आंकड़ों की बाजीगरी कर जनता को गुमराह करने की कोशिश में विपक्षी दल हो गए विफल…

देशभर में पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर काफी जोर शोर से हंगामा हुआ। विपक्षी पार्टियां इसे राजनीतिक मुद्दा बनने से भी पीछे नहीं हटी। इतना ही नहीं विपक्षी पार्टियों ने तो एक दिन का भारत बंद का अाह्वान भी किया था। लेकिन उनका यह भारत बंद पूरी तरह से विफल रहा था। विपक्ष के इस भारत बंद में उन्हीं के सहयोगियों ने उनका साथ नहीं दिया। ऐसे में यह साफ हो गया था कि तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का मुद्दा विपक्षी दलों ने केवल राजनीतिक फायदे से उठाया था। इसका आम जन से कोई सरोकार नहीं था। लेकिन इस सारे मुद्दे में कहीं ना कहीं आम जनों को भी परेशानी का सामना करना पड़ा। सियासी दलों ने भले हीं इसे राजनीतिक मुद्दा बना लिया लेकिन देश की जनता इस मामले में भी सरकार के साथ खड़ी नजर आई।

Petrol, diesel वहीं केंद्र की मोदी सरकार ने भी जनता की समस्या को ध्यान में रखते हुए समय-समय पर जनता को महंगाई से राहत दिलाने के लिए पेट्रोल-डीजल की कीमतों में लगातार कटौती की। केंद्र सरकार ने पेट्रोल-डीजल की कीमतों में एक व्यवस्था के तहत 2.50 रुपये प्रति लीटर कटौती की घोषणा की जिससे तेल की बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगाना संभव हो सका और सियासी दलों के हाथ से यह राजनीतिक मुद्दा भी छिनता नजर आया।

Narendra Modi and Rahul Gandhi

केंद्र सरकार की घोषणा के बाद भाजपा/राजग शासित अधिकतर राज्यों ने पेट्रोलियम उत्पादों पर राज्य स्तरीय करों में भी कटौती की। इससे इन राज्यों में पेट्रोल और डीजल की कीमतें पांच रुपये प्रति लीटर तक कमी आ गई। वहीं कच्चे तेल की कीमतों में जैसे ही गिरावट का दौर शुरू हुआ पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार कमी दर्ज की जाने लगी। अब तेल की कीमतें एक बार फिर अपने स्तर पर आ गई हैं और विपक्षी दलों के हाथ से एक और सियासी मुद्दा छिन गया।

क्या मोदी सरकार के समय ही बढ़े सबसे ज्यादा पेट्रोल-डीजल के दाम? 

पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दामों का सीधा-सीधा सरोकार दुनिया के बाजारों से है। कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के साथ ही तेल की कीमतों में वृद्धि शुरू हो जाती है। ऐसे में ये देखना जरूरी होगा कि कांग्रेस इस मामले का जिस तरह से राजनीतिकरण कर रही थी क्या वह सही था?

petrol price

सवाल यह भी है कि साल 2004 से 2014 तक देश में शासन करने वाली यूपीए सरकार के दौरान क्या पेट्रोल-डीजल के दाम कम थे, क्या इस दौरान पेट्रोल-डीजल की कीमतों में लगातार इजाफा नहीं हुआ था। आइए आकड़ों के जरिए बताते हैं कि कैसे यूपीए के शासन में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में लगातार वृद्धि जारी थी। आंकड़ों पर नजर डालें तो मई 2004 में यूपीए की सरकार बनी तो इस समय पेट्रोल की कीमत 33.71 प्रति लीटर थी। वहीं साल 2009 में यूपीए की सरकार फिर से आई तो इस वक्त पेट्रोल की की 40.62 पैसे थी। यानि इन 5 सालों में पेट्रोल की कीमत में 20 फीसद से ज्यादा की वृद्धि दर्ज कर ली गई। 2009 में दूसरी बार सत्ता में आई यूपीए2 की सरकार से लेकर 16 मई 2014 तक जब वह सरकार में रहे उस समय तक पेट्रोल की कीमत 71.41 प्रति लीटर पर पहुंच गई। यानी अगले पांच साल में पेट्रोल की कीमतों में 76 फीसदी का इजाफा हो गया। 2004 से 2014 तक के आंकड़े को गौर से देखें तो पता चलेगा कि इन 10 सालों में पेट्रोल की कीमत में 96 प्रतिशत का इजाफा हो गया। इसके साथ ही जिन नीतियों के तहत बाजार से कच्चे तेल की आमद सरकार ने देश के लिए बॉन्ड पेपर के जरिए की उसकी कीमत अब की वर्तमान सरकार को भरना पड़ रहा है।

