वो नेता, जिनकी चप्पल की बोली लगाकर निजाम ने खरीदा, कार्यों के बारे में जानकर हर भारतीय को होगा गर्व

Written by Newsroom Staff December 25, 2018 3:21 pm

नई दिल्ली। भारत की आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाने वाले और देश को बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी जैसा संस्थान देने वाले पंडित मदन मोहन मालवीय की आज जयंती है। 25 दिसंबर, 1861 को इलाहाबाद में जन्मे महामना ने कलकत्ता यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की थी। उनका निधन 12 नवंबर, 1946 को हुआ था।

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बीएचयू की स्थापना और निजाम

मदन मोहन मालवीय ने बीएचयू जैसे संस्थान के सपने को हकीकत में बदलने के लिए बहुत कठिन मेहनत की। जब उन्होंने यूनिवर्सिटी खोलने के लिए निजाम से आर्थिक मदद मांगी थी तो निजाम ने मदद देने से इनकार कर दिया था। कहा जाता है कि पंडित मदन मोहन मालवीय ने इसके बाद फंड जुटाने के मकसद से मार्केट में अपने स्लिपर की नीलामी की। संयोग की बात है कि चप्पल की बोली उसी निजाम ने लगाई और उसे बड़ी रकम देकर खरीदा।

सत्यमेव जयते

सबसे पहले बता दें कि भारत के राष्ट्रीय आदर्श वाक्य ‘सत्यमेव जयते’ (सच की जीत होती है) को लोकप्रिय बनाने का श्रेय उनको ही जाता है। ‘सत्यमेव जयते’ हजारों साल पहली लिखे गए उपनिषदों का एक मंत्र है।

कांग्रेस से संबंध

भले ही आज बीजेपी के लीडर उनसे ज्यादा करीब हैं और उनको अपना प्रेरणास्रोत मानते हैं। लेकिन वह वल्लभभाई पटेल की तरह ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दिग्गज चेहरों में से एक थे। वो चार बार यानी 1909, 1918, 1932 और 1933 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष रहे।

हिंदू-मुस्लिम एकता के समर्थक

हालांकि ये भी सच है कि मालवीय को हिंदू राष्ट्रवादी दिखाने की कोशिश की जाती है, लेकिन उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए काफी काम किए। उन्होंने सांप्रदायिक सौहार्द पर दो प्रसिद्ध भाषण दिए जिनमें से एक भाषण उन्होंने 1922 में लाहौर में दिया था और दूसरा 1931 में कानपुर में।

क्रांतिकारियों की वकालत

जब मालवीय इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकालत कर रहे थे तो उन्होंने गोरखपुर के चौरी-चौरा घटना में आरोपी बनाए गए क्रांतिकारियों का केस लड़ा था। कहा जाता है कि उन्होंने 153 क्रांतिकारियों को मौत की सजा से बचाया था। इस घटना के बाद से ही स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल क्रांतिकारियों के दो दल बन गए थे। एक था नरम दल और दूसरा गरम दल. शहीद-ए-आजम भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, राम प्रसाद बिस्मिल और चंद्रशेखर आजाद जैसे कई क्रांतिकारी गरम दल के नायक बने।

महामना मदन मोहन मालवीय

इलाहाबाद में 25 दिसंबर, 1861 में जन्मे पंडित मदन मोहन मालवीय अपने महान कार्यों के चलते ‘महामना’ कहलाए।

मालवीय ने एलएलबी करके पहले जिला अदालत और उसके बाद 1893 इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकालत की।

1885 से 1907 के बीच तीन पत्रों- हिन्दुस्तान, इंडियन यूनियन और अभ्युदय का संपादन किया।

‘नरम दल’ और ‘गरम दल’ के बीच कड़ी का काम करते हुए स्वतंत्रता संग्राम के पथप्रदर्शकों में से एक बने।

दक्षिणपंथी हिंदू महासभा के प्रारंभिक नेताओं में से एक मालवीय समाज सुधारक और सफल सांसद थे।

राजनीति के मंच पर यूं छाए

मालवीय 1886 में कलकत्ता में कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन में प्रेरक भाषण देते ही राजनीति के मंच पर छा गए। उन्होंने लगभग 50 साल तक कांग्रेस की सेवा की। मालवीय ने अत्यंत प्रभावशाली अंग्रेजी समाचार पत्र ‘द लीडर’ की 1909 में स्थापना की जो इलाहाबाद से प्रकाशित होता था।

1930 में जब महात्मा गांधी नमक सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया तो उन्होंने इसमें हिस्सा लिया और गिरफ्तारी दी। मालवीय इलाहाबाद नगरपालिका बोर्ड में सक्रिय रुप से शामिल रहे और वह 1903-1918 के दौरान प्रॉविन्शियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य, 1910-1920 के दौरान सेंट्रल काउंसिल, 1916-1918 के दौरान इंडियन लेजिस्लेटिव असेंबली के निर्वाचित सदस्य रहे।

उन्होंने विधवाओं के पुनर्विवाह का समर्थन और बाल विवाह का विरोध करने के साथ ही महिलाओं की शिक्षा के लिए काम किया। उनका 1946 में निधन हो गया। 24 दिसंबर, 2014 को उनकी 153वीं जयंती से एक दिन पहले उनको भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से अलंकृत किया गया।

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