क्या फडणवीस सरकार की तरह महाराष्ट्र में 5 साल पूरा कर पाएगी शिवसेना-कांग्रेस-राकांपा गठबंधन की सरकार ?

वैसे महाराष्ट्र की राजनीति में मुख्यमंत्री के पद को लेकर जैसी उठा-पटक देखने को मिल रही है, ये महाराष्ट्र का चरित्र है। अगर इतिहास के पन्ने पलटें तो मिलेगा कि महाराष्ट्र में हर चुनाव में मुख्यमंत्री पद को लेकर झगड़ा हुआ है। तमाम कोशिशों के बाद अगर कोई मुख्यमंत्री बना थी, तो वह ज्यादा समय तक टिक नहीं सका।

Written by: November 11, 2019 3:35 pm

नई दिल्ली। महाराष्ट्र में आए चुनाव परिणाम ने भाजपा-शिवसेना के खेमे में खुशी की लहर ला दी थी। लेकिन समय के साथ ही यह खुशी खत्म होती नजर आई। शिवसेना ने सरकार गठन के 50-50 फॉर्मूले पर भाजपा को चुनाव परिणाम आने के बाद से ही घेरना शुरू कर दिया था। हालांकि भाजपा लगातार इस बात से इंकार करती रही कि ऐसे किसी भी फॉर्मूले पर चुनाव में गठबंधन करने के समय बात नहीं हुई थी। इसी का परिमाम हुआ कि शिवसेना ने भाजपा से अलग अपनी राह चुन ली और भाजपा ने राज्य में सरकार के गठन से साफ मना कर दिया।

Devendra Fadnavis, Uddhav Thackeray and PM Narendra Modi

इस सब के बीच किंगमेकर की भूमिका में शरद पवार की पार्टी राकांपा आई। जिसने चुनाव पूर्व कांग्रेस के साथ गठबंधन किया और कांग्रेस से ज्यादा विधायकों को जीत दर्ज कराकर विधानसभा में भेजने में सफल रही। अब राकांपा ने शिवसेना के उस हिंदुत्व की राजनीति को अपने से अलग रखने की शर्त पर सरकार को समर्थन देने की बात कही वहीं कांग्रेस जो महाराष्ट्र में अपनी खोई जमीन तलाशने में जुटी थी उसे भी इसी बहाने महाराष्ट्र में शिवसेना को समर्थन देकर सरकार चलाने का मौका नजर आने लगा।

महाराष्ट्र में 30 साल बाद किसी मुख्यमंत्री ने पूरा किया अपना कार्यकाल

CM Devendra Fadnavis

वैसे महाराष्ट्र की राजनीति में मुख्यमंत्री के पद को लेकर जैसी उठा-पटक देखने को मिल रही है, ये महाराष्ट्र का चरित्र है। अगर इतिहास के पन्ने पलटें तो मिलेगा कि महाराष्ट्र में हर चुनाव में मुख्यमंत्री पद को लेकर झगड़ा हुआ है। तमाम कोशिशों के बाद अगर कोई मुख्यमंत्री बना था, तो वह ज्यादा समय तक टिक नहीं सका। आपको बता दें कि देवेंद्र फडणवीस दूसरे ऐसे मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा किया है। देवेंद्र फडणवीस से पहले वसंतराव नाइक महाराष्ट्र के पहले मुख्यमंत्री थे जिन्होंने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया था। महाराष्ट्र में अधिकतर समय कांग्रेस की सत्ता रही है। कभी 50-50 फॉर्मूले के चलते, तो कभी नाकामी की वजह से या फिर कुछ बार केंद्र में बुला लिया जाने के चलते महाराष्ट्र में एक ही कार्यकाल में दो या दो से अधिक मुख्यमंत्री रहे। महाराष्ट्र में सबसे अधिक समय तक वसंतराव नाइक ही मुख्यमंत्री रहे। वह पहली बार 5 दिसंबर 1963 को मुख्यमंत्री बने, दूसरी बार 13 मार्च 1972 को सीएम बने। तीसरी बार वह 13 मार्च 1972 से 20 फरवरी 1975 तक मुख्यमंत्री रहे। वह कुल 11 साल 77 दिनों तक लगातार मुख्यमंत्री रहे।

भाजपा ने क्यों नहीं माना 50-50 फॉर्मूला

amit shah devendra fadanvis

इसकी एक वजह यह है कि इससे पहले के भाजपा के इस तरह के फॉर्मूले पर सरकार बनाने के सारे फैसले में उसका सिर्फ नुकसान ही हुआ है। ऐसे में भाजपा किसी फॉर्मूले में नहीं पड़ना चाहती होगी क्योंकि एक बार यूपी में मायावती ने भाजपा को धोखा दिया था और दूसरी बार कर्नाटक में कुमारस्वामी ने। ऐसे में दो बार धोखा खा चुकी भाजपा फिर से उसी रास्ते पर नहीं चलना चाहती है।

नरेंद्र मोदी सरकार को केंद्र में समर्थन से भी शिवसेना ने किया इंकार

Shiv Sena MP Arvind Sawant

इस सब के बीच शिवसेना के कोटे से नरेंद्र मोदी कैबिनेट में एक मात्र मंत्री अरविंद सावंत ने इस्तीफा दे दिया। इस्तीफा देने के बाद दिल्ली में सावंत ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कहा कि लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा अध्यक्ष और शिवसेना प्रमुख के बीच 50-50 फॉर्मूला तय हुआ था, जिसमें सीएम पद भी शामिल था। लेकिन भाजपा ने इस बात को नकारा जिससे ठाकरे परिवार को ठेस पहुंची। इससे हालात खराब हुए और हमारा गठबंधन नहीं रहा। सावंत ने कहा कि ऐसे माहौल में मैं कैबिनेट में रहूं, यह उचित नहीं है। इसलिए मैंने अपना त्यागपत्र पीएम को सौंप दिया है। एनडीए से शिवसेना के बाहर होने पर सावंत ने कहा कि मेरे त्यागपत्र का मतलब समझ सकते हैं।

1999 में सरकार गठन में लग गए थे 11 दिन

sonia gandhi and sharad pawar 1

बात 1999 की है। तब एनसीपी अभी नई-नई पार्टी बनी थी। एनसीपी और कांग्रेस ने वो चुनाव अलग-अलग लड़ा था। वहीं दूसरी ओर शिवसेना-भाजपा पुर्नचुनाव के लिए वोट मांग रहे थे। इस चुनाव में एनसीपी को 58 सीटें मिलीं, कांग्रेस को 75 सीटें मिलीं और भाजपा-शिवसेना के गठबंठन को 125 सीटें मिलीं, जिसमें 69 शिवसेना ने जीतीं, जबकि 56 भाजपा के खाते में गईं। तत्कालीन गवर्नर पीसी एलेक्जेंडर ने पहले भाजपा-शिवसेना के गठबंधन को बुलाया और सरकार बनाने की संभावनाओं पर बात की, लेकिन बहुमत ना होने की वजह से वह सरकार नहीं बना सके। इसके बाद कांग्रेस और एनसीपी को साथ लाने की कोशिशें शुरू हुईं। 18 अक्टूबर को कांग्रेस ने एनसीपी और कुछ निर्दलीय विधायकों के समर्थन से सरकार बनाई और विलासराव देशमुख ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इस साल सरकार बनाने में 11 दिन लग गए थे।

1990 के विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस का राज्य में घटा वर्चस्‍व

Devendra Fadnavis, Uddhav Thackeray

1989 में पहली बार शिवसेना और भाजपा ने लोकसभा चुनाव में गठबंधन किया था। इसके अलावा दोनों दलों ने मिलकर विधानसभा चुनाव के लिए गठबंधन बनाए रखने का फैसला लिया था। वर्ष 1990 के विधानसभा चुनाव में शिवसेना और भाजपा ने बराबर के उम्‍मीदवार चुनाव मैदान में उतारे। इस चुनाव में शिवसेना ने 52 सीटों पर जीत दर्ज की। भाजपा की झोली में 42 सीटें आई थी। इस दौरान कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी और बहुमत के साथ सरकार बनाने में सफल रही। उस वक्‍त राष्‍ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का अस्तित्‍व नहीं था। वर्ष 1999 में शरद यादव ने कांग्रेस से अलग होकर नई पार्टी बनाई। इस चुनाव में कांग्रेस ने शरद पवार के नेतृत्‍व में 141 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इस चुनाव में 12 निर्दलीय भी विजयी रहे। निर्दलीय विधायकों की मदद से राज्‍य में शरद पवार के नेतृत्‍व में कांग्रेस की सरकार बनी। इसके बाद से यहां कांग्रेस का वर्चस्‍व खत्‍म हो गया। 1995 में हुए विधानसभा चुनाव में यहां किसी दल को बहुमत नहीं मिला।

1995 के विधानसभा चुनाव में राज्‍य में रहा था त्रिकोणीय मुकाबला

1995 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद हिंदुत्‍व की लहर पूरे देश में थी। इस बार भी प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा और शिवसेना मिलकर चुनाव मैदान में उतरे। इस बार कांग्रेस को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। विधानसभा चुनाव में शिवसेना सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। 73 सीटों पर शिवसेना ने विजय हासिल की था। दूसरे नंबर पर भाजपा थी। 65 सीटों पर जीत दर्ज कर भाजपा दूसरे स्‍थान पर रही थी। शिवसेना और भाजपा ने मिलकर सरकार का गठन किया। शिवसेना के वरिष्‍ठ नेता मनोहर जोशी महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री बने। भाजपा के गोपीनाथ मुंडे को उपमुख्‍यमंत्री बनाया गया।

