जानिए लक्ष्मी के तीन वाहनों के बारे में….जानें क्या है इनकी विशेषता

सामान्य अवधारणा उल्लू को लक्ष्मी का वाहन मानती है। पर भारतीय दर्शन में लक्ष्मी के एक नहीं, तीन वाहन कहे गए हैं, उलूक, गज और गरुण। जहां गज  बुद्धिमत्ता, विनम्रता व शक्ति और गरुण दूरदृष्टि, एक लक्ष्य, अनुशासन, दृढ़ता और कुशलता का चिन्ह  है, वहीं  उल्लू पक्षी न होकर एक विशिष्ट क्षमता और विलक्षण दृष्टिकोण का प्रतीक है। उलूक नकारात्मक परिस्थितियों में सकारात्मक सोच का द्योतक  है। वह भीड़ से हटकर विचार करने की क्षमता की ओर इशारा करता है। अर्थात  वह तब देखने का दम रखता है जब सामान्य जन को लक्ष्य नज़र नहीं आता। यह प्रवित्ति नितांत व्यापारिक है। उलूक निर्भयता व सामर्थ्य का प्रतीक चिन्ह है।

यहाँ अदभुत बात ये है कि कही सुनी मान्यताओं के विपरीत न भारत के धार्मिक और आध्यात्मिक दर्शन और  ना ही पाश्चात्य जगत उल्लू को मूर्ख मानता है।तांत्रिक मान्यतायें इसे रहस्यमयी ऊर्जा का अगुआ मानती हैं। यहाँ तक कि पाश्चात्य संस्कृति में भी उल्लू को विवेकशील माना गया  है।फेंगशुई में उल्लू को सौभाग्यकारक कहा जाता है। जापान में इसे संकटमोचक माना जाता है। वो इसे प्रभु का दूत या फ़रिश्ता कहते हैं।  प्राचीन ग्रीक में यह सौभाग्य, समृद्धि और शक्ति का स्रोत कहा जाता था। यूरोप में उल्लू को किसी को कष्ट देने या स्वयं को कष्ट से बचाने के  सूत्रधार के रूप में देखा जाता है।

वाल्मीकि रामायण (6.17.19) में उल्लू को बेहद कुशाग्र और चतुर कहा गया। वहाँ एक प्रसंग में  श्रीराम को सुग्रीव ने उनको शत्रु की उलूक–चतुराई से आगाह किया था। लिंगपुराण  (2, 2.7-10) के अनुसार नारद को मानसरोवर के उलूक राज से संगीत की उच्चशिक्षा प्राप्त हुई थी।उल्लू इतना सतर्क और लचीला होता है कि अपनी गर्दन को 175 डिग्री तक मोड़ सकता है। यह लचीलापन आज के दौर में व्यापारिक से ज़्यादा राजनैतिक है।

पर मुख्य बात ये है कि इतनी ख़ूबियों के बाद भी उल्लू पूजन को भारतीय दर्शन उचित नहीं मानते।  तांत्रिक मान्यताओं के अनुसार जब लक्ष्मी पाताल गमन करती हैं, तब उलूक पर ही विराजती हैं। यहाँ पाताल का अभिप्राय स्थूल भोगों में लिप्त होकर जीवन को रसातल पहुँचाने से है। यानी जब व्यक्ति शुभ कर्म, आचरण और मानवीय मूल्यों को भूल कर भोग की इच्छा के साथ धन कमाने की लालसा में हर प्रकार के छल कपट, हथकंडे और व्यापारिक चतुराई का प्रयोग करता है, ईश्वरीय अंश होकर भी गर्त में चला जाता है।लक्ष्मी का  उलूक वाहिनी स्वरूप काले धन को आकर्षित करने वाला माना जाता है।

कहते हैं कि दक्षिण पश्चिम कोने से आने वाली उल्लू की आवाज़ आर्थिक संकट की परिचायक है।यदि उल्लू  उत्तर की ओर आवाज करे तो यह स्वास्थ्य समस्या का संकेत है।गृह में इसका पाया जाना परिजनों में विद्वेषपूर्ण सबंधों की सरगोशी है।एक ही स्थान पर नित्य इस पक्षी का रुदन किसी संकट की पूर्व सूचना है।

उल्लू से जुड़ी कई मान्यतायें उसकी शुभता का भी बखान करती हैं। अगर उल्लू सर के ऊपर  उड़ रहा हो या आवाज देकर पीछा कर रहा हो तो यात्रा शुभ होती है। पूर्व दिशा में बैठे उल्लू की आवाज सुनने या दर्शन को प्रचण्ड आर्थिक लाभ का सूचक माना गया है।

दक्षिण दिशा में विराजे उल्लू की आवाज शत्रुओं पर विजय सुनिश्चित करती है।प्रातःकाल उल्लू के स्वरों का श्रवण सौभाग्यकारक और लाभ प्रदायक होता है, ऐसा मान्यतायें कहती हैं। गर्भवती स्त्री को उलूक का स्पर्श  देवी सदृश श्रेष्ठ संतान का संकेत देता है।उल्लू से यदि किसी गंभीर रूप से रुग्ण व्यक्ति का अकस्मात् स्पर्श हो जाए तो यह उसके स्वास्थ्य में सुधार का संकेत देता है। रात्रि में उल्लू का कलरव शुभ है। यदि उल्लू किसी को अनायास छू ले तो उसका जीवन आनन्द से बीतता है।

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