भारतीय पूर्वजों ने इसलिए दिया है ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का नारा

विश्व एक इकाई है। एक मात्र। भौतिक विज्ञान के निष्कर्ष यही हैं। भारतीय अद्वैत दर्शन के भी यही हैं। सृष्टि एक है। यही सत्य है। यहां दूसरा है ही नहीं – द्वितीयो नास्ति। दर्शन और विज्ञान एक ही निष्कर्ष पर हैं। यह दोनों भी दो नहीं हैं। विज्ञान और दर्शन भी भीतर से एक हैं। इनमें भी द्वैत नहीं हैं तो भी प्रकृति में अनेक जीव हैं। अनेक वनस्पतियां और अनेक पदार्थ। इस दृष्टि से यहां विविधिता है। क्षेत्रीय विविधिताएं कहीं कहीं राष्ट्र राज्य में भी गठित हैं। राष्ट्र राज्य की सत्ता के पीछे संवैधानिक संप्रभुता की शक्ति है। इसलिए क्षेत्रीय विविधिता को नेशन-स्टेट/राष्ट्र राज्य के रूप में प्रायः अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता भी है।

भारत से भिन्न देशों में राष्ट्र की अस्मिता लोग, भूमि और सत्ता का जोड़ मात्र है। कहीं कहीं क्षेत्रीय सभ्यता व संस्कृति के तत्व भी राष्ट्र के घटक हैं। लेकिन भारत का राष्ट्र तत्व अन्य राष्ट्रों से भिन्न है। भारतीय राष्ट्र की अस्मिता का मूल तत्व संस्कृति है। इस संस्कृति का विकास तर्क आधारित दर्शन से हुआ है। यहां दर्शन ही संस्कृति का मूल तत्व है। जैसे राष्ट्र गठन का मूल तत्व संस्कृति है वैसे ही सांस्कृतिक विकास का मूल तत्व भारत बोध है। भारत का राष्ट्र बोध अपनी  राष्ट्रीय अस्मिता के बोध तक ही सीमित नहीं है। यह विज्ञान और दर्शन से प्राप्त विश्व एकत्व के सर्वोच्च लक्ष्य में सक्रिय भारत तत्व हैं।

भारत तत्व भौतिक विज्ञान का विषय नहीं है लेकिन इसकी उपलब्धि भौतिक विज्ञान से भी हुई है। ब्रह्माण्डीय एकता का निष्कर्ष भौतिक विज्ञान का है। भौतिक विज्ञानियों को इस ब्रह्माण्डीय एकता का ज्ञान विलम्ब से हुआ। भारत में दिक्काल को ऋग्वैदिक काल से ही एक परम के दो घटकों में जाना गया था। वैज्ञानिकों को संपूर्ण ब्रह्म या कासमास के अध्ययन में काफी समय लगना स्वाभाविक था। विज्ञान वस्तुतः गति का अध्ययन है। गति से समय है। वैज्ञानिकों ने भूत की गति को जांचने का अच्छा काम किया। भारतीय संस्कृति में अद्वैत था। सारी विविधिताओं के भीतर एक ही तत्व/चेतन/प्राण या आत्मा का ज्ञान यहां उपनिषद् के ऋषियों को था। इसका सीधा प्रभाव संस्कृति पर पड़ा। यहां का जीवन सामूहिक होता गया। भारत में परिवार नाम की छोटी मगर प्रिय संस्था का विकास हुआ। भारतीय पूर्वजों ने समूचे विश्व को परिवार जानने मानने की घोषणा की। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ विश्व को परिवार जानने की ही आत्मीय अनुभूति है। पशु पक्षी और नदी पर्वत व वनस्पतियों में भी एक ही प्राण चेतना की अनुभव अनुभूति का केन्द्र भारत है। भारतीय राष्ट्रभाव के विकास में इसी तत्व अनुभूति की गाढ़ी भूमिका है।

फ्रांस में प्रथम विश्वयुद्ध की 100वीं वर्षगांठ हुई। भारत से उपराष्ट्रपति वैंकैय्या नायडू ने इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया। फ्रांस के राष्ट्रपति ने युद्ध विभीषिका का उचित वर्णन किया लेकिन साथ में जोड़ा कि ‘राष्ट्रवाद’ की बढ़त से विश्व शांति को खतरा है। भारत से भिन्न देशों के राष्ट्रवाद के बारे में फ्रांस के राष्ट्रपति की बात सही हो सकती है लेकिन भारतीय राष्ट्रवाद की प्रकृति वैश्विक है। भारतीय राष्ट्रभाव में विश्व का लोकमंगल है। इस राष्ट्रवाद में यूरोपीय पुनर्जागरण काल में विकसित क्षेत्रीय या नस्ली श्रेष्ठता की अस्मिता नहीं है। भारतीय राष्ट्रभाव वैदिक साहित्य में भी भरापूरा है। इस राष्ट्रभाव का केन्द्रीय विचार लोक मंगल है। भारतीय राष्ट्रभाव का भारत तत्व ध्यान देने योग्य है। गांधी जी राष्ट्रवादी थे लेकिन दुनिया की शांति समृद्धि के लिए व्याकुल थे। साहित्य के क्षेत्र में रवीन्द्रनाथ ठाकुर विश्व को एक सुंदर नीड़-आश्रय बताते थे। भारतीय संतों ने दृश्य जगत के अलावा अन्य लोकों की भी चर्चा की। उन्होंने इन लोकों की शांति के लिए भी स्तुतियां कीं। भारत तत्व एक विशेष प्रकार का भाव-रसायन है।