Petrol Diesel Chart

वहीं 16 मई 2014 से लेकर 10 सितंबर 2018 में एनडीए की सरकार के दौरान पेट्रोल की कीमतों में 13 फीसदी का इजाफा हुआ। जिसके बाद पेट्रोल की बढ़ती कीमतों को लेकर देशभर में खूब हगांमा हुआ। लेकिन आंकड़ों पर गौर करें तो साफ हो जाता है कि यूपीए के मुकाबले एनडीए की सरकार में पेट्रोल की कीमतों में कम इजाफा हुआ।

Petrol Diesel Chart

उसी तरह डीजल की कीमतों में नजर डाले तो मई 2004 में उस वक्त डीजल की कीमत 21.74 प्रति लीटर थी। वहीं जब मई 2009 में कांग्रेस की दोबारा सरकार बनी उस समय 30.86 रुपए थी। लेकिन जब 16 मई 2014 में यूपीए की सरकार गई तो उस वक्त डीजल की कीमत 56.71 प्रति लीटर हो गई। यानी यूपीए सरकार के दौरान डीजल की कीमतों में 126 फीसदी का इजाफा हुआ।

Petrol Diesel Chart

वहीं 16 मई 2014 को डीजल की कीमत 56.71 रुपए थी तब से लेकर 10 सितंबर 2018 उसकी कीमतों में बढ़ोतरी होकर एक लीटर डीजल की कीमत 72.83 प्रति लीटर हो गई। यानी की एनडीए के 4 साल के शासन के दौरान डीजल की कीमतों में 28 फीसदी का इजाफा हुआ। यूपीए के 10 साल शासन के दौरान पेट्रोल 96% और डीजल 126 % महंगा हुआ। जबकि एनडीए के 4 साल पेट्रोल 13% और डीजल 28 % महंगा हुआ।

Petrol Diesel Chart

आंकड़ों से साफ हो जाता है कि यूपीए के 10 साल के दौरान जनता को किस तरह से महंगाई की मार झेलनी पड़ी। किस तरह से जनता को बेकफूक बनाने की कोशिश की गई। अब जब एनडीए सरकार के समय पूरी दुनिया में ईरान पर अमेरिका के द्वारा लगा गए प्रतिबंध की वजह से तेल की किल्लत का असर दिख रहा था तो भारत की विपक्षी राजनीतिक पार्टियां अपने शासन काल के दौरान बढ़ी महंगाई के आंकड़े से नजर बचाकर लोगों के सामने मोदी सरकार की विफलता का राग अलापने में लगी थी। लेकिन इन आंकड़ों ने उनकी सारी पोल खोल कर रख दी है।

protest

हाल के दिनों में लगातार देश में तेल की कीमतों में कमी जारी है। प्रधानमंत्री मोदी लगातार खुद इस मामले पर अपनी नजर बनाए हुए हैं। ऐसे में जहां इस मुद्दे को भी पांच राज्यों के चुनावों में अपना हथियार बनाने की कोशिश में विपक्ष लगा था उनके हाथ से यह मुद्दा छूट गया है। वहीं आज की बात करें तो पेट्रोल और डीजल के दाम में शुक्रवार को लगातार नौवें दिन गिरावट दर्ज की गई। दिल्ली में पेट्रोल का भाव 73 रुपये प्रति लीटर से कम हो गया है। वहीं, देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में 75 रुपये लीटर और चेन्नई में 76 रुपये लीटर से कम दाम पर पेट्रोल मिलने लगा है। डीजल का भाव दिल्ली में 68 रुपये और मुबई में 71 रुपये प्रति लीटर से कम हो गया है।

petrol price

बता दें कि सस्ता कच्चा तेल देश की जनता को कई तरीके से फायदा पहुंचाता है। पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में कमी होने के साथ ही या अन्य महंगाई को बढ़ने से भी रोकने में मदद करता है। क्रूड में नरमी को देखते हुए रिजर्व बैंक पर भी ब्याज दरों को बढ़ाने का दबाव कम हुआ है।

Facebook Comments