डॉलर के मुकाबले रुपए की गिरती सेहत को लेकर मोदी सरकार को घेरने वाले ये आंकड़े भी देख लें…

हाल ही के दिनों में डॉलर के मुकाबले रुपए में गिरावट में हर मंच से राजनीति का मुद्दा रहा। सरकार को घेरने के लिए विपक्षी पार्टियां इसे भी मुद्दा बनाने से बाज नहीं आईं। साल 2018 में अभी तक डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत ने 70 के आंकड़े को पार कर लिया। इसे अब तक की सबसे बड़ी गिरावट मानी गई। जिसको लेकर विपक्षी पार्टियां केंद्र की मोदी सरकार पर हमलावर हो गई और उनके हाथ बैठे बिठाए एक राजनीति मुद्दा लग गया। समय-समय पर विपक्षी दलों ने रुपये में गिरावट को लेकर सरकार को घेरना शुरू कर दिया। मगर सवाल ये उठता है कि क्या 70 सालों तक देश में शासन करने वाली कांग्रेस पार्टी के समय में डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमतों में गिरावट दर्ज नहीं की गई थी। क्या उस समय रुपया मजबूत स्तर पर हीं था। क्या तब डॉलर के मुकाबले रुपया बराबरी पर था या उससे मजबूत स्थिति में था। आप जब आंकड़ों को देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि आजादी के साल से लेकर अब तक लगातार डॉलर के मुकाबते रुपया कमजोर होता रहा और नौबत यहां तक आ पहुंची की डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत ने 70 के आंकड़े को पार कर लिया। ये चिंता का विषय तो है लेकिन इस पर राजनीति होने लगी। ऐसे में सवाल ये भी उठाता है कि क्या रुपए में गिरावट के लिए गैर-कांग्रेसी सरकारों को हीं केवल जिम्मेदार ठहराना उचित होगा?

अमेरिकी डॉलर के मुकाबले आज भारतीय रुपया जिस स्तर पर खड़ा है, उसे देखते हुए क्या कोई यकीन करेगा कि आजादी के समय रुपया और डॉलर बराबर थे? ऐसे में यह जानना भी जरूरी होगा कि आजादी के 70 सालों में रुपया 73 गुना कैसे गिर गया। आखिर इसकी वजह क्या रही। दूसरा सवाल यह भी कि क्या कांग्रेसनीत सरकारों के समय रुपए की कीमत हमेशा डॉलर से मुकाबले को तैयार थी और तीसरा और सबसे अहम सवाल क्या गैर कांग्रेसी सरकारों को हीं केवल डॉलर के मुकाबले रुपए की गिरती कीमतों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना उचित है।

Narendra Modi

इतिहास पर एक नजर डालें तो इससे सच्चाई सामने आ जाएगी। डॉलर के मुकाबले लगातार रुपए की कीमतों में गिरावट के लिए मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहराने वाली कांग्रेस की पोल भी खुद-ब-खुद खुल जाएगी। बता दें कि ऐसे बहुत से लोग हैं जो शायद ये भी नहीं जानते होंगे कि आज़ादी के वक्त 1 डॉलर की कीमत 1 रुपए के बराबर थी। लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ कि पिछले 70 सालों में रुपया लगातार गिरता चला गया।

Indian Coins Stack in form of bar graph with Indian Rupees

आइए आंकड़े के जरिए आपको समझाते हैं कि भारत के कौन-कौन से प्रधानमंत्री के कार्यकाल में डॉलर के सामने रुपये की क्या स्थिति थी। आजादी से पहले भारत की इकॉनमी पर ब्रिटिश राज का प्रभाव था। यही कारण था कि जब 1947 को देश आजाद हुआ उस समय भारत के रुपए की कीमत डॉलर के बराबर थी। 1947 में जवाहर लाल नेहरू की सरकार में एक डॉलर की कीमत 4.76 रुपये हो गई। यानी की डॉलर रुपये की तुलना में 376 फीसदी महंगा हो गया।

Dollar Chart

1964 में नेहरू की मृत्यु हो गई और उनकी जगह पर गुलजारी लाल नंदा ने प्रधानमंत्री का कार्यभार संभाला। वे दो साल तक प्रधानमंत्री के पद पर रहे तब तक (1966 में) डॉलर 7.50 रुपये का हो चुका था। आजादी के बाद से ही डॉलर हमेशा रुपये के मुकाबले मजबूत स्थिति में रहा है। इसके बाद लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने।

jawahar lal nehru

1967 में इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं तब डॉलर की कीमत 7.50 रुपये पहुंच चुकी थी। अगले तीन साल तक यही स्थिति रही। 1971 में रुपया एक पैसा मजबूत हुआ और डॉलर 7.49 पर आ गया। 1972 में डॉलर 7.59 पर पहुंच गया और अगले साल तक 7.74 का हो गया। 1976 में इंदिरा गांधी के पहले कार्यकाल के आखिरी साल में डॉलर 8.96 का हो चुका था। 1977 में मोरारजी देशाई प्रधानमंत्री बने तो अगले साल तक 8.13 तक आ चुका था। इसके बाद 1980 में जब इंदिरा का दूसरा कार्यकाल शुरू हुआ तो रुपया 7.86 पर था। अगले साल तक 8.66 पर पहुंच चुका था। 1984 तक इंदिरा प्रधानमंत्री रहीं तब तक डॉलर की कीमत दोहरे अंक में पहुंच चुकी थी और 11.36 तक पहुंच गया।

