सज्जन कुमार को कैसे पहुंचाया इन बाप-बेटी ने उसके अंजाम तक, पुलिस डायरी देख जज भी रह गए हैरान

Written by Newsroom Post December 19, 2018 3:12 pm

नई दिलेली। 1984 के सिख दंगों में दोषी सिद्ध हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सज्जन कुमार को दिल्ली हाईकोर्ट ने उम्रकैद की सजा के साथ पांच लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। सजा के बाद सिख दंगों में अपनों को खोने वाले परिवार आज जरूर थोड़ा राहत महसूस कर रहे होंगे। इस न्याय की लड़ाई में एक बाप-बेटी का जिक्र सामने आ रहा है जिनके बगैर यह लड़ाई अधूरी थी या फिर यूं कहें कि उनके बगैर न्याय मिलना शायद मुश्किल हो जाता।RS cheema & Tarannum Cheema

बता दें कि दोषियों को उनके अंजाम तक पहुंचाने में आरएस चीमा और उनकी बेटी तरन्नुम चीमा का सफल योगदान रहा है। आरएस चीमा पेशे से वकील हैं और तरन्नुम चीमा भी कानून की डिग्री हासिल कर चुकी हैं और अपने पिता को बतौर जूनियर मदद करती हैं।

आखिर इस केस में क्या है बाप-बेटी का अहम रोल

चीमा ने कोयला घोटाले जैसे बड़े-बड़े मामलों में खुद का लोहा मनवाया है और इसी को देखते हुए साल 2010 में सीबीआई ने सज्जन कुमार मामले में आरएस चीमा से पैरवी करने की अपील की थी। चीमा मान तो गए लेकिन उन्हें सुनवाई के लिए दिल्ली से चंडीगढ़ यात्रा करनी पड़ती थी, जिसमें उनकी बेटी ने अहम योगदान दिया। बता दें कि कोर्ट ने सज्जन कुमार को जगदीश कौर और निरप्रीत कौर की गवाही पर सजा सुनाई है, लेकिन इस मामले में निरप्रीत को इस बात का यकीन नहीं हो रहा था कि उनके पिता निर्मल कौर की मौत का जिम्मेदार सज्जन कुमार ही है। इसके लिए तरन्नुम चीमा गवाहों के साथ खड़ी रहीं, और उन्हें सच के साथ टिके रहने के लिए कहा।

इस मामले में सुनवाई के दौरान निरप्रीत से कोर्ट में कई अजीब से सवाल पूछे जाते थे, यहां तक कि उन्हें आतंकवादी भी कहा गया, जिसका आधार उनकी छात्र राजनीति को बनाया गया। इन सबके बाद भी तरन्नुम चीमा ने निरप्रीत कौर को मजबूती से खड़े रहने के लिए प्रेरित किया और सच का साथ देने के लिए कहा। जिसका नतीजा ये रहा कि तमाम बाधाओं के बाद भी निरप्रीत कौर ने गवाही दी और सज्जन कुमार को उम्रकैद की सजा मिली।

इस न्याय की जीत में आरएस चीमा कहते हैं कि “इस लड़ाई में मेरी बेटी तरन्नुम ने मेरा बहुत साथ दिया, इस सफलता का श्रेय भी मैं उसी को देना चाहूंगा।” फिलहाल इस केस में सज्जन कुमार कांग्रेस के पहले ऐसे बड़े नेता हैं जिन्हें सिख दंगों में सजा हुई है। बता दें कि सिख दंगे 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुआ था।

पुलिस डायरी ने दर्ज है वह खौफनाक मंजर और पुलिस का बर्बर चेहरा

इस पुलिस डायरी में दर्ज है कि 1 नवंबर से 11 नवंबर 1984 के बीच थाने पर कोई भी बड़ा मामला दर्ज नहीं किया गया, जबकि इस दौरान 341 लोगों की मौत हुई थी। पुलिस डायरी के इस खुलासे के बाद कोर्ट में जज को इस बात का यकीन हुआ कि कैसे हिंसा और अत्याचार के बीच पुलिस ने अपनी आंखें मूंद ली थी। बहरहाल तरन्नुम के उनका संघर्ष अभी यही नहीं खत्म हुआ है, वह इसी मामले में सज्जन कुमार के खिलाफ सुल्तानपुरी मामले में कोर्ट में पैरवी करेंगी।