बैकफुट पर कांग्रेस, यूपीए सरकार के समय शुरू हुई थी एनपीआर की योजना वर्तमान सरकार ने काम को आगे बढ़ाया

कांग्रेस और असदुद्दीन ओवैसी समेत कई दल मोदी सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि वो एनपीआर के जरिए पिछले दरवाजे से एनआरसी लागू करना चाह रही है।

Written by: December 26, 2019 3:00 pm

नई दिल्ली। सीएए और एनपीआर को लेकर पूरे देश में जिस तरह का विरोध प्रदर्शन चल रहा है और दावे किए जा रहे हैं कि सरकार की तरफ से धर्म के आधार पर लोगों को बांटने की कोशिश की जा रही है इसी के तहत यह कानून लाया गया। इसी को लेकर एक बड़ा खुलासा हुआ है।Rahul Gandhi, Sonia Gandhi and Manmohan Singh
यहां मिलेगी आपको इससे जुड़ी पूरी जानकारी
आपको जानकर हैरानी होगी कि एनडीए सरकार की तरफ से यह बिल भले ही संसद के पटल पर रखा गया हो लेकिन कागजातों और गृह मंत्रालय के वेबसाइट की मानें तो यह कवायद तो 2011 में यूपीए सरकार की तरफ से शुरू की गई थी। उस समय देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह थे और गांधी परिवार का इसपर दबदबा था।


वहीं डिटेंशन सेंटर को लेकर भी खुलासा हुआ है कि वह भी यूपीए सरकार के समय ही तैयार किया गया था। राहुल गांधी की तरफ से आज इसको लेकर कई ट्वीट किए थे जिसको लेकर संबित पात्रा ने आज राहुल गांधी के झूठ की पोल खोल दी।

इसमें यूपीए सरकार की तरफ से तीन डिटेंशन कैंप असाम में खोले गए। वहीं व्हाइट पेपर जारी करने को लेकर भी सरकार के 2012 के नोटिफिकेशन पेपर भी जारी भाजपा ने जारी किया।


मोदी कैबिनेट ने एनपीआर डेटाबेस को अपडेट करने की मंजूरी दी तो उस पर बवाल शुरू हो गया है। नागरिकता कानून और एनआरसी पर जारी घमासान के बीच अब एनपीआर का मुद्दा भी सियासी हो चला है। कांग्रेस और असदुद्दीन ओवैसी समेत कई दल मोदी सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि वो एनपीआर के जरिए पिछले दरवाजे से एनआरसी लागू करना चाह रही है। लेकिन उसी संसद में यूपीए सरकार की ओर से दिए है जवाबों को खंगालने पर पता चलता है कि यूपीए सरकार ने भी एनपीआर को ही एनआरसी का अगला चरण बताया था।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान 28 अगस्त 2012 को सरकार का दिया जवाब इस बारे में बिल्कुल साफ है। आज के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और तब के लोकसभा सांसद योगी आदित्यनाथ के सवाल के जवाब में तत्कालीन गृह राज्य मंत्री भंवर जितेंद्र सिंह ने कहा था, ” एनपीआर, एनआरसी तैयार करने की दिशा में पहला कदम है। देश में रहने वाला कोई भी व्यक्ति नागरिकता रजिस्टर का हिस्सा तभी हो सकेगा जब उसके नागरिकता के स्थिति की जांच नहीं हो जाती”। जवाब में ये भी कहा गया था कि स्थानीय एनपीआर ( LRUR ) और आधार के आंकड़ों को स्थानीय इलाकों में जारी किया जाएगा ताकि जिसको कोई आपत्ति या दावा करना हो तो कर सकता है। रजिस्टर को ग्राम सभा या वार्ड कमिटी के पास भी भेजने की बात कही गई थी ताकि उनकी सामाजिक ऑडिट किया जा सके।

जब यूपीए सरकार से 2011 में लोकसभा में सवाल किया गया था कि एनपीआर के तहत जो पहचान पत्र जारी किया जाएगा, क्या वो नागरिकता का सबूत होगा और क्या उसका दुरुपयोग भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए तो नहीं होगा? तत्कालीन गृह राज्य मंत्री भंवर जितेंद्र सिंह का लिखित जवाब था, “किसी व्यक्ति की नागरिकता नेशनल रजिस्टर ऑफ इंडियन सिटिजन ( एनआरसी ) बनाने में समय अलग से निर्धारित किया जाएगा, जो एनपीआर का ही उपवर्ग या उपसमुच्चय ( Subset) होगा।”

पहचान नंबर जारी करने के लिए 2009 में यूआईडी बनाई गई जबकि एनआरआईसी पर सरकार के भीतर सहमति नहीं होने के कारण नागरिकता रजिस्टर की जगह एनपीआर बनाने पर सहमति हुई और 2009 में इस पर भी काम शुरू किया गया। शुरू में देश के अलग-अलग हिस्सों में जनसंख्या महकमे और यूआईडी ने अलग-अलग आंकड़े और बायोमीट्रिक आंकड़े एकत्र किए। तब यह भी तय किया गया कि जनसंख्या महकमा और यूआईडी इन आंकड़ों को एक दूसरे के साथ साझा करेंगे।pm modi amit shah jp nadda

सूत्रों के अनुसार, 2009 के सिटीजनशिप कानून में एनआरआईसी को लेकर जो संशोधन किया गया है, उसमें नागरिकता रजिस्टर का जिक्र तो है लेकिन एनपीआर का जिक्र नहीं है। यूपीए सरकार में इस मुद्दे पर विवाद से बचने के लिए एनआरआईसी की जगह एनपीआर बनाने का फैसला लिया गया। आज सरकार का दावा सही है कि एनपीआर का एनआरसी से संबंध नहीं है।PM modi amit shah

तो ऐसे में स्पष्ट हो गया है कि यह सब यूपीए सरकार की देन है लेकिन जब इन योजनाओं को एनडीए सरकार की तरफ से अमलीजामा पहनाया जा रहा है तो इस धर्म के आधार पर देश को बांटने की कोशिश कहा जा रहा है और इसके खिलाफ हिंसक प्रदर्शन करने के लिए लोगों को उकसाया जा रहा है।