कई राज्यों के लिए नियुक्त किए गए नए राज्यपाल, आरिफ मोहम्मद खान को केरल की कमान

केंद्र सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान को केरल का राज्यपाल बनाया गया है। इसके साथ ही हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल कलराज मिश्रा का ट्रांसफर राजस्थान कर दिया गया है।

Written by: September 1, 2019 12:31 pm

नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान को केरल का राज्यपाल बनाया गया है। इसके साथ ही हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल कलराज मिश्रा का ट्रांसफर राजस्थान कर दिया गया है। मिश्रा की जगह पर पूर्व केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय को हिमाचल प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया है। इनके अलावा उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी को महाराष्ट्र का राज्यपाल नियुक्त किया गया है, जबकि तमिलिसाई सौंदराजन को तेलंगाना के राजभवन में भेजा गया है।

आरिफ मोहम्मद खान ने हाल ही में ट्रिपल तलाक जैसे अहम मसले पर सरकार के रुख का समर्थन किया था। उन्हें एक प्रगतिशील मुस्लिम चेहरे के तौर पर जाना जाता है। आपको बता दें कि आरिफ राजीव गांधी की सरकार में भी केंद्रीय मंत्री थे, लेकिन 1984 में शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट को संसद द्वारा कानून बनाकर पलटे जाने के विरोध में उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। वह कुछ समय तक भारतीय जनता पार्टी में भी रहे थे। हालांकि कुछ सालों से उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली थी।

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में 1951 में जन्मे आरिफ मोहम्मद खान का परिवार बाराबस्ती से ताल्लुक रखता है। बुलंदशहर ज़िले में 12 गांवों को मिलाकर बने इस इलाके में शुरुआती जीवन बिताने के बाद खान ने दिल्ली के जामिया मिलिया स्कूल से पढ़ाई की। उसके बाद अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और लखनऊ के शिया कॉलेज से उच्च शिक्षा हासिल की।

छात्र जीवन से ही खान राजनीति से जुड़ गए। भारतीय क्रांति दल नाम की स्थानीय पार्टी के टिकट पर पहली बार खान ने बुलंदशहर की सियाना सीट से विधानसभा चुनाव लड़ा था, लेकिन हार गए थे। फिर 26 साल की उम्र में 1977 में खान पहली बार विधायक चुने गए थे।

विधायक बनने के बाद खान ने कांग्रेस पार्टी की सदस्यता ली और 1980 में कानपुर से और 1984 में बहराइच से लोकसभा चुनाव जीतकर सांसद बने। इसी दशक में शाह बानो केस चल रहा था और खान मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के ज़बरदस्त समर्थन में मुसलमानों की प्रगतिशीलता की वकालत कर रहे थे, लेकिन राजनीति और मुस्लिम समाज का एक बड़ा वर्ग इन विचारों के विरोध में दिख रहा था। 1986 में शाहबानो मामले में राजीव गांधी और कांग्रेस के स्टैंड से नाराज़ होकर खान ने पार्टी और अपना मंत्री पद छोड़ दिया।

इसके बाद खान ने जनता दल का दामन थामा और 1989 में वो फिर सांसद चुने गए। जनता दल के शासनकाल में खान ने नागरिक उड्डयन मंत्री के रूप में काम किया, लेकिन बाद में उन्होंने जनता दल छोड़कर बहुजन समाज पार्टी का दामन थामा। बसपा के टिकट से 1998 में वो फिर चुनाव जीतकर संसद पहुंचे थे। फिर 2004 में, खान ने भारतीय जनता पार्टी जॉइन की। भाजपा के टिकट पर कैसरगंज सीट से चुनाव लड़ा लेकिन हार गए। फिर 2007 में उन्होंने भाजपा को भी छोड़ दिया क्योंकि पार्टी में उन्हें अपेक्षित तवज्जो नहीं दी जा रही थी। बाद में, 2014 में बनी भाजपा की केंद्र सरकार के साथ उन्होंने बातचीत कर तीन तलाक के खिलाफ कानून बनाए जाने की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाई।