वह विदेशी महिला जिसने पूरा जीवन भारत को किया अर्पित, महिला शिक्षा को दिया भरपूर बढ़ावा

पाश्चत्य जगत की भोगवादी चमक-धमक को छोड़कर स्वामी विवेकानंद का शिष्यत्व ग्रहण करने को आतुर आयरिश युवती मार्गरेट भारत की ही हो गयी I वेदांत को सीखा,अपनाया और जीया भी I जिन तेजस्वी गुरु स्वामी विवेकानंद के आकर्षक व्यक्तित्व और सदाचार से प्रभावित होकर मातृभूमि छोड़ी थी।

Written by: October 24, 2019 5:31 pm

पाश्चत्य जगत की भोगवादी चमक-धमक को छोड़कर स्वामी विवेकानंद का शिष्यत्व ग्रहण करने को आतुर आयरिश युवती मार्गरेट भारत की ही हो गयी। वेदांत को सीखा,अपनाया और जीया भी । जिन तेजस्वी गुरु स्वामी विवेकानंद के आकर्षक व्यक्तित्व और सदाचार से प्रभावित होकर मातृभूमि छोड़ी थी। उन्हीं के द्वारा दिए ज्ञान ने भारत को कर्मभूमि बनाकर एक शिक्षिका और लेखिका मार्गरेट से अलग एक श्रेष्ठ आध्यात्मिक व सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भगिनी निवेदिता नाम से ख्याति प्राप्त की

भगिनी निवेदिता ने  बंगाल में निरक्षरता के अँधेरे को मिटाकर विशेष रूप से महिला शिक्षा को भरपूर बढ़ावा दिया, प्लेग पीड़ितों की सेवा की और बाढ़ प्रभावितों की सेवा कर आजीवन  अटल रहकर समर्पण भाव से जनता की सेवा कीI

विश्व में भारतीय संस्कृति व अध्यात्म का ध्वजा लहराने वाले  स्वामी विवेकानन्द की शिष्या मार्गरेट नोबल का जन्म  28 अक्टूबर,1867को  आयरलैंड में हुआ। उनके पिता सैमुअल नोबल एक पादरी थे। माँ मैरी हैमिल्टन एक सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षिका व लेखिका थीं।  1884में शिक्षा पूरी करने के बाद मार्गरेट  के सिंक के एक स्थानीय स्कूल में बतौर  शिक्षिका पढ़ाने लगी।

1895 में  मार्गरेट की सहेली ने एक भारतीय साधु से मुलाकात करवाने के लिए मार्गरेट को आमंत्रित किया। मार्गरेट को अपने गुरु के रूप में स्वामी जी मिले और वह उनके अलौकिक व्यक्तित्व और विचारों से बहुत प्रभावित हुईं,स्वामीजी को भी समाजसेवा के लिए प्रतिबद्ध इस निश्छल साध्वी में भारत की मातृशक्ति को जागृत करने का जज्बा दिखाई दिया I

28 जनवरी 1895 को मार्गरेट जन्मभूमि छोड़ हमेशा के लिए भारत आ गयी | भारत आने पर कलकत्ता में उनके स्वागत के लिए स्वयं स्वामीजी उपस्थित थे। मार्गरेट ने भारत आने पर यह मान लिया था कि अब यहीं उनकी कर्मभूमि है और सेवाकार्य परम लक्ष्य |

 मार्गरेट बनीं निवेदिता

25 मार्च 1898 को भगवान शिव की विद्धिवत पूजा के बाद स्वामीजी ने आशीर्वाद दिया और मार्गरेट का नाम बदलकर निवेदिता रख दिया।

निवेदिता का अर्थ- समर्पित और बाद में वह पूरे देश में इसी नाम से विख्यात हुईं। दीक्षा प्राप्त करने के बाद निवेदिता कोलकाता के बागबाज़ार में बस गईं। यहाँ पर उन्होंने लड़कियों के लिए एक विद्यालय शुरू किया। जहाँ पर वो लड़कियों के माता-पिता को उन्हें पढ़ने भेजने के लिए प्रेरित करती थी। निवेदिता स्कूल का उद्घाटन स्वामी रामकृष्ण परमहंस की पत्नी मां शारदा ने किया था। निवेदिता को पता था बाल विवाह और सती प्रथा जैसी कुरीतियों को खत्म करने के लिए लड़कियों को शिक्षित करना बहुत जरुरी है धीरे-धीरे निवेदिता की लोकप्रियता लोगों के बीच बढती गयी और उनको “सिस्टर निवेदिता” के नाम से लोग पुकारने लगे।

