आलोचना हुई। उन्होंने अपना मत संशोधित किया। चाहे वैदिक मन्त्र 1000 या 1500 या 2000 या 3000 वर्ष ईसवी पूर्व रचे गये हों लेकिन दुनिया की कोई भी ताकत ठीक से यह बात नहीं बता सकती।”

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मैक्समुलर ने अपने अनुमान में बाद के वैदिक साहित्य के समय का तारतम्य नहीं बनाया। उन्होंने ऋग्वेद के बाद उपनिषद् काल व महाभारत युद्ध के समय में समन्वय की चिंता नहीं करते। 1200-1000 वर्ष ईसा पूर्व उपनिषद् को भी रखना युक्तिसंगत नहीं है। डाॅ0 अविनाश चंद्रदत्त ने पूरी युक्ति के साथ ऋग्वेद को 50 से 75 हजार वर्ष प्राचीन बताया है। सिंधु घाटी के विवरण में भारत में लेखन कला की जानकारी ईसा से 3000 वर्ष पूर्व अनुमानित है। ईसा पूर्व 3000 वर्ष में यहां लेखन कला थी। आर्य बाद में आए तो उन्हें लेखन कला का प्रयोग करना चाहिए था। लेखन कला का सिंधु सभ्यता के बाद का साक्ष्य सम्राट अशोक के अभिलेख हैं। ऋग्वेद सिंधु सभ्यता के बहुत पहले की रचना है। मैक्समुलर का अनुमान पुरातत्व द्वारा 20वीं सदी की शुरूवात में ही धराशायी हो गया। तुर्की के बोगाजकुई स्थान से उत्खनन में प्राप्त (1907 ई0) एक अभिलेख मित्र, वरूण, इन्द्र और नासत्य (अश्विन देव) आदि वैदिक देवों का उल्लेख एक राजकीय संधि की साक्षी में मिला। यह अभिलेख 1400 ई0 पूर्व के बताए गये। इन देवताओं के नाम बोगाजकुइ अभिलेख में ठीक उसी क्रम में दिए गये हैं जिस क्रम में वे ऋग्वेद के प्रसिद्ध वागाभ्भृणी सूक्त (10.125) में प्राप्त होते है।” (वही, पृष्ठ 29) विंटरनिट्ज ने ऋग्वेद का रचनाकाल 2500 ई0पूर्व और जैकोबी ने 4500 वर्ष ई0 पूर्व माना ही है।

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मैक्समुलर का अनुमान तथ्यहीन है लेकिन ऋग्वेद के प्रति उनकी अनुभूति सही थी। मैक्समुलर ने “माई आटोग्राफी” (पृष्ठ 193) में लिखा, “जहां तक वेदों के वास्तविक रचनाकाल का संबंध है, मैंने तत्परता से मान लिया था कि कालक्रम विचार से वह उतना प्राचीन नहीं है जितना कि पिरामिड, पर मान लीजिये कि वह होता, तो क्या हमारे अध्ययन के लिए उसका मूल्य इससे किसी प्रकार बढ़ जाता? यदि हम उसे 5000 ई0पू0 स्थिर करें तो कोई इस काल का खंडन कर सकेगा, इसमें मुझे संदेह है। और यदि हम वेद से और पहले जायें, संस्कृत के तथा आर्य भाषा के आदिम रूप के निर्माण के लिए जो समय दरकार था, उसे नापने बैठें, तो मुझे संदेह है कि इसके लिए 5000 वर्षो का समय भी पर्याप्त होगा। भाषा में अथाह गहराई है, एक स्तर के नीचे दूसरा स्तर मिलता चला जाता है इसके बहुत पहले कि हम जड़ों तक पहुंचें और उनके विस्तार के लिए, उनमें व्यक्त किये गये विचारों के विस्तार के लिए कितना समय, कितना प्रयत्न अनिवार्यतः आवश्यक रहा होगा।” मैक्समुलर ने ऋग्वेद के अध्ययन पर मेहनत की थी। उनकी आत्मकथा में अनुभूति है। इस अनुभूति में तमाम तर्क भी हैं। ऋग्वेद की विषय सामग्री के प्रति उनके मन में आदर है।

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जर्मन विद्वान जैकोबी ने ऋग्वेद के बाद रचे गए कल्पसूत्रों का रचनाकाल ईसा से 4700 वर्ष पूर्व माना है। इस आधार पर ऋग्वेद कल्पसूत्रों के बहुत पहले की रचना है। उन्होंने उचित ही ऋग्वेद का रचनाकाल लगभग 6500 वर्ष ईसा पूर्व माना था। भारत के प्रतिष्ठित विद्वान लोकमान्य तिलक ने ब्राह्मण ग्रंथो का रचनाकाल ईसा से 4500 वर्ष पूर्व बताया था। उनके अनुसार इस तरह कुछ ऋचाएं 10 हजार वर्षो की, कुछ 8500 वर्ष, और कुछ 7500 वर्ष (ई0पूर्व) प्राचीन हैं। तिलक ने लिखा है कि “सभी प्राचीनतम ऋचाएं ऋग्वेद की हैं।” ऋग्वेद की प्राचीनता असंदिग्ध है।

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ऋग्वेद की शब्द देह पर भी थोड़ी विचार भिन्नता है। मैक्समूलर के अनुसार इसमें 10,622 ऋचांए (श्लोक) हैं।  स्वामी दयानंद ने 10,522 ऋचांए मानी।  प्रो0 राधा कुमुद मुखर्जी ने 70 हजार पंक्तियाँ बतायीं। जो भी हो। ऋग्वेद में तत्कालीन समाज की व्याख्या है। वेद शब्द “विद्-ज्ञाने धातु से “ध” प्रत्यय द्वारा बना।  इसकी व्युत्पति “विदन्ति ये सवेदः” है अर्थात जिससे सही बात जानी जाए उसे वेद कहते है।  ऋग्वेद के अनुसार वेद तीन है।  पुरूष सूक्त में विराट से ऋक्, साम और यर्जु की उत्पत्ति बताई गयी (ऋ0 10/90) इनमें ऋग्वेद सर्वाधिक प्राचीन है। यहाँ ढेर सारे देवताओं की स्तुतियां हैं। ढेर सारी मानवीय अभिलाषाएं हैं। सारांशतः सत्य तत्व का दर्शन दिग्दर्शन है। ऋग्वेद के एक ऋषि दीर्घतमस द्वारा गाया मंत्र भारतीय दर्शन की एकात्म अनुभूति का प्रतिनिधि है, “इन्द्र, वरूण, अग्नि, यम और मातारिश्वा अनेक देवता है। सत्य एक है ज्ञानी जन उसे अनेक नाम लेकर बताते हैं। (ऋ 1.164.46) ऋग्वेद की प्राचीनता भी एक सत्य है। विद्वान प्राचीनता को लेकर अनेक अनुमान लगाते हैं।

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ऋग्वेद अतिप्राचीन असाधारण काव्य रचना है। इसके भीतर ऋग्वेद से भी पूर्व के वैदिक समाज के विवरण हैं। ऋग्वेद की भाषा व्यवस्थित है। इस स्तर की भाषा के विकास के लिए हजार दो हजार वर्ष का समय पर्याप्त नहीं है। प्राचीनकाल में सामाजिक विकास की गति धीमी थी। ब्राह्मण ग्रंथ और उपनिषद् ऋग्वेद के बाद की रचनाएं हैं। ऋग्वेद और ब्राह्मण ग्रन्थों के रचनाकाल में भी काफी फासला होना चाहिए। ब्राह्मणों के रचनाकाल तक वैदिक मन्त्रों की समझ जटिल हो गयी थी। ऐसे ही ऋग्वेद में उपलब्ध और संकलित मन्त्रों के पहले रचे गये मन्त्रों की अनुपलब्धता की बात भी है। प्रसिद्ध गायत्री मन्त्र ऋग्वेद (ऋ0 3.62.10) में संकलित है। ऐसी दार्शनिक स्तुति की रचना ऋग्वेद के बाकी मन्त्रों की तुलना में अतिप्राचीन भी हो सकती है। ऋग्वेद के रचनाकाल के बहुत पहले, हजारों बरस पहले भी एक विकासमान प्रबुद्ध दार्शनिक संस्कृति थी। ऋग्वेद के ऋषि कवि उसी दार्शनिक काव्यधारा के प्रतिनिधि हैं और ऋग्वेद उसी संस्कृति का अमर काव्य। अमेरिकी विद्वान ब्लूम फील्ड ने हापकिन यूनीवर्सिटी के 18वें अधिवेशन में ठीक कहा कि “आर्य सभ्यता का वास्तविक प्रारम्भ वैदिक साहित्य से कई हजार वर्ष पूर्व होना चाहिए।” यही सही भी है। आर्य सभ्यता का उद्भव ऋग्वेद से भी प्राचीन है। वैदिक संस्कृति और सभ्यता का विकास और प्रवाह ही भारत की आधुनिक सभ्यता व दर्शन में प्रकट हुआ है। दुनिया की किसी भी संस्कृति का अध्ययन ऋग्वेद की समझ के अभाव में पूरा नहीं हो सकता। ऋग्वेद ज्ञान, दर्शन, सभ्यता संस्कृति के अध्ययन का आदि प्रस्थान बिन्दु है।