ऋग्वेद से लेकर यूनानी दर्शन तक बोलने का अभिप्राय, गायें खूब बोलती हैं और बारिश में झींगुर भी

सभी प्राणी बोलते है। अनेक पक्षी साथ-साथ बोलें तो कलरव। बोली अच्छी लगे तो कहते हैं कि पक्षी गीत गा रहे हैं। कोयल को बहुधा गायक कहा जाता है। सही बात कोयल ही जानती होगी कि वह गा रही है या किसी परिस्थितिवश बड़बड़ा रही है। कौवे खूब बोलते हैं। हम उनके प्रवचन को ‘‘कांव कांव’’ कहते हैं। मेढक भी बोलते हैं।

नई दिल्ली। सभी प्राणी बोलते है। अनेक पक्षी साथ-साथ बोलें तो कलरव। बोली अच्छी लगे तो कहते हैं कि पक्षी गीत गा रहे हैं। कोयल को बहुधा गायक कहा जाता है। सही बात कोयल ही जानती होगी कि वह गा रही है या किसी परिस्थितिवश बड़बड़ा रही है। कौवे खूब बोलते हैं। हम उनके प्रवचन को ‘‘कांव कांव’’ कहते हैं। मेढक भी बोलते हैं। ऋग्वेद में एक पूरा सूक्त मण्डूक पर है ऋषि उनके बोलने को कविता बताते हैं। यू0पी0 में सई नदी के किनारे हमारा गॉव है। जंगल में पक्षी, सियार, मोर, बिल्ली, नेवले आदि की बोलियॉं हमने लम्बे समय तक सुनी हैं।

प्रकृति विज्ञानी डारविन ने बोली के विकास में काम भाव की भूमिका को महत्व दिया है। गायें खूब बोलती हैं। छान्दोग्य उपनिषद के पात्र गायों से बाते करते थे। इसी उपनिषद के अनुसार राजा जानश्रुति ने आकाशचारी हंसों की बातें सुनी थी। वर्षा ऋतु में झींगुर बिना थके लगातार पूरी रात बोलते है। कुत्ते खूब बोलते हैं। अर्थ वे ही जानते होंगे लेकिन हम लोग उसे भौकंना कहते हैं। भ्रमर गाते हैं। चींटी आदि छोटे जीव भी बोलते होंगे। बोलते सब हैं। हम मनुष्य सबसे ज्यादा बोलते हैं। बातें पदार्थ होती। वे ट्रक जैसे वाहन में भरी जा सकती। इस सामान्य गणित में हम सब दिनभर दो-तीन ट्रक बोलते हैं।

मनुष्य बोलने के साथ लिखते भी हैं। बोलना जीवंत सम्बोधन होता है। श्रोता सामने होते हैं। वक्ता श्रोता में सीधा संबंध होता है। लिखने में श्रोता सामने नही होते। मैं यह आलेख लिख रहा हॅूं। पाठक मेरे सामने नही हैं। मैं वाक्यों को सरल तरल करने का प्रयास करता हॅूं। लेकिन बोलने जैसा वक्ता श्रोता सम्बन्ध नहीं बनता। लेखक-पाठक सम्बन्ध अप्रत्यक्ष होते हैं। कुशल वक्ता बोलते समय श्रोता पर पड़ रहे प्रभाव देखता है। वह श्रोता की अपेक्षा और उपेक्षा पर ध्यान देता है। वह संबंध बढ़ाने के उपाय खोजता है। लेखक को यह सुविधा नहीं है। मेरे अपने अनुभव ऐसे ही हैं। मैंने हजारों कार्यक्रमों में भाषण दिए हैं। लेखक के रूप में लगभग 5 हजार आलेख छपे हैं। श्रोता सामने थे, पाठक दूर रहे है। पाठक भी लेखन पर टिप्पणी करते हैं लेकिन ऐसी प्रतिक्रिया लेखक तक कम पहुंचती है। लेखक अपने ही विवेचन में अपने लेखन के प्रति कभी तुष्ट या असंतुष्ट रहते हैं। लेखन में संशोधन की गुंजाइश रहती है। भाषण में संशोधन के अवसर नहीं होते। भाषण तात्कालिक स्मृति और अनुभूति की अभिव्यक्ति होते हैं।

ऋग्वेद में बोला गया है। सम्पूर्ण वैदिक वांग्डमय भी ऋषि कथन है। तब लिपि का आविष्कार नहीं हुआ था। बोलते समय संशोधन के अवसर नही होते। लिखने में संशोधन के अवसर होते हैं। आश्चर्य है कि वेद और प्राचीन उपनिषद् भी सम्पादित संशोधित से ज्यादा व्यवस्थित जान पड़ते हैं। लेकिन सम्पादित हैं नहीं। ऋग्वेद के तमाम सूक्तों में अनेक विषय मिले हुए हैं। इन्हें शिष्यों ने आचार्यो से सुना । उन्होंने इसी परम्परा को आगे बढ़ाया। वैदिक ज्ञान ‘‘श्रुति’’ कहा गया है। पुराण बाद के हैं। लेकिन इनमें भी श्रुति परंपरा का दर्शन है। पुराण ‘‘सूतोवाच’’-सूत ने कहा’’ से शुरू होते हैं। गीता में भी ‘‘धृतराष्ट्र ने पूछा, संजय ने कहा। अर्जुन ने पूछा – श्रीकृष्ण बोले’’ आदि वाक्य है। यूनानी दर्शन में प्लेटो का ‘‘डायलाग’’ विख्यात है। सुकरात बोलते थे, उनके पहले थेल्स भी। भारतीय प्राचीन साहित्य में संवाद की परंपरा है। महाभारत के तमाम प्रसंगों में ऊॅट, पक्षी, सांप आदि भी संवादरत हैं। नारद मजेदार पात्र हैं। वे ऋग्वेद से लेकर तुलसीदास की रामचरितमानस में भी उपस्थित हैं। वे दिलचस्प संवादी हैं। महाभारत में वे युधिष्ठिर से बाते करते हैं। युधिष्ठिर यक्ष प्रश्नों के उत्तर देते हैं। कोई कह सकता है कि महाभारत लिखी गई है। ऐसा सही हो सकता है लेकिन महाभारतकार भी संवादप्रिय है। उन्हें बोले गये प्रसंगों में रूचि है।

