“सुभाष चंद्र बोस और गुमनामी बाबा में बहुत कुछ समान था”- योगी कैबिनेट की जांच रिपोर्ट में हैरान करने वाला खुलासा

बावजूद विष्णु सहाय आयोग ने लिखा है कि इस बात की पुष्टि नही की जा सकती कि गुमनामी बाबा ही सुभाष चंद्र बोस थे। इसकी वजह देरी से शुरू की गई पड़ताल है। यह पड़ताल गुमनामी बाबा की मृत्यु के 31 साल बाद शुरू की गई।

Avatar Written by: July 24, 2019 12:59 pm

नई दिल्ली। सुभाष चंद्र बोस को लेकर योगी कैबिनेट में पेश हुई एक रिपोर्ट पर सबकी निगाहें लगी हुई हैं। ये रिपोर्ट गुमनामी बाबा को लेकर है जिनके बारे में कई लोगों का मानना है कि वे कोई और नही बल्कि सुभाष चंद्र बोस ही थे।

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इस बात की सत्यता का पता लगाने के लिए यूपी सरकार ने साल 2016 में जस्टिस विष्णु सहाय आयोग का गठन किया था। इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट यूपी कैबिनेट को पेश कर दी है। अब इसे विधानसभा के पटल पर रखा जाएगा।

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सूत्रों के मुताबिक इस रिपोर्ट में गुमनामी बाबा और नेता जी सुभाष चंद्र बोस के बीच कई समानताएं पाई गई हैं। सुभाष चंद्र बोस की ही तरह गुमनामी बाबा भी बंगाल की ही पृष्ठभूमि के थे। वे भी अंग्रेजी, हिंदी और बंगाली तीनो में ही निष्णात थे। उनके आवास से इन भाषाओं की कई किताबें भी हासिल हुईं। उनकी राजनीति में गहन रूचि थी। उन्हें युद्ध, कला और समसामयिक विषयों की गहन जानकारी थी। संगीत से भी उनका जबरदस्त लगाव था। पूजा, पाठ और ध्यान उनकी नियमित दिनचर्या का हिस्सा था। ये सारे ही गुण उन्हें नेता जी सुभाष चंद्र बोस के काफी करीब लाते हैं।

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बावजूद विष्णु सहाय आयोग ने लिखा है कि इस बात की पुष्टि नही की जा सकती कि गुमनामी बाबा ही सुभाष चंद्र बोस थे। इसकी वजह देरी से शुरू की गई पड़ताल है। यह पड़ताल गुमनामी बाबा की मृत्यु के 31 साल बाद शुरू की गई। यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने गुमनामी बाबा के सुभाष चंद्र बोस होने की बात का पड़ताल करने के लिए इस आयोग का गठन किया था। गुमनामी बाबा की मृत्यु 18 सितंबर 1985 को अयोध्या में हुई थी। रिपोर्ट में एक अहम बात यह भी लिखी हुई है कि गुमनामी बाबा अयोध्या में उस वक्त तक ही थे जब तक कि उनके सुभाष चंद्र बोस होने की चर्चाएं शुरू नही हुई थीं। फिर उन्होंने अपना निवास बदल दिया।