नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर 2003 में दिए गए मनमोहन सिंह के बयान से ही असहज महसूस कर रही है कांग्रेस!

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इस मांग को 2003 में तब विपक्ष के नेता मनमोहन सिंह ने राज्यसभा में उठाया था। वही कांग्रेस जो अभी सरकार के द्वारा लाए इस बिल का विरोध कर रही है वह अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय संसद में खड़े होकर इस बात के लिए सरकार को तैयार करने के लिए दवाब बनाने की कोशिश कर रही थी।

Avatar Written by: December 5, 2019 1:21 pm

नई दिल्ली। क्या आप जानते हैं कि नागरिकता अधिनियम में बदलाव की मांग किसने की और कहा कि बांग्लादेश में रह रहे अल्पसंख्यकों को नागरिकता देना हमारा नैतिक दायित्व है, जो वहां उत्पीड़न का सामना करते हैं? आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इस मांग को 2003 में तब विपक्ष के नेता मनमोहन सिंह ने राज्यसभा में उठाया था। वही कांग्रेस जो अभी सरकार के द्वारा लाए इस बिल का विरोध कर रही है वह अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय संसद में खड़े होकर इस बात के लिए सरकार को तैयार करने के लिए दवाब बनाने की कोशिश कर रही थी।

Manmohan Singh

दिसंबर 2003 में राज्यसभा में विपक्ष के तत्कालीन नेता मनमोहन सिंह द्वारा मांग उठाई गई थी। बांग्लादेश में रह रहे अल्पसंख्यकों को नागरिकता देना हमारा नैतिक दायित्व है, जो वहां उत्पीड़न का सामना करते हैं।


राज्यसभा के अर्काइव से प्राप्त इस जानकारी से आपको स्पष्ट हो जाएगा कि मनमोहन सिंह उस समय राज्यसभा में विपक्ष के नेता थे। केंद्र में एनडीए की सरकार थी अटल बिहारी वाजपेयी इस सरकार के मुखिया थे। उस समय मनमोहन सिंह के द्वारा इस मांग को उठाया गया था और आज कांग्रेस के द्वारा इसी बात का विरोध किया जा रहा है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि वर्तमान सरकार का विरोध करने के चक्कर में कांग्रेस खुद ही विरोधाभासी बयान दे रही है। उसकी 2003 से लेकर 2019 तक आते-आते सोच में इतना बड़ा बदलाव कैसे आ गया।

क्या इस तरह से सरकार के द्वारा लाए गए इस बिल का विरोध सिर्फ वर्तमान सरकार की नीतियों को नीचा दिखाने के लिए किया जा रहा है। मतलब साफ है इस मामले पर कांग्रेस की तरफ से केवल और केवल राजनीति की जा रही है।

जानिए संसद में 2003 में क्या बोले थे मनमोहन सिंह

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपने ही उठाए मुद्दे को भूल गए हैं। कांग्रेस आज जिस सिटीजनशिप एक्ट संशोधन का विरोध कर रही है, मनमोहन सिंह उसके सबसे बड़े पैरोकार रह चुके हैं। मनमोहन ने बांग्लादेश में हिंदुओं के उत्पीड़न के हवाले से साल 2003 में इस मुद्दे को उठाया था और उन्हें नागरिकता के वास्ते सिटीजनशिप एक्ट में प्रावधान करने की मांग की थी। उस वक्त मनमोहन सिंह ने कहा था कि यह राजनीतिक नहीं बल्कि मानवता से जुड़ा मुद्दा है और उनके लिए मदद मांगी थी। यह सब संसद के दस्तावेजों में दर्ज है।Rahul Gandhi, Sonia Gandhi and Manmohan Singh

मनमोहन सिंह ने इन्हें दुर्भाग्य के शिकार लोग कहा था। साल 2003 के संसद के रिकॉर्ड में इसका पूरा ब्यौरा दर्ज है। तब राज्यसभा में बोलते हुए मनमोहन सिंह ने कहा था, “मैं शरणार्थियों के ट्रीटमेंट के बारे में कुछ बात रखना चाहता हूं। देश के विभाजन के बाद बांग्लादेश जैसे देशों में अल्पसंख्यको को अत्याचारों का सामना करना पड़ा है। ये हमारा नैतिक उत्तरदायित्व है कि ऐसे लोग जो परिस्थितियों से मजबूर हैं, ऐसे दुर्भाग्यशाली लोग अगर हमारे देश मे शरण चाहते हैं, तो ऐसे दुर्भाग्यशाली लोगों को नागरिकता देने का हमारा दृष्टिकोण उदार होना चाहिए।”manmohan singh

मनमोहन सिंह यहीं नही रुके। उन्होंने तत्कालीन उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी के सामने एक अहम मांग भी उठा दी। उन्होंने कहा, “मैं उम्मीद करता हूँ कि माननीय उपप्रधानमंत्री सिटीजन शिप एक्ट के बारे में भविष्य का रास्ता तय करते समय इस बात का ध्यान रखेंगे।” इस पर उस समय राज्यसभा की डिप्टी चेयरपर्सन नजमा हेपतुल्ला ने तत्कालीन उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी से कहा, “आडवाणी जी, पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को बहुत तकलीफ़ है। उसका भी ध्यान रखना चाहिए।” इस पर आडवाणी ने जवाब दिया कि वह इस बात से पूरी तरह सहमत हैं। आज वही मनमोहन सिंह और उनकी पार्टी सिटीजनशिप अमेंडमेंट एक्ट का विरोध कर रही है।

मनमोहन सिंह जब प्रधानमंत्री थे तब प्रकाश करात ने की थी ये मांग
prakash karat

मई 2012 में मा‌र्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के तब के तत्कालीन महासचिव प्रकाश करात ने पत्र के माध्यम से मनमोहन सिंह को यह भी याद दिलाया था कि एनडीए के शासनकाल में जब नागरिकता संशोधन विधेयक, 2003 लाया गया था, उस समय राज्यसभा में बतौर विपक्ष के नेता उन्होंने बांग्लादेशी शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता देने की वकालत की थी और तत्कालीन उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने भी इस पर सहमति जताई थी। इस मुद्दे पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार में सहमति भी बन गई थी। इसके बावजूद एक दशक बाद भी नागरिकता संशोधन विधेयक लंबित है। साथ ही उन्होंने कहा था कि आधार कार्ड पहचान पत्र बनाने की प्रक्रिया से भी इन शरणार्थियों को बाहर रखा गया है।


लोग तो सरकार की इस नीति का विरोध कर रही कांग्रेस को लेकर यह तक कहने लगे हैं कि गिरगिट को यह देखकर शर्म आएगी कि कांग्रेस किस तरह से बार-बार रंग बदलती है..कांग्रेस एक वास्तविक अवसरवादी और भारत में सबसे बड़ी भ्रामक राजनीतिक पार्टी है, जिसने आजादी के बाद से केवल भारतीय मतदाताओं को भ्रमित किया है।

क्या है नागरिकता संशोधन विधेयक

इस विधेयक द्वारा अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से 31 दिसंबर, 2014 से पहले आने वाले 6 धर्मों के शरणार्थियों को भारत की नागरिकता प्रदान करने का रास्ता खोल दिया जाना था। ये धर्म हैं-हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख, पारसी और ईसाई। गौरतलब है कि इस्लाम मानने वालों को इसमें शामिल नहीं किया गया था। नागरिकता के लिए उन्हें सात साल भारत में रहना सिद्ध करना होगा। नागरिकता देने के लिए उनसे कोई दस्तावेज नहीं मांगा जाएगा।Manmohan Singh Statement on Rajysabha 2003 (1)

नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर विवाद और विरोध इसलिये रहा है क्योंकि माना जा रहा है कि ये भारतीय संविधान की भावना के खिलाफ है। इसे भारत को, जो कि एक सेकुलर स्टेट है, हिन्दू राष्ट्र बनाने की दिशा में एक कदम के तौर पर देखा जा रहा है, जहां नागरिकता का आधार धर्म भी होगा।Manmohan Singh Statement on Rajysabha 2003 (1)