समाज का निरंतर विकास हुआ है। इसी निरंतरता में सांस्कृतिक तत्वों का भी विकास हुआ है। संस्कृति व सभ्यता के विकास में बोले गए वाक्यों की मुख्य भूमिका है। समाज में निरन्तर संवाद चलता है। यह संवाद जारी भी है। लिपि और छापे खाने के विकास के बाद लिखे शब्दों का प्रयोग बढ़ा।ं मैं लिखता हॅूं । लिखते समय मस्तिष्क में बोलने जैसी सोचने की गतिविधि चलती है। लेकिन लिखे गए को बार-बार संशोधित भी करता हॅूं। कोई भी सामाजिक व्यवस्था पूर्ण नहीं होती। समाज व्यवस्था में परिवर्तन करने वाले महानुभावों ने लगातार जनसंवाद किए है। गांधी जी ने लाखों सभाओं को सम्बोधित किया था। डा0 अम्बेडकर के भाषण, लेखन संकलन का नाम ‘‘बाबा साहब राईटिंग्स एण्ड स्पीचेज’’ है। डा0 लोहिया के भाषण आमजनों में लोकप्रिय थे।

deen dayal upadhyay

पं0 दीन दयाल उपाध्याय के भाषण प्रभावशाली थे। अटल जी के भाषणों में सम्मोहन था। संसद और विधान मण्डल वक्तव्यों के ही संवैधानिक मंच है। बोले गए शब्द सीधा प्रभाव पैदा करते हैं। वाक्य वाक् से बनते हैं और वाक् वाणी है। वाणी की शक्ति बड़ी है। सुंदरवाक् श्रोता के चित्त में हलचल पैदा करती है और तमाम धारणाओं का सृजन या विध्वंस करती है।

संस्कृत समृद्ध भाषा है और आनंदसर्जक बोली है। बोले गए सुंदर वचन को ‘‘सूक्त’’ कहते हैं। सूक्त सु-उक्त है। ऋग्वेद में सूक्त है। इसी तरह ऋषियों की बोली ‘‘सुवाच’’ है। मति बुद्धि है। सुंदर मति ‘‘सुमति’’ है। सुमति भी सुंदर ढंग से व्यक्त होकर सुवाच है। मधुर वचन श्रेयस्कर हैं। पूर्वज चाहते थे कि वाणी मधुरसा हो। वाणी का संयम सुखी समाज जीवन का आधार है। बोलना दिनचर्या का बड़ा भाग है। विज्ञान व दर्शन के तत्व बोलकर प्रकट किए गए।

20वीं सदी के लोकप्रिय वक्ता दर्शन शास्त्री ओशो रजनीश की लगभग 200 पुस्तकें हैं। सारी किताबें प्रवचन हैं। प्रवचन रिकार्ड किए गए। उन्हें सम्पादन के बाद पुस्तक का आकार दिया गया। बोलना स्वाभाविक है। वाणी संयम आवश्यक है। अपनी बोली को मधुमय बनाना सांस्कृतिक है। वाणी में अर्थ होता है। वाणी संयम टूटते ही अर्थ का अनर्थ हो जाता है। संयम प्रशंसनीय है लेकिन इसमें लगातार सतर्कता की जरूरत पड़ती है। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। स्वयं के भीतर शुभ के साथ अशुभ भी होता है, शब्द के साथ अपशब्द भी होते हैं। भीतर तमाम कूड़ा कचरा है, हीरा माणिक्य जैसे शब्द रत्न भी हैं।

वाक्सौन्दर्य का एक उपाय संयम है। वाक् संयम अर्थात शब्द-अनुशासन। अनुशासन और संयम प्राकृतिक नहीं है। यह सामाजिक विकास का अर्जन है। अर्जित संयम और अनुशासन कभी भी टूट सकते हैं इसलिए इन पर पूरा विश्वास करना उचित नहीं है। मेरे विचार में भीतर के शुभ शिव तत्व को लगातार संवर्द्धित करना ज्यादा उपयोगी है। घर में कूड़ा है तो दुर्गंध को संयम से नहीं रोका जा सकता। हमारा चित्त दो शब्दकोष रखता है। एक शब्दकोष में सुन्दर शब्द हैं, मधुरस भरे सगंधा शब्द पुष्प हैं। प्रेमरस से भरे पूरे प्रेम शब्द हैं। इस शब्दकोष में पूर्णिमा का शीतल स्पर्श है। आस्तिकता की आश्वस्ति है। यह शब्द कोष शिव समृद्ध है। भीतर एक दूसरा शब्दकोष भी है। दूसरे में अप्रिय विचार हैं, इस विचार के लिए अपशब्द है। मानहानि आक्रामकता और अपमान के लिए तमाम शब्द आयुध हैं। इनके प्रयोग से बचना संयम है। शिव संकल्प से भरे पूरे चित्त में दूसरे शब्द कोष के लिए स्थान नहीं होते । तब जो बोले सो आनंदवर्द्धन। भीतर कटुता नहीं होगी तो संयम की जरूरत नहीं पड़ती। हम सबकी बोली मधुमय हो । यही शुभकामना।