अयोध्या मामले पर बोले श्रीश्री रविशंकर- लोग सहयोग को तैयार थे

श्री श्री ने कहा, ‘ये पहला मौका था जब राष्ट्रीय महत्व से जुड़ा एक अहम मुद्दा मध्यस्थता के लिए रखा गया। पहले मध्यस्थता संपत्ति अधिकार या कॉर्पोरेट मामलों में हो चुकी है लेकिन इतने इतने बड़े पैमाने वाले मुद्दे पर नहीं।

Written by: November 13, 2019 7:37 pm

नई दिल्ली। अयोध्या मामले पर फैसला आ चुका है और सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसला में कहा है कि, विवादित जमीन पर रामलला का हक है। इसके साथ ही मुस्लिम पक्ष को अयोध्या में ही किसी और जगह 5 एकड़ जमीन मुहैया कराई जाएगी, जहां मस्जिद बने। अब इस मामले को लेकर आध्यात्मिक गुरु और विश्व में कई जगहों पर शांति प्रयासों में मध्यस्थ की भूमिका निभाने वाले श्रीश्री रविशंकर ने अपने अनुभवों को साझा किया।

Ayodhya- supreme court

मंगलवार को ब्रसेल्स की यूरोपीय संघ की संसद को संबोधित करते हुए श्रीश्री ने कहा कि, अयोध्या मामले में उन्होंने देखा कि, लोग सुनने को तैयार थे और साथ ही सहयोग भी करने को तैयार थे। श्री श्री ने ‘ध्यान से मध्यस्थता तक’ विषय पर भाषण दिया। उन्होंने शांति मध्यस्थता प्रयासों को लेकर अपने अहिंसा के नजरिए को साफ किया। श्री श्री ने अयोध्या को भारतीय इतिहास के संवेदनशील और लंबे अर्से से लंबित मामलों में से एक बताया।

sri sri ravi shankar

श्री श्री ने कहा, ‘ये पहला मौका था जब राष्ट्रीय महत्व से जुड़ा एक अहम मुद्दा मध्यस्थता के लिए रखा गया। पहले मध्यस्थता संपत्ति अधिकार या कॉर्पोरेट मामलों में हो चुकी है लेकिन इतने इतने बड़े पैमाने वाले मुद्दे पर नहीं। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के इतिहास में इसको स्थान मिलना निश्चित है। इस मामले से जुड़ी 25 पार्टियां थीं और हमने पूरे ध्यान के साथ हर एक को सुना। कोई समय सीमा नहीं थी।’

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आगे उन्होंने कहा, ‘हमने जो पाया वो था कि लोग सहयोग को तैयार थे। वो दूसरों के दृष्टिकोण पर विचार करने के साथ सबकी बेहतरी के लिए आगे बढ़ने को तैयार थे। इससे सौहार्द का एक वातावरण बना। हमने दोनों पक्षों के सैकड़ों धार्मिक नेताओं से बात की। सबने स्वीकार्यता का वातावरण बनाने के लिए योगदान दिया। ये ‘देने’ और आगे बढ़ने की सोच थी। ये ऐसा मुद्दा जिसने कई सदियों में छोटी-बड़ी 71 लड़ाइयां देखीं, आखिर उस सब पर विराम लगा।’

श्री श्री ने ‘ध्यान’ की आवश्यकता पर जोर दिया

उन्होंने कहा कि ध्यान हमारी सोच बदल देता है। ये चीजों को दबाव की अवस्था वाले दिमाग से देखने की जगह हमारे ऑब्जर्वेशन, परसेप्शन और एक्सप्रेशन में स्पष्टता लाता है। श्री श्री ने कहा कि ‘टकराव समाधान’ की प्रक्रिया में जो भी पक्ष हों या मध्यस्थ हों उन सबको ध्यान के लिए हर दिन कुछ मिनट निकालने की जरूरत है।

श्री श्री ने इस मौके पर चाकू और सेब की मिसाल देकर ‘मध्यस्थता’ और ‘फैसले’ के फर्क को साफ किया। उन्होंने कहा कि ‘फैसले’ को इस तरह समझा जाए कि चाकू से एक सेब को दो टुकड़ों में काट कर उन दो लोगों को बराबर बराबर हिस्सा दे दिया जाए जो इसके लिए लड़ रहे हैं।

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श्री श्री ने कहा, ‘मध्यस्थ खुद सेब नहीं काटता। मैं एक मध्यस्थ के नाते चाकू संबंधित पार्टियों को दे देता हूं और उनके साथ सही विकल्प चुनने के लिए मदद करता हूं। ये दोनों पार्टियों को साथ आने का मौका देता है। खोया हुआ विश्वास दोबारा कायम करना चुनौती भरा है लेकिन असंभव नहीं है। इसके लिए जरूरी है कि पहले सब शांत और स्थिर स्थिति में हों।’

श्री श्री को कोलंबिया में सरकार और विद्रोही गुट FARC (रिवोल्यूशनरी आर्म्ड फोर्सेज ऑफ कोलंबिया) के बीच शांति समझौता कराने का श्रेय जाता है। इसके लिए उन्हें कोलंबिया के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजा जा चुका है। इस मौके पर स्लोवेनिया के पूर्व प्रधानमंत्री अलोज पेटरले ने कहा, ‘बहुत कम लोग समझते थे कि कोलंबिया में टकराव का समाधान निकलेगा। लेकिन ये हो सका क्योंकि कोई (श्री श्री) अलग सोच लेकर आया।’

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यूरोपीय संसद के सदस्य (एमईपी) और लाटविया के पूर्व संस्कृति मंत्री डेस मेलबार्डे ने कहा, ‘हम बहुत से देशों में ‘शांति की सभ्यता’ की जड़ों को ढूंढ सकते हैं। लेकिन हमें इन्हें दोबारा सामने लाने में मदद करने के लिए नए रास्ते, नए दृष्टिकोण और नए लीडर्स चाहिए। आप (श्री श्री) के व्यक्तित्व में हमें वो मिला है।’ इस मौके पर यूरोपीय संसद के सदस्य जियोफ्री वान ऑर्डेन, यूरोपीय संसद की उपाध्यक्ष कैटरीना बार्ले और पूर्व सांसद जो लीनेन भी मौजूद रहे।