ऋग्वेद में सविता महत्वपूर्ण देव हैं

सविता सूर्य ही हैं। सूर्य किरणें स्वर्णिम होती है। सविता देव का मण्डल 1 सूक्त 35 में स्वर्ण जोड़कर सुंदर मानवीकरण हुआ है। कहते हैं, “सविता देव ‘हिरण्याक्ष’ स्वर्ण आखों – दृष्टि वाले हैं।

Written by: September 29, 2019 12:06 pm

ऋग्वेद में सविता महत्वपूर्ण देव हैं। गायत्री नाम से विश्व चर्चित मंत्र में सविता की ही स्तुति है – तत्सविर्तुरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात। 1⁄43। 62.101⁄2 संभवतः यह विश्व की प्राचीनतम काव्य रचना है। सातवलेकर के अनुवाद में कहते हैं “हम सविता देव के उस श्रेष्ठ, वरण करने योग्य तेज का ध्यान करते हैं, यह सविता हमारी बुद्धियों को उत्तम मार्ग में प्रेरित करें।”

सविता देव बुद्धि को श्रेष्ठ मार्ग में प्रेरित करने वाले हैं। इनका सम्बंध विवेक और अनुभूति से है। सविता का दर्शन हमारी बुद्धि का प्रेरक है। गायत्री मन्त्र की ही तरह एक अन्य मन्त्र 1⁄45.82.11⁄2 में भी सविता के लिए वैसी ही शब्दावली वाली स्तुति है, “तत्सवितुर्वृणी वयं देवस्य भोजनम्, श्रेष्ठं सर्वधातम तुरं भगस्य धीमहि – हम सविता देव से उपभोग योग्य ऐश्वर्य की प्रार्थना करते हैं, हम उन भगदेव 1⁄4भगवान1⁄2 के सर्वधारक ऐश्वर्य को ग्रहण करें।” सविता प्रत्यक्ष देव हैं। ऋग्वेद में सविता के लिए 11 सूक्त हैं और 170 से ज्यादा जगह सविता का उल्लेख है। सूर्य के लिए 10 सूक्त हैं। सूर्य उपासना यूनान में भी थी। प्लेटों ने रिपब्लिक में इसका उल्लेख किया है।

ऊषा के लिए 20 सूक्त हैं और 300 बार ऊषा का उल्लेख हुआ है। वैदिक समाज में सविता, सूर्य और ऊषा अलग अलग उपास्य है लेकिन भौतिक यथार्थ में में वे एक ही सूर्य के विभिन्न रूप आयाम हैं। सूर्य प्रत्यक्ष है, सविता और ऊषा प्रगाढ़ अनुभूति की अभिव्यक्तियाँ हैं। डाॅ0 कपिल देव द्विवेदी 1⁄4वैदिक देवों का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक स्वरूप, पृष्ठ 711⁄2 ने जोर देकर लिखा है ‘सविता ही सूर्य है’। डाॅ0 द्विवेदी ने स्पष्ट किया है “सविता का अर्थ है – प्रेरणा शक्ति देने वाला प्रेरक, गति देने वाला। सूर्य संसार को गति प्रेरणा और प्रकाश देता है। अतः
सूर्य को सविता कहते है।” सविता ‘विश्वारूपाणि’ हैं और ऊषा के बाद प्रकाशित होते है। 1⁄45.81.21⁄2। यहां सविता और सूर्य एक है लेकिन अगले मन्त्र 1⁄4वही, 41⁄2 में दोनो अलग अलग प्रतीत होते हैं, “हे सविता देव, आप तीनों लोगों में प्रकाशित होते है और सूर्य रश्मियों से
संयुक्त होते हैं – सूर्यस्य रश्मिभिः समुच्यसि।”

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सविता सूर्य ही हैं। सूर्य किरणें स्वर्णिम होती है। सविता देव का मण्डल 1 सूक्त 35 में स्वर्ण जोड़कर सुंदर मानवीकरण हुआ है। कहते हैं, “सविता देव ‘हिरण्याक्ष’ स्वर्ण आखों – दृष्टि वाले हैं। 1⁄4वही, 81⁄2 उनका रथ भी ‘हिरण्येन’ स्वर्णिम है। 1⁄4वही, 1 व 51⁄2 वे ‘हिरण्यपाणि सविता’ हैं। 1⁄4वही , व 101⁄2 उनके हाथ भी सोने के हैं। मन्त्र 1⁄46.71.31⁄2 में उनकी जीभ ‘हिरण्य जिह्वः’ स्वर्णिम है। हिरण्यगर्भ भी स्वर्णिम है। उनका रूप में भी सूर्य जैसा है। उनसे यह संसार उत्पन्न हुआ है। सूर्य ही सविता हैं। वे अग्नि रूप भी हैं। एक मन्त्र 1⁄41.141.21⁄2 में ‘अग्नि के 3 रूप हैं, प्रथम भौतिक अग्नि, दूसरे मेघों में विद्युत रूप और तीसरे सूर्य हैं।” दिव्य
शक्ति एक है वही विभिन्न नाम रूप धारण करती है। ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के सूक्त 164 के प्रथम मन्त्र में “सूर्य देव 3 भाई हैं, प्रथम वे स्वयं हैं, उनके 7 पुत्र हैं।

दूसरे सर्वव्यापक वायु और तीसरे तेजस्वी अग्नि।” फिर सूर्य के रथ का वर्णन करते हुए कहते हैं “सूर्य के एक चक्र वाले रथ में 7 घोड़े जुड़े हैं। 7 नामों वाला 1⁄47 रंग1⁄2 एक ही घोड़ा रथ को खींचता है। 1⁄4वही, 21⁄2 फिर ‘सप्त’-सात शब्द के कई दोहराव हैं “सप्त तस्यु, सप्त चक्रं, सप्त वहन्त्यश्वाः, सप्त स्वसारो, सप्तनाम – सात दिन, सात अश्व, सात स्वरों में सविता की स्तुति करती सात बहिनें। 1⁄4वही, 31⁄2 सूर्य प्रकाश में 7 रंग हैं। ध्वनि में 7 सुर हैं। दिन भी 7 हैं। इसके बाद सृष्टि के प्रथम जन्मा पर सुंदर जिज्ञासा है “को ददर्श प्रथमं जायमान – प्रथम जन्मा को किसने देखा, जो अस्थिरहित होकर भी सम्पूर्ण संसार का पोषण करते हैं।” 1⁄4वही, 41⁄2 सूर्य प्रत्यक्ष हैं, गोचर है, ऋषि इसके पीछे छुपे परमतत्व के प्रति जिज्ञासु है, “ये विज्ञ सप्त तन्तुओं 1⁄4किरणों, सुरों, दिवसो1⁄2 को कैसे फैलाते है?” 1⁄4वही, 51⁄2 ऋषि विद्वानों का आह्वान करते है और अपना अज्ञान स्वीकार करते है, मैं अज्ञानी हूँ लेकिन जानना चाहता हूँ। 1⁄4वही, 6 व 71⁄2 ऋषि सृष्टिकत्र्ता का जन्म रहस्य जानना चाहते है। जन्म के लिए माँ पिता का मिलन चाहिए।

कहते हैं “माता ने पिता का सेवन किया। नमनपूर्वक विचार-विमर्श हुआ। माता गर्भ रस से निबद्ध हुई। माता की सामथ्र्यसूर्यदेव की धारक क्षमता पर आधारित है।” 1⁄4वही, 7 व 81⁄2 फिर कहते हैं “सृष्टि का 12 अरों 1⁄4राशियों1⁄2 वाला चक्र द्युलोक में घूमता रहता है। यह कभी जीर्ण नहीं होता।” 1⁄4वही 111⁄2 यहां प्रत्यक्ष भौतिक विज्ञान और काव्य साथ साथ हैं। सविता प्रत्यक्ष तेज हैं। सूर्य इस तेज की अभिव्यक्ति हैं और ऊषा सूर्योदय के पूर्व का सौन्दर्य। ऋग्वेद के एक सूक्त 1⁄41.1241⁄2 में ऊषा की स्तुति पर सुन्दर काव्य रचना है। कहते हैं “ये ऊषा देवी नियम पालन करती हैं। नियमित रूप से आती हैं और मनुष्यों की आयु को लगातार कम करती हैं।” 1⁄4वही मन्त्र 21⁄2 फिर कहते हैं, “ऊषा स्वर्ग की कन्या जैसी प्रकाश के वस्त्र धारण करके प्रतिदिन पूरब से वैसे ही आती हैं जैसे विदुषी नारी ऋत-नियम मार्ग से ही चलती है।” 1⁄4वही, 31⁄2 यहां प्रकाश ही ऊषा का वस्त्र है।

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आगे कहते हैं, “जैसे भद्र नारियां सोए हुए परिजनों को जगाती हैं वैसे ही ऊषा भी सोतों को जगाने के लिए आई हैं।” 1⁄4वही 41⁄2 ऊषाकाल वैदिक समाज का जागरण काल है। ऊषा आनंदित करती हैं। वे देवी हैं, इसीलिए उनकी स्तुतियाँ है, “वे सबको प्रकाश आनंद देती हैं। अपने पराए का भेद नहीं करतीं, छोटे से दूर नहीं होती, बड़े का त्याग नहीं करती।” 1⁄4वही, 61⁄2 फिर कहते हैं, “ये ऊषा सूर्य रूपी पति से मिलने के लिए मुस्कराती हुई अपना सौन्दर्य प्रकट करती हैं।” 1⁄4वही, 71⁄2 ऊषा का सौन्दर्य अप्रतिम है, ऋषियों का भावबोध भी रसयुक्त है। कहते हैं, “जैसे छोटी बहिन बड़ी बहिन के लिए अपना स्थान छोड़ती है वैसे ही रात्रि रूपी छोटी बहिन बड़ी बहिन ऊषा के लिए अपने स्थान से हट जाती है।” 1⁄4वही, 81⁄2 ऊषा देवी बड़ी बहन है। रात्रि छोटी बहन है।

बड़ी बहन ऊषा आती है तो छोटी बहन रात्रि चली जाती है। लेकिन ऊषा समद्रष्टा हैं। भेदभाव नहीं करतीं लेकिन स्तोता उनसे भेदभाव की भी स्तुतियाँ भी करते हैं “हे ऊषा आप कृपण लोभी को न जगांए। श्रमशील कर्मठों को जगांए। आपके आते ही पक्षी घोसला छोड़ते हंै, मनुष्य प्रेरित होते हैं। आप यज्ञकर्मी श्रमशील/दानदाताओं को धन दें। 1⁄4वही 10, 121⁄2 ऋग्वेद में जागरण की महत्ता है इसलिए “सम्पूर्ण प्राणियों में सर्वप्रथम ऊषा ही जागती हंै।” 1⁄41.123.21⁄2 फिर उन्हें भग और वरण की बहिन बताते हैं और सभी देवों में प्रथम स्तुति योग्य – सूनृते प्रथम जरस्व”। 1⁄4वही, 51⁄2 ऊषा सतत् प्रवाह है। आती हैं, जाती हैं फिर फिर आती हैं। जैसी आज आई हैं, वैसे ही आगे भी आएंगी और सूर्य देव के पहले आएगी।”

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1⁄4वही, 81⁄2 ऊषा ऋग्वैदिक कवियों का सम्मोहन हैं “वे माता द्वारा सजाई गई युवती की तरह आती है।” 1⁄4वही 111⁄2
ऋग्वेद की ऊषा, सूर्य और सविता देव ऋषियों के गहन भावबोध और दिव्य दर्शन के देव हैं। सविता-सूर्य पृथ्वी के पोषक हैं। सविता सभी जीवों का प्राण है। प्रश्नोपनिषद् 1⁄41.51⁄2 में कहते हैं – आदित्यों ह वै प्राणौ। छान्दोग्य उपनिषद् में 1⁄41.3.11⁄2 कहते हैं “जैसे मनुष्यों में प्राण उद्गीथ है वैसे ही ब्रह्माण्ड में सूर्य हैं।” ऋग्वेद 10वे मण्डल के एक सूक्त 1⁄4361⁄2 के देवता है ‘विश्वेदेवा’। यहां ऋषि अपने यज्ञ में ऊषा, रात्रि, द्यावा, पृथ्वी, वरूण, मित्रगांव, अर्यमा, इन्द्र, मरूत, पर्वत, जल, आदित्यगण, अंतरिक्ष और देव लोक को निमंत्रण देते हैं। 1⁄4वही, 11⁄2 फिर अदिति से पाप कर्म बचाने की स्तुति है, सोम से शत्रुनाश की। अश्विनी कुमारों से कल्याण व, मरूतों से समृद्धि की कामना है।

फिर सविता देव है। ऋषि उनकी आज्ञा के अनुगत हैं। 1⁄4वही 2-111⁄2 सूक्त की अंतिम ऋचा 1⁄4मन्त्र1⁄2 में 1⁄4वही 141⁄2 “सब तरफ सविता ही सविता है “सविता पश्चातात्सविता, पुस्तात्सवितोत्तरत्सविता धरात्तात। सविता न सुवतु सर्वतांति सविता नो दासंतर दीर्घमायुः – सविता पीछे, सविता सामने, सविता ऊपर सविता नीचे। ये सविता हमें सुख समृद्धि दे, दीर्घायु दें। इस मंत्र में सविता की ही सर्वत्र उपस्थिति है। यह ऋग्वेद के ‘एक सत्य’ की स्थापना है।