आजाद भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने उस वक़्त भीड़ को काबू करने के लिए जो किया वो आपको शायद पता भी नहीं होगा !

Avatar Written by: October 2, 2018 3:34 pm

नई दिल्ली। 2 अक्टूबर हमारे लिए किसी खास पर्व से कम नहीं, क्योंकि इसी दिन मां भारती के दो सूपतों ने जन्म लिया था। एक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, तो दूसरे थे देश के महानायक लाल बहादुर शास्त्री। दोनों के बिना ही इस देश के लोकतंत्र की परिकल्पना नहीं की जा सकती। जितना अंतर्राष्ट्रीय स्तर के पटल पर गांधी जी का नाम अंकित है, तो ठीक वैसा ही कुछ कद देश के महान प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी का भी है, ये बात अलग है कि आजतक उनकी मौत किसी बड़े रहस्य से कम नहीं है।lal bahadur shastriदेश के दूसरे सबसे ओजस्वी प्रधानमंत्री शास्त्री जी दिखने में जितने सौम्य और शांत थे, उतने ही गंभीर और जिम्मेदार भी थे। यही कारण है कि आज भी देश उनका नाम बड़े सम्मान के साथ लेता है। साथ ही इनसे जुड़ा एक बहुत ही रोचक किस्सा भी है, जो आज हम आपको बताने जा रहे हैं। खैर वैसे तो शास्त्री जी की महानता के इतने किस्से हैं, जितने अबतक भारत के किसी प्रधानमंत्री के नहीं हैं, चाहे उनका लोन लेकर कार खरीदना हो या जेल से खत लिखकर परिवार की आमदनी और कम करवाना हो।आज हम जिस किस्से का जिक्र करने जा रहे हैं वो है उनका लोगों पर लाठी चार्ज की जगह पानी यूज करने का आदेश देना। बता दें कि ये वहीं शास्त्री हैं, जिन्होंने भीड़ नियंत्रित करने के लिए देश में पहली बार वॉटर कैनन का इस्तेमाल शुरू कराया था। उससे पहले तक पुलिसकर्मी भीड़ को तितर-बितर करने के लिए लाठियों का प्रयोग करते थे।2 अक्टूबर 1904 को मुगलसराय में जन्मे शास्त्री जी को लोग काशी के लाल के नाम से पुकारते थे। उनका बचपन बड़ी ही मुफलिसी में बीता। आर्थिक तंगी के कारण वह तब नदी के पार जाने के लिए तैर कर जाते थे। उस दौरान उनका बस्ता पीठ पर होता था।उनके जीवन में सादगी कुछ यूं थी कि उन्होंने अपनी शादी के दहेज में एक खादी का कपड़ा और चरखा लिया था। आजादी के बाद उन्हें परिवहन मंत्री बनने का मौका मिला। शास्त्री ने उस दौरान पहली बार देश में महिला ड्राइवरों और कंडक्टरों की नियुक्ति की थी।देहांत से कुछ समय पहले तक वह कर्ज के बोझ तले दबे हुए थे। ये रकम उन्होंने गाड़ी खरीदने के लिए बैंक से लोन के रूप में थी। इतने बड़े राजनेता होने के बाद भी शास्त्री जी ने कभी भी अपना बीमा नहीं कराया। तनख्वाह से हर महीने जन सेवकों को 250 रुपए मदद के तौर पर दिया करते थे।