1899 में कलकत्ता में प्लेग की भयंकर बीमारी फैल गयी ऐसे समय में भगिनी निवेदिता ने घर-घर जाकर पीड़ितों की बीमारी के प्रति लोगों को जागरूक किया और स्वच्छता अभियान चलाया। भगिनी निवेदिता भारत को भारतीयों से भी ज्यादा प्यार करती थी। कन्याओं की शिक्षा पर जोर देने को लेकर विद्यालय के लिए धन जुटाने के लिए वह 2 साल के लिए विदेश चली गयीं दो साल में उन्होंने धन तो जुटाया ही, वहां पादरियों द्वारा हिन्दू धर्म के विरुद्ध किये जा रहे झूठे प्रचार का भी मुँहतोड़ उत्तर दिया। निवेदिता भारत के इतिहास , उसके धर्म तथा सभ्यता व संस्कृति से भलीभांति जानती थी।

भारतीय संस्कृति का सही चित्रण करने के लिए भगिनी निवेदिता ने अमेरिका के कई शहरों में बड़ी-बड़ी जनसभाएं संबोधित कीं…

भगिनी निवेदिता ने भारतीय  स्वतंत्रता संग्राम में भी प्रभावी  भूमिका निभाई। निवेदिता को स्पष्ट अनुभव हो चुका था कि ब्रिटिश शासन के अंत के बिना भारतीय एक आदर्श मानवीय जीवन नहीं जी सकते। उसने देखा की अंग्रेज़ किस तरह भारतीयों का शोषण कर रही है। वो महिला जो खुद स्वयं अंग्रेज थी ,भारत में गौरों के अत्याचारों को देख उनके विरुद्ध विचार, वाणी तथा कर्म से संघर्षरत हो गयी। इस संघर्ष में उसने सबसे बड़े हथियार बनाए अपनी सशक्त वाणी और प्रभावशाली लेखनी।

निवेदिता ने स्वतंत्रता की अलख जागने के लिए विद्यालय को राष्ट्रीयता का केंद्र बना लिया बंकिमचन्द्र का गीत “वन्देमातरम” जो आजादी की लड़ाई का मुख्य मन्त्र था वह पाठशाला का प्रार्थना गीत बन गया।

निवेदिता के लिए वो बड़ा कठिन समय रहा जब खुद की तबियत खराब होने पर 1905 में में अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया । देश भर में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आन्दोलन छिड़ गया और बिना डरे निवेदिता इस आन्दोलन में कूद पड़ी । दूसरे वर्ष पूर्वी बंगाल में भयंकर आयी ऐसी स्थिति में निवेदिता मीलों पैदल चलकर गाँव-गाँव जाकर पीड़ितों की मदद करने लगीं।  इस बीच उनका खुद का स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया।

अपने अंतिम समय में उनके पास जितनी भी संपत्ति , नकद राशि तथा अपनी लेखन से मिले धन को बैलूर मठ को समर्पित कर दिया उनकी आखिरी यहीं इच्छा थी कि इस धन का प्रयोग भारत की महिलाओं को राष्ट्रीयता की शिक्षा दी जाए।

13 अक्टूबर 1911 भारत की बेटी भारत में बालिका शिक्षा,अध्यात्म, देशप्रेम और समाजसेवा का अलख जगाने वाली स्वामी विवेकानंद जी की सुयोग्य व गुणी शिष्या का देहांत हो गया। आज भी उनकी समाधि पर लिखा है – यहाँ भगिनी निवेदिता चिरनिद्रा में सो रही हैं, जिन्होंने भारत के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।

 

लवी चौधरी, लेखिका विचार विनिमय न्यास नामक थिंक टैंक से संबद्ध हैं