जब युवा विवेकानंद ने जमशेदजी टाटा को दिए 2 आइडिया, बदल गया देश का इतिहास

Written by संतोष सिंह पाल January 12, 2019 3:52 pm

नई दिल्ली। पीएम मोदी ने स्वामी विवेकानंदजी के शिकागो भाषण की 125वीं सालगिरह पर एक कार्यक्रम में जिक्र किया था कि कैसे विवेकानंदजी ने मेक इन इंडिया का आव्हान करते हुए जमशेदजी टाटा को इसके लिए प्रेरणा दी थी। तो बता दें कि ये बात 1893 की है, जब विवेकानंदजी वर्ल्ड रिलीजन कॉन्फ्रेंस में भाग लेने के लिए अमेरिका जा रहे थे और उसी शिप में जमशेदजी टाटा भी थे। उस वक्त 30 साल के थे विवेकानंद और 54 साल के थे जमशेदजी टाटा।

तब क्या कहा था स्वामी विवेकानंद ने?

शिप यात्रा के दौरान कई मुद्दों पर स्वामी विवेकानंद और जमशेदजी टाटा में चर्चा हुई। टाटा ने बताया कि वो भारत में स्टील इंडस्ट्री लाना चाहते हैं। तब स्वामी विवेकानंद ने उन्हें सुझाव दिया कि टेक्नोल़ॉजी ट्रांसफर करेंगे तो भारत किसी पर निर्भर नहीं रहेगा, युवाओं को रोजगार भी मिलेगा। तब टाटा ने ब्रिटेन के इंडस्ट्रियलिस्ट से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की बात की, लेकिन उन्होंने ये कहकर मना कर दिया कि फिर तो भारत वाले हमारी इंडस्ट्री को खा जाएंगे।

फिर टाटा अमेरिका गए और वहां के लोगों से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का समझौता किया। लोग बताते हैं कि इसी से टाटा स्टील की नींव पड़ी और जमशेदपुर में पहली फैक्ट्री लगी। इस बात का जिक्र आज भी टाटा बिजनेस घराने से जुड़ी वेबसाइट्स पर मिल जाता है। इस पूरी मुलाकात की जानकारी स्वामीजी ने अपने भाई महेन्द्र नाथ दत्त को पत्र लिखकर दी थी।

जमशेद जी हैरान थे विवेकानंद को देखकर

जमशेदजी टाटा भगवा वस्त्रधारी उस युवा के चेहरे का तेज और बातें सुनकर काफी हैरान थे। भारत को कैसे सबल बनाना है इस पर उनकी राय एकदम क्लीयर थी, ना केवल आर्थिक क्षेत्र में बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में भी। विवेकानंद ने एक और काफी अहम प्रेरणा जमशेदजी टाटा को इस यात्रा के दौरान दी। वो थी भारत में एक टॉप लेवल की यूनीवर्सिटी खोलना जहां से वर्ल्ड लेवल के स्टूडेंट्स देश भर में निकलें, जिसमें ना केवल साइंस की रिसर्च हो बल्कि ह्यूमेनिटी की भी पढ़ाई हो।

टाटा ने दोनों ही बातों को गंभीरता से लिया। मुलाकात में दो बातें टाटा ने स्वामीजी से समझीं, एक गरीब भारतीय युवा को भरपेट खाना मिल जाए और दूसरी शिक्षा मिल जाए तो वो देश की तकदीर बदल सकता है, और टाटा ने रोजगार और शिक्षा को अपना मिशन बना लिया।

ये लिखा था ब्रिटेन के अखबारों में

हालांकि दोनों की ये पहली मुलाकात थी, लेकिन टाटा उनसे काफी प्रभावित हुए। स्वामी जी का सम्मान टाटा की नजरों में तब और भी बढ़ गया, जब ब्रिटेन के अखबारों ने उनके भाषण के बाद लिखