“समाज और राष्ट्र की बेहतरी के लिए ही करोड़ों में तैनात हैं संघ के स्वयंसेवक”

विगत कुछ दिनों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर आम चर्चा है उस पर एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में देश के पूर्व मुख्यन्यायधीश जो की समाज के दलित वर्ग से आते हैं उनके द्वारा कार्यक्रम में सामाजिक न्याय के विषय को उठाना।

Written by: October 21, 2019 5:58 pm

विगत कुछ दिनों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर आम चर्चा है उस पर एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में देश के पूर्व मुख्यन्यायाधीश जो की समाज के दलित वर्ग से आते हैं उनके द्वारा कार्यक्रम में सामाजिक न्याय के विषय को उठाना। वही समय-समय के अपने उद्बोधनों में पूज्य सर संघचालक मोहन राव भागवत द्वारा सामाजिक समरसता तत्व की बार- बार चर्चा करना। ये सब समाज में कहीं कोतूहल जरूर पैदा करता हैं।

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लोगों के मन में संघ को जानने की तीव्र इच्छा भी पैदा करता है। उनके मन में उपयुक्त प्रश्न जरूर आते हैं की संघ की समाज दृष्टि क्या हैं ? उसकी अनुसूचित जाति-जनजाति को लेकर सोच क्या हैं ? आरक्षण जैसे विषय पर संघ की क्या समझ है? ये लेख कुछ इन्हीं प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना महराष्ट्र में स्वतंत्रता सेनानी डॉ केशवराव बलिराम हेडगेवार के द्वारा की जाती, संघ का हेतु एक है। समाज में देश भक्त नागरिकों का निर्माण करना मेरी चिंता के साथ अपने पड़ोसी की, समाज की ,राष्ट्र और विश्व की चिंता करना यही संघ की दृष्टि है। यही हिंदू दृष्टि भी है। ये ही विचार इस भारत का भी मूल विचार भी हैं, परंतु विगत वर्षों कि विदेशी राष्ट्रों के अधीनता ने भारत के मानस से इस भाव को प्रायः समाप्त ही कर दिया इसी को पुनः जागृत करना ही तो अपना ध्येय है। इसलिए संघ के लाखों, करोड़ों स्वयंसेवक कार्यकर्ता दुनिया भर में समाज और राष्ट्र के बेहतरी के लिए अनवरत कार्यों में लगे हैं।

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परस्पर सहयोग और प्रेम का भाव ही तो हिंदुत्व का दर्शन है। इसी के भीतर समरसता का तत्व अंतर निहित हैं  ये समरसता ही ये बताती है की मैं और तुम भिन्न नहीं हम एक हैं। इसी एकात्म तत्व का जागरण कर समाज को संगठित करना इसी कार्य को लगभग 90 वर्षों से संघ करता आ रहा है। ये एकात्म भाव के इस भारत का भाव है इसकी कमी का ही परिणाम था की भारत वर्षों तक विदेशी अक्रांताओं के अधीन रहा,संघ के संस्थापक डॉ हेडगेवार जानते थे की भारत एक ना एक दिन ज़रूर आज़ाद हो जाएगा परंतु यादि भारत की इस मानव शक्ति को वैचारिक एकत्व , देशिक विचार से ना जोड़ा गया तो क्या तय भारत पुनः ग़ुलामी की और चला जाए। इसलिए संघ की शाखा में जाने वाला प्रत्येक स्वयंसेवक केवल एक पहचान को लेकर साथ-साथ काम करता वो हैं हिंदू पहचान।

जब 1934 में महात्मा गांधी वर्धा में संघ के शिविर में गए तो उन्होंने ये जानने की कोशिश की कि यहां साथ रहने वाले स्वयंसेवक कार्यकर्ताओं की क्या जाति है। गांधी ने एक स्वयंसेवक से पूछ आप क्या हैं? उसने उत्तर दिया हिंदू , इस प्रकार कई कार्यकर्ताओं से पूछने पर भी समान उत्तर मिला तो गांधी जी ने पूछा आपकी जाति क्या है ? तब ज्ञात हुआ की तमाम स्वयंसेवक साथ-साथ भोजन करते हैं साथ-साथ रहते हैं परंतु उनमें काफ़ी स्वयंसेवक तो समाज के अश्प्र्श्य वर्ग से सम्बंधित हैं इसलिए 1938 में डॉ अम्बेडकर भी संघ के शिविर में जाते हैं और अपने जीवन काल में संघ को लेकर अम्बेडकर ने कभी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी बल्कि संघ के प्रचारक दत्तोपंत ठेंगडी जी से उनको बहुत स्नेह रहा।  वो अम्बेडकर के चुनाव के एजेंट भी बने। संघ ने हमेशा से जाति और वर्ण आधारित समाज व्यवस्था को नकार दिया।

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उसको कभी भारतीय दर्शन का मूल विचार नहीं माना अगर संघ इस बात को कहता हैं तो इसके समर्थन में कुछ तर्क भी दिये जा सकते हैं ये तर्क हमे उन्ही वेदिक, उपनिषदों मे ही मिलते हैं। कंठकौपनिषद कहता हैं,एक स्वथा सर्वभुतान्तारात्मा (समस्त प्राणियों की अंतरत्मा में एक ही परमब्रह्म हैं, जो सभी प्राणियों मे विराजमान हैं) जब ईश्वर एक हैं तो सभी मे एक ही आत्मा हैं वो दलित , शूद्र , अवर्ण -स्वर्ण सभी मे एक हैं , ये ही भारत का चिंतन हैं, संघ और भारत का दर्शन भिन्न नहीं एक ही हैं । संघ ने तमाम बार जाति और उसके द्वारा किए गए उत्पीड़न का विरोध किया है। डॉ हेड्गेवार ने तो पहले ही जाति नाम की संस्था की अंत की बात की और गुरु गोलवलकर ने भी ऐसी व्यवस्था को नष्ट होने की बात की, इसलिए संघ की शाखा पर किसी भी प्रकार के भेद को अस्वीकार कर दिया जाता है सभी स्वयंसेवक एक रस होकर देश और समाज के हित में चिंतन करते हैं। अपने व्यक्तिगत जीवन में सामाजिक रूप से अस्पर्यशता को डॉ हेडगेवार ने नकारा है, वे पुना के न्यू इंग्लिश हाईस्कूल मे अश्प्र्श्यो के साथ सहभोज के आयोजकों में से एक थे।

23 अक्टूबर 1932 को इसी स्कूल के छात्रों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा की साहसपूर्ण ढंग से अस्प्र्श्यता का मुकाबला करें। संघ के तृतीय सर-संघचालक बाला साहब देवरस ने संघ के विभिन्न शिविरों में अपने वक्तव्यों में इस बात को कहा कि ‘‘संघ वर्ण व्यवस्था को नहीं मानता किसी भी ऊंच-नीच और असमानता को नहीं मानता, मनुस्मृति में असमानता है तो हम इसको नहीं मानते आरक्षण का हम समर्थन करते हैं। आरक्षण के समर्थन में संघ की सोचा है की सदियों से शोषित पीड़ित ,दलित और फलस्वरूप पिछड़ी अवस्था में रहने वाले समाज को शेष समाज की बराबरी की सुविधाएं एवं संरक्षण देना उचित ही है और वैसे करते समय कोई वर्ग शिकायत करते हैं तो वह सामाजिक एकात्मकता के अभाव का ही लक्षण माना जाएगा।

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संघ ने खुले शब्दों में आरक्षण का समर्थन किया 2014 मे संघ के सरसंघचालक पूजनीय मोहन भगवत जी ने दिल्ली में डॉ विजय सोनकर शास्त्री द्वरा लिखित पुस्तक विमोचन कार्यक्रम मे कहा “ आरक्षण 100 सालों तक अभी बना रहना चाहिए और आगे भी जरूरत हुई तो जारी रहे समाज एकात्म सूत्र मे बन्ध रहा है “ ये पंक्तीय आज की प्रस्थतियों मे और महत्व रखती हैं । जबकि संघ को लेकर अनर्गल बातें समाज में चलती रहती है।

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संघ ने सदैव समरस समाज की बात की और समरसता के विचार को माना संघ मानता है समरसता “ स्वतन्त्रता, समानता, बंधुत्व तीनों को व्यक्ति अपने आचरण में यही समरसता है “ सामाजिक समरसता बाबा साहब अम्बेडकर के विचारों का असल अर्थों में अनुपालन करना है। अम्बेडकर ने तीन मानव मूल्यों की बात की स्वतन्त्रता , समानता , बंधुत्व ये तीनों तत्व समाज विकास के लिए अनिवार्य है। लेकिन अम्बेडकर बंधुता को समाज मे लागू होने को सबसे ज्यादा महत्व देते हैं। जब व्यक्ति का व्यक्ति के साथ प्रेम हो उसके दुख में वो दुखी हो और सुख में खुद भी परम आनंद को महसूस करें ये बंधुत्व का भाव है। जिसे कभी क़ानून से नहीं लागू किया जा सकता ये तो पूर्णत: व्यक्ति पर निर्भर है। संघ वर्षों इसी तत्व को व्यक्ति के मन में जागृत करने का कार्य कर रहा हैं। सामाजिक समरसता ये आत्मीयता का भाव पैदा करने का ही काम करता हैं।

इस लेख के लेखक- (डॉ प्रवेश कुमार सहायक प्रोफेसर, तुलनात्मक राजनीति और राजनीतिक सिद्धांत का केंद्र, स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय दिल्ली) हैं।