ऐसा क्या है शाही स्नान में, जो इसे लेकर साधु कत्लेआम पर उतर आते हैं

Written by: January 13, 2019 3:42 pm

नई दिल्ली। प्रयागराज में कल से कुंभ मेला शुरू होने जा रहा है। इसी दिन पहला शाही स्नान भी होगा। इस स्नान का बड़ा महत्व है। कहा जाता है कि ये सीधे स्वर्ग के दरवाजे खोल देता है। अखाड़ों के साधु-संत संगम पर शाही स्नान करेंगे, ये स्नान शांति से निबटे, इसके लिए अखाड़ों का क्रम और स्नान के लिए जगह भी तय कर दी जाती है वरना शाही स्नान को लेकर साधुओं में खून-खच्चर होना आम बात है।

शाही स्नान की शुरुआत

सदियों से ये स्नान चला आ रहा है, जिसमें 13 अखाड़े शामिल होते हैं। ये कोई वैदिक परंपरा नहीं, माना जाता है कि इसकी शुरुआत 14वीं से 16वीं सदी के बीच हुई, तब देश पर मुगल शासकों के आक्रमण की शुरुआत हो गई थी। धर्म और परंपरा को मुगल आक्रांताओं से बचाने के लिए हिंदू शासकों ने अखाड़े के साधुओं और खासकर नागा साधुओं से मदद ली।

नागा साधु धीरे-धीरे आक्रामक होने लगे और धर्म को राष्ट्र से ऊपर देखने लगे, ऐसे में शासकों ने नागा साधुओं के प्रतिनिधि मंडल के साथ बैठक कर राष्ट और धर्म के झंडे और साधुओं और शासकों से काम का बंटवारा किया। साधु खुद को खास महसूस कर सकें, इसके लिए कुंभ स्नान का सबसे पहले लाभ उन्हें देने की व्यवस्था हुई। इसमें साधुओं का वैभव राजाओं जैसा होता था, जिसकी वजह से इसे शाही स्नान कहा गया, इसके बाद से शाही स्नान की परंपरा चली आ रही है।

कहा जाता है कि साल 1310 में महानिर्वाणी अखाड़े और रामानंद वैष्णव अखाड़े के बीच खूनी संघर्ष हुआ। दोनों ओर से हथियार निकल गए और पूरी नदी ने खूनी रंग ले लिया। साल 1760 में शैव और वैष्णवों के बीच स्नान को लेकर ठन गई, ब्रिटिश इंडिया में स्नान के लिए विभिन्न अखाड़ों का एक क्रम तय हुआ जो अब तक चला आ रहा है।

शाही स्नान में क्या होता है

इसमें विभिन्न अखाड़ों से ताल्लुक रखने वाले साधु-संत सोने-चांदी की पालकियों, हाथी-घोड़े पर बैठकर स्नान के लिए पहुंचते हैं।

सब अपनी-अपनी शक्ति और वैभव का प्रदर्शन करते हैं, इसे राजयोग स्नान भी कहा जाता है, जिसमें साधु और उनके अनुयायी पवित्र नदी में तय वक्त पर डुबकी लगाते हैं। माना जाता है कि शुभ मुहूर्त में डुबकी लगाने से अमरता का वरदान मिल जाता है।