इंदिरा गांधी के बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने और 1985 में डॉलर की कीमत 11.37 पर थी। इसके बाद लगातार रुपये का अवमूल्यन होता रहा और 1989 तक 16.23 रुपये का एक डॉलर हो चुका था। राजीव गांधी के बाद राष्ट्रीय राजनीति में हलचल के बाद 1990 में वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने उस वक्त तक एक डॉलर 17.50 रुपये का हो चुका था। यानी आंकड़ों के मुताबिक डॉलर की कीमत 54 फीसदी तक बढ़ गई।

इसके बाद 1991 में पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने तब डॉलर की कीमत पहुंच चुकी थी 22.74 रुपया। 1996 तक वे प्रधानमंत्री रहे तब तक डॉलर की कीमत 35.43 रुपया हो चुकी थी। 1997 में एचडी देवगौड़ा की सरकार बनने के समय डॉलर 36.31 रुपये का था जो कि 1998 में इंद्र कुमार गुजराल के राज में 41.26 का हो गया। यानी इस दौरान डॉलर रुपए के मुकाबले और मजबूत हो गया। डॉलर में 81 फीसदी तक का इजाफा हो गया।

1999 में अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने उस समय डॉलर 43.06 रुपये का था। जो कि 2003 तक उनके कार्यकाल में 45.32 तक पहुंच गया। यानी डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत में 5 फीसदी का इजाफा हुआ। इतना नहीं वाजपेयी सरकार के दौरान डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमतों में सबसे कम बढ़ोतरी हुई।

Former prime minister Atal Bihari Vajpayee

इसके बाद 2004 में मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने उस वक्त डॉलर की कीमत 45.32 रुपया थी। जो कि उनके पहले कार्यकाल में 2009 तक 48.41 पहुंच चुकी थी। इसके बाद उनके दूसरे कार्यकाल में 2013 तक 56.57 रुपये तक पहुंच गई।

2014 में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने। उस वक्त 62.33 रुपये का एक डॉलर था। वहीं 2015 में डॉलर की कीमत 62.97 तक पहुंच गई। 2016 में रुपये में गिरावट आई और डॉलर की कीमत 66.46 रुपये हो गई। 2017 में डॉलर 67.79 तक पहुंच गया। 2018 में डॉलर 67.91 पर खुला जो कि सितंबर तक 73 रुपये तक पहुंच गया। यानी आंकड़े के हिसाब से देखें तो डॉलर के मुाकबले रुपए की कीमत में इन चार सालों में केवल 17 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई लेकिन विपक्ष के लिए मुद्दा मोदी सरकार के समय डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत में आई गिरावट बन गई।

जबकि आंकड़ों से साफ जाहिर होता है कि कांग्रेस के मुकाबले एनडीए सरकार के दौरान रुपया उतना कमजोर नहीं हुआ जितना कांग्रेसनीत सरकारों के समय में था। ऐसा नहीं है कि रुपए में लगातार गिरावट को देखते हुए मोदी सरकार ने बड़े कदम नहीं उठाए। समय-समय पर मोदी सरकार ने भारत की आर्थिक व्यवस्था को सुधारने के लिए एफडीआई के साथ-साथ कई अन्य आर्थिक सुधारों को आत्मसात किया ताकि भारत की आर्थिक स्थिति को और मजबूत किया जाए। इसी का नतीजा रहा कि लगातार गिरती रुपए की कीमत थोड़ी संभली और लगातार उसकी सेहत में सुधार जारी है।

मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों का ही नतीजा है कि जिसके कारण भारत की विश्व बैंक की ईज ऑफ डूइंग बिजनेस रैंकिंग में जबरदस्त उछाल मारी। विश्व बैंक की हालिया रिपोर्ट में 190 देशों की सूची में भारत 77वें स्थान पर आ गया है। दो साल पहले भारत 130वें पायदान पर था। वैश्विक रैंकिंग में यह सबसे ऊची छलांग थी। यह भी एक कारण रहा जिसकी वजह से डॉलर के मुकाबले रुपए की सेहत में सुधार होना शुरू हुआ है। हालांकि कच्चे तेल की दुनिया भर में बढ़ती कीमतों ने भी भारत के रुपए को कमजोर करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी लेकिन अब हालात थोड़े बदले हैं। उम्मीद है कि धीरे-धीरे रुपए की सेहत में और सुधार आएगा।

साल दर साल रुपए की कमजोर होती सेहत का इतिहास

1947

भारत को 15 अगस्त 1947 को जब आजादी मिली तो अमेरिकी डॉलर और भारतीय रुपये के बीच एक्सचेंज रेट बराबर था। यानी एक डॉलर एक रुपये के बराबर था। दरअसल देश नया नया आजाद हुआ था और उस पर कोई बाहरी कर्ज नहीं था।

1948

अंग्रेजों के भारत से जाने के बाद देश की आर्थिक हालत खस्ता थी। गरीबी से निपटने के साथ साथ देश के पुनर्निर्माण की चुनौती थी। यहीं से भारतीय रुपये के कमजोर होने का सिलसिला शुरु हुआ। फिर भी 1948 में एक डॉलर की कीमत चार रुपये से भी कम थी।

1951

देश के विकास की खातिर 1951 में पहली पंचवर्षीय योजना तैयार की गई, जिसके लिए सरकार ने विदेशों से कर्ज लेना शुरू किया। भारत ने आजादी के समय फिक्स्ड रेट करंसी व्यवस्था को चुना। इसीलिए लंबे समय तक रुपया डॉलर के मुकाबले 4.79 रहा।

1966

चीन के साथ 1962 में और पाकिस्तान के साथ 1965 की लड़ाई के कारण भारत को बड़ा बजट घाटा उठाना पड़ा। इसके अलावा उन दिनों पड़े सूखे से महंगाई बहुत बढ़ गई थी। ऐसे में, सरकार को 1966 में डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत को घटाकर 7.57 करना पड़ा।

1971

भारतीय रुपये को 1971 में सीधे अमेरिकी डॉलर से जोड़ दिया गया जबकि अब तक वह ब्रिटिश पाउंड के साथ जुड़ा था। इस दौरान राजनीतिक अस्थिरता, घोटालों के कारण सुस्त पड़ी अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय कारणों से भारत का व्यापार घाटा बढ़ता गया।

1975

भारतीय रुपये को लेकर 1975 में बड़ा कदम उठाया गया। उसे दुनिया की तीन मुद्राओं के साथ जोड़ा गया, जिसमें अमेरिकी डॉलर के अलावा जापानी येन और जर्मन डॉएच मार्क शामिल थे। इस दौरान एक अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की कीमत 8.39 थी।

1985

1985 आते-आते भारतीय रुपया में उस समय तक की रिकॉर्ड गिरावट दर्ज की गई और डॉलर के मुकाबले उसका दाम 12.34 जा पहुंचा। सियासी उथल पुथल और तंग आर्थिक हालात के बीच भारतीय रुपया कमजोर हो रहा था।

1991

खाड़ी युद्ध और सोवियत संघ के विघटन के कारण भारत बड़े आर्थिक संकट में घिर गया और अपनी देनदारियां चुकाना उसके लिए मुश्किल हो गया। विदेशी मुद्रा भंडार में सिर्फ 11 करोड़ डॉलर बचे, जिससे सिर्फ तीन हफ्ते का आयात हो सकता था। ऐसे में रुपया प्रति डॉलर 26 को छूने लगा।

1993

अब भारतीय मुद्रा में उतार चढ़ाव बाजार से तय होने लगा। हालांकि ज्यादा उथल पुथल की स्थिति में रिजर्व बैंक को हस्तेक्षप करने का अधिकार दिया गया। 1993 में एक अमेरिकी डॉलर खरीदने के लिए 31.37 रुपये देने पड़ते थे।

2002-2003

1993 के बाद लगभग एक दशक तक रुपये के मूल्य में सालाना औसतन पांच प्रतिशत की गिरावट आती रही। इसी का नतीजा रहा कि 2002-03 में भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले गिर कर 48.40 के स्तर पर पहुंच गया।

2007

भारत में नई ऊंचाइयों को छूते शेयर बाजार और फलते फूलते आईटी और बीपीओ सेक्टर की वजह से भारत में बड़ा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आने लगा। इसी का नतीजा था कि 2007 में भारतीय रुपये ने डॉलर के मुकाबले 39 के स्तर को छुआ।

2008

2008 के वैश्विक आर्थिक संकट ने अमेरिका और दुनिया की अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका दिया है। इसके चलते डॉलर के मुकाबले रुपये के मूल्य में भी कुछ ठहराव आया। लेकिन साल 2008 खत्म होते रुपया गिरावट का नया रिकॉर्ड बनाते हुए 51 के स्तर पर जा पहुंचा।

2012

यह वह समय था जब ग्रीस और स्पेन गंभीर आर्थिक संकट में घिरे थे। एक नई मंदी की आशंकाओं के बीच भारत की अर्थव्यवस्था पर भी इसका कुछ असर दिखने लगा। नतीजतन रुपया और गिर गया और डॉलर के मुकाबले उसकी कीमत 56 तक जा पहुंची।

2013

भारतीय रुपये ने अगस्त 2013 में रिकॉर्ड गिरावट देखी और एक अमेरिकी डॉलर 61.80 रुपये के बराबर हो गया। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विपक्ष ने रुपये के मूल्य में गिरावट के लिए यूपीए सरकार की आर्थिक नीतियों को जिम्मेदार ठहराया जबकि सरकार बाहरी कारणों का हवाला देती रही।

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