सही ऑफसेट पार्टनर चुना था सरकार ने, राफेल पर सर्वोच्च राहत के गहरे मायने

भारत के मीडियम मल्टी रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट के सौदे के लिए दसॉ ने अपने राफेल जेट का 28 अगस्त, 2007 को दावा किया था। उस समय दसॉ ने भारत में निजी पार्टनरशिप के लिए टाटा ग्रुप के साथ बातचीत शुरू की थी।

Avatar Written by: November 14, 2019 6:02 pm

नई दिल्ली। सरकार को सुप्रीम कोर्ट से राफेल पर मिली राहत के मायने सीधे तौर पर ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट से जुड़े हैं। इस राहत ने इस डील के साथ जुड़े हुए ऑफसेट क्लॉज़ की शर्तों को सही साबित कर दिया।

rafale deal

भारत के मीडियम मल्टी रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट के सौदे के लिए दसॉ ने अपने राफेल जेट का 28 अगस्त, 2007 को दावा किया था। उस समय दसॉ ने भारत में निजी पार्टनरशिप के लिए टाटा ग्रुप के साथ बातचीत शुरू की थी। लेकिन टाटा ग्रुप द्वारा अमेरिकी पार्टनर को चुनने के फैसले के बाद दसॉ की मुकेश अंबानी की रिलायंस के साथ बातचीत शुरू हुई। फिर 4 सितंबर, 2008 को एक नई कंपनी रिलायंस ऐरोस्पेस टेक्नॉलजीज लिमिटेड (RATL) बनाई गई थी.

Rafale Deal and Supreme Court

दसॉ की ओर से तैयार किए गए ऑफसेट प्लान में कंपोजिट मैन्युफैक्चरिंग का एक सेंटर बनाना, महत्वपूर्ण तकनीकि का ट्रांसफर और फाल्कन जेट के लिए एक जॉइंट वेंचर करने के साथ ही भविष्य में स्मार्ट सिटीज में निवेश करने की योजना भी थी। लेकिन मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज के 2014 में रक्षा और ऐरोस्पेस के धंधे से हटने का फैसला लिया।

rafale deal ambani

यहां मामले में एक नया पेच आ गया। मुकेश अंबानी की तरफ से डील रद्द होने के बाद 2014 में ऑफसेट्स इंडिया सल्यूशंस नाम की एक दागी कंपनी ने दसॉ के साथ ऑफसेट नियमों के तहत बात शुरू हुई। साल 2016 में दिल्ली में OIS के दफ्तर में एक जांच के दौरान छापेमारी हुई जिसके बाद संजय भंडारी भारत फरवरी 2017 में लंदन भाग गए।

Rajnath Singh RAfel

2015 में मोदी सरकार ने फ्रांस की सरकार के साथ पुराना सौदा रद्द करते हए 36 राफेल विमानों की सीधी खरीद का फैसला लिया जिसमें ऑफसेट साझेदार के तौर पर अनिल अंबानी की कंपनी को शामिल किया गया। जिसके बाद से विपक्ष ने आरोपों की बारिश कर दी। दावा किया गया कि अनिल अंबानी की कंपनी का नाम भारत की तरफ से आगे बढ़ाया गया। जबकि फ्रांस की सरकार और दसॉ की तरफ से बयान जारी कर कहा गया है कि ऑफसेट करार में सरकार का कोई योगदान नहीं है और कंपनी अपनी निजी पार्टनर चुनने के लिए स्वतंत्र है।

supreme court

अब उच्चतम न्यायालय ने राफेल लड़ाकू विमान के सौदे को बरकरार रखते हुए अपने 14 दिसंबर, 2018 को दिए फैसले के खिलाफ दाखिल समीक्षा याचिकाओं को खारिज कर दिया। मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व वाली पीठ ने कहा कि इसकी अलग से जांच करने की जरूरत नहीं है। अदालत ने केंद्र की दलीलों को तर्कसंगत और पर्याप्त माना। इसके साथ ही ऑफसेट पार्टनर पर उठे तमाम सवालों के भी जवाब मिल गए और मोदी सरकार का फैसला सही साबित हुआ।