चमार रेजिमेंट, जिसने अंग्रेजों से बगावत कर लड़ी सबसे खूंखार जंग…

Written by संतोष सिंह पाल January 1, 2019 4:14 pm

नई दिल्ली। ब्रिटिश आर्मी और मराठा संघ के पेशवा शासकों के बीच 1818 में हुए भीमा-कोरेगांव युद्ध को दलित अपनी अस्मिता के साथ जोड़ते हैं, क्योंकि उस समय अछूत समझे जाने वाले महार समुदाय के लोग कंपनी की फौज में सैनिक थे। इस जंग में महारों ने अंग्रेजों की ओर से लड़ते हुए पेशवा की बड़ी सेना को हराया था। इसी जीत की 200वीं सालगिरह के दौरान पिछले साल पुणे के भीमा कोरेगांव में हिंसा हुई थी। महाराष्ट्र सुलग उठा था।

कम ही लोगों को ये पता है कि अंग्रेजों की सेना में एक चमार रेजिमेंट भी मौजूद थी। चमार रेजिमेंट और महार सैनिकों की भीमा-कोरेगांव की लड़ाई के बीच एक बड़ा फर्क यह है कि जहां महार अंग्रेजों की ओर से लड़ रहे थे, वहीं चमार रेजीमेंट ने आजाद हिंद फौज के लिए अंग्रेजों से विद्रोह कर दिया था।

अंग्रेजों ने चमार रेजीमेंट के लड़ाकों का इस्तेमाल सबसे शक्तिशाली मानी जाने वाली जापानी सेना से लड़ने के लिए किया था, लेकिन जब उन्होंने इन सैनिकों को आईएनए से लड़ने का आदेश दिया तो उन्होंने बगावत का रास्ता अपनाना बेहतर समझा।

शायद इसी वजह से दलित समाज के लोग इस रेजीमेंट की लंबे वक्त से बहाली की मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी आवाज कहीं दबकर रह जाती है। दलितों की बहादुरी का जो नमूना महारों ने 200 साल पहले दिखाया था, उसे चमार रेजीमेंट में भी देखा जा सकता था। चमार रेजीमेंट पर रिसर्च कर रहे सतनाम सिंह के मुताबिक दूसरे विश्वयुद्ध के समय अंग्रेज सरकार ने यह रेजीमेंट बनाई थी, जो 1943 से 1946 यानी सिर्फ तीन साल ही अस्‍तित्‍व में रही।

उस वक्त दुनिया की सबसे ताकतवर सेना जापान की मानी गई थी। जापान को हराने के लिए अंग्रेजों ने इसका इस्तेमाल किया। कोहिमा के मोर्चे पर इस रेजीमेंट ने सबसे बहादुरी से लड़ाई लड़ी. इसलिए इसे बैटल ऑफ कोहिमा अवार्ड से नवाजा गया था.”

चमार रेजिमेंट को क्‍यों खत्‍म किया गया

चूंकि अंग्रेजों ने इस रेजीमेंट को आजाद हिंद फौज से मुकाबला करने के लिए सिंगापुर भेजा। जब कैप्टन कुरील ने देखा कि अंग्रेज चमार रेजीमेंट के सैनिकों के हाथों अपने ही देशवासियों को मरवा रहे हैं। इसके बाद उन्‍होंने इसको आईएनए में शामिल कर अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध करने का निर्णय लिया. तब अंग्रेजों ने 1946 में इस पर प्रतिबंध लगा दिया।

क्या बहाल हो पाएगी यह रेजिमेंट

शांत प्रकाश जाटव के मुताबिक, आजादी के बाद से ही चमार रेजीमेंट बहाल किए जाने की आवाज कई बार उठाई गई, लेकिन आवाज दबकर रह गई. दलित इस रेजीमेंट को बहाल करने के लिए कई राज्‍यों में प्रदर्शन कर चुके हैं। अब इसके लिए कानूनी लड़ाई लड़ी जा रही है। इसे लेकर पिछले दिनों राष्‍ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने संज्ञान लिया था।

जाटव ने 2015 में तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर को लेटर लिखा था, जिस पर पर्रिकर ने कहा था कि ‘मामले की जांच करवा रहा हूं’। उन्होंने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को पत्र लिखकर मांग की है कि पाठ्य पुस्तकों में चमारों की गौरवगाथा को शामिल किया जाए।

जाटव के मुताबिक, जाटव के मुताबिक 30 दिसंबर 1943 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अंडमान निकोबार को अंग्रेजों से आजाद कराया था, इसमें चमार रेजीमेंट का भी सहयोग था। उनका कहना है कि इसके जिन सैनिकों को बागी घोषित कर अंग्रेजों ने 1943 में जेलों में बंद कर यातनाएं दीं उन सभी को सैनिक बोर्डों द्ववारा सूचीबद्ध करके स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा दिया जाए।

Facebook Comments