भारत तत्व देश की सीमा से परे है। सारी दुनिया के आनंद का अभिलाषी कार्यकर्ता भारत में अथवा भारत की राजकीय सीमा से बाहर किसी भी देश में हो सकता है। वह अमेरिकी, फ्रांसीसी या ब्रिटिश नागरिक हो सकता है लेकिन वस्तुतः वह भारत तत्व से ही भरापूरा है। भारत तत्व का प्रसार प्राचीन यूनानी दर्शन के भी बहुत पहले यूनान में भी था। यूनानी दर्शन की अनेक निष्पत्तियां उपनिषद् दर्शन से मिलती हैं। ऐसा संयोग आकस्मिक नहीं है। व्यापार प्रसार व अन्य कारणों से भारत के लोग बाहर गये। वे भारत तत्व की अनेक अनुभूतियां बाहर ले गए। पाइथागोरस, सुकरात आदि के दर्शन में भारत तत्व की उपस्थिति है। आधुनिक दार्शनिकों में इमैनुअल कांट भारतीय दर्शन के निकट हैं। वे हीगल से दूर हैं, आचार्य शंकर के करीब हैं। मैक्समुलर जर्मनी के थे लेकिन भारत तत्व से लबालब थे। भारत से भारत तत्व का लगातार निर्यात हुआ। यह बात भी सही है कि सातवीं सदी के बाद भारत के बाहर से गैरभारतीय विचार भी यहां आए। भारतीय समाज के एक हिस्से ने अचेत रूप में उन्हें अपनाया लेकिन सचेत रूप में भारत तत्व की ही प्रतिष्ठा रही है।

संप्रति अतीत की निन्दा का पर्व है। संपूर्ण अतीत को पिछड़ा बताना फैशन है। ऐसा गलत है। वर्तमान अतीत का विस्तार है। भविष्य वर्तमान का विस्तार होगा। भारत का मूल्यबोध अतीत के अनुभव अनुभूति का पुरस्कार है। प्रतिबद्ध माक्र्सवादी विद्वान डी0डी0 कोशंबी ने भारत में हजारों वर्ष की भारतीय सांस्कृतिक निरंतरता का उल्लेख किया है। उन्होंने “प्राचीन भारत की संस्कृति और सभ्यता (हिन्दी अनुवाद गुणाकार मुले, पृष्ठ 18-20) में लिखा “मिस्र की महान अफ्रीकी संस्कृति में वैसी निरंतरता नहीं मिलती जैसी भारत में पीछे तीन हजार या इससे भी ज्यादा वर्षो में है। बिना बल प्रयोग ही भारतीय दर्शन संस्कृति का चीन, जापान में स्वागत हुआ। इंडोनेशिया, वियतनाम, बर्मा, श्रीलंका के सांस्कृतिक इतिहास पर भारत का प्रभाव पड़ा।” संस्कृति दिक्काल के भीतर ही विकसित होती है। कोशंबी ने वामपंथी होने के बावजूद भारत की संस्कृति को कम से कम तीन हजार साल से निरंतर प्रवाहित बताया है। मानव जीवनशैली की गति प्रगति सौ सवा सौ वर्ष में बदल जाती है। कोशंबी के अध्ययन में यहां तीन हजार साल से एक ही संस्कृति की निरंतरता है।

भारतीय संस्कृति की दीर्घजीवी चेतना का कोई रहस्य तो होना ही चाहिए। व्यापक दिक्काल में इसका सतत् प्रवाह भी कम आश्चर्यजनक नहीं है। इसका गतिशील अविनाशी होना ध्यान देने योग्य है। तमाम विदेशी हमलों के बावजूद यह जीर्ण शीर्ण होकर टूटती भी नहीं। सूर्य करोड़ो वर्ष से जल रहे हैं। उनका ईंधन खत्म नहीं हुआ। भारतीय संस्कृति हजारों वर्ष से गतिशील है। इसका भी ईंधन जस का तस है।

भारत के अन्तस् में कोई अविनाशी प्रकृति का तत्व जान पड़ता है। यही तत्व या द्रव्य भारत के लोकजीवन को भीतर से उत्साह और उल्लास देता है, यही बाहर से भी हम सबको आच्छादित करता है। यह अदृश्य है लेकिन इसका प्रभाव प्रत्यक्ष है। भारत में महत्व सत्य का है। दुनिया के अन्य देशों में महत्व सफलता का है।

यूरोपीय अमेरिकी देशों में सफलता जैसे विषय पर लाखों पुस्तकें बिकती हैं। भारत में भी वे लोकप्रिय हो रही है लेकिन यहां के प्राचीन साहित्य में सत्य की महत्ता है। राजा हरश्चिन्द्र पर कोई बड़ा ग्रंथ नहीं है तो भी भारत के ग्रामीण लोग भी हरश्चिन्द्र का नाम जानते हैं। एक सत्य का अनुभूत दर्शन यहां का केन्द्रक है।

संस्कृति मनुष्य के सामूहिक सत्चित आनंद में लगातार सृजन करती है। सृजन की इस मस्ती में वह दिक्काल का अतिक्रमण भी करती है। संस्कृति तमाम आनंदवर्द्धक मिथक गढ़ती है। पुराने मिथकों को नया रंग रूप और प्यार देकर पुनर्नवा भी बनाती है। इसकी आंतरिक गतिविधि का ईंधन, भारत प्रकाश का केन्द्र कोई द्रव्य या तत्व ही हो सकता है। मैं इसे भारत द्रव्य कहना उचित जानता हूं।

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