2004 में भी सरकार के गठन में लगा था 16 दिन का समय

congress

2004 के चुनाव के बाद भी कुछ ऐसा ही हुआ था। जब 2019 की तरह ही दो गठबंधनों ने चुनाव लड़ा था। 16 अक्टूबर को नतीजे आ गए थे। कांग्रेस और एनसीपी ने 140 सीटें जीतीं, जबकि भाजपा-शिवसेना के खाते में 126 सीटें आईं। वैसे तो कांग्रेस-एनसीपी के पास उस समय भी सरकार बनाने के लिए कुछ निर्दलीय विधायकों का समर्थन था, लेकिन एक दिक्कत थी। एनसीपी ने 71 सीटें जीतीं और कांग्रेस ने 69। इस तरह एनसीपी ने मुख्यमंत्री पद की मांग कर ली, क्योंकि ये सामान्य सी बात थी कि जिसके पास अधिक सीटें हैं वही मुख्यमंत्री पद लेगा। लगभग वैसी ही स्थिति, जैसी इस समय महाराष्ट्र में है। ऐसे में बहुमत होने के बावजूद बहुत दिनों तक सरकार नहीं बन सकी। आखिरकार 16 दिनों के संघर्ष के बाद कांग्रेस और एनसीपी में समझौता हो गया और विलासराव देशमुख ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। हालांकि, दोनों के बीच जो फॉर्मूला तय हुआ, उसके तहत बंटवारे में काफी समय लगा और 13 दिनों तक कैबिनेट नहीं बन सकी। हालांकि, गर्वनर मोहम्मद फैजल ने कांग्रेस और एनसीपी को अपने मतभेदों से निपटने का समय दिया और इंतजार किया था।

अब जरा ध्यान दें 2014 के महाराष्ट्र चुनाव के समय के हालात पर

2014 के विधानसभा चुनाव में शिवसेना-भाजपा का गठबंधन इसलिए टूट गया था कि उद्धव ठाकरे भाजपा को राज्य की आधी यानि 144 सीटें देने के लिए भी राजी नहीं हुए थे। लेकिन, हालात बदले और महाराष्ट्र की भगवा राजनीति में सियासत का चक्र 360 डिग्री घूम गया। 2019 में शिवसेना 124 सीटों पर चुनाव लड़ी और भाजपा 150 सीटों पर चुनाव मैदान में उतरी। यानि, स्पष्ट तौर पर भाजपा और प्रदेश में उसके नेता मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस बड़े भाई की भूमिका में दिखे और उद्धव को उनकी बात माननी पड़ी। लेकिन चुनाव नतीजे के बाद वही कुछ शुरू हुआ जो 2014 में चुनाव से पहले दोनों पार्टियों के बीच हुआ था।

BJP shivsena Flag

2014 से पहले तक महाराष्ट्र की भगवा राजनीति का झंडा शिवसेना के हाथों में रहा। लोकसभा चुनावों में भाजपा उससे बड़ी पार्टी बनकर उभरी भी और पार्टी की कमान अटल और आडवाणी जैसे कद्दावर नेताओं ने भी संभाली, लेकिन महाराष्ट्र में शिवसेना ही भाजपा की बिग ब्रदर बनी रही थी। इसका सबसे बड़ा कारण खुद शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे थे।

shivsena bjp

ऐसे में महाराष्ट्र की सत्ता का चरित्र देखते हुए और अब जो गठबंधन बन रहा है उसमें शामिल पार्टियों की सोच को देखते हुए ये तो तय है कि एक मुख्यमंत्री पूरे समय तक सत्ता में नहीं रह सकेगा, किसी न किसी फॉर्मूले के तहत की सरकार बनेगी, भले ही वह 50-50 हो या फिर 30-70। इसके साथ ही कांग्रेस के साथ शरद पवार की पार्टी राकांपा को तो कोई परेशानी नहीं होगी लेकिन इस गठबंधन में सबसे बड़ी परेशानी इन दोनों पार्टियों की सोच के साथ शिवसेना की सोच का मेल नहीं खाना है। sharad pawar and sanjay raut

शिवसेना पर सरकार बनाने से पहले ही कांग्रेस और राकांपा ने दबाव बनाना शुरू कर दिया है जिसका सीधा नजारा देखने को मिला जब केंद्र की मोदी सरकार में शिवसेना के कोटे से मात्र एक मंत्री अरविंद सावंत ने इस्तीफा दे दिया और साथ ही शिवसेना ने केंद्र सरकार से समर्थन वापस लेने का भी ऐलान कर दिया। ऐसे में जब सरकार के गठन से पहले कांग्रेस और राकांपा ने शिवसेना पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है तो इससे स्पष्ट हो गया है कि महाराष्ट्र में एक बार फिर से राजनीतिक संकट आनेवाले दिनों में गहराने वाला है और शिवसेना को इसकी कीमत सरकार और अपने सबसे पुराने सहयोगी भाजपा को गंवाकर चुकानी पड़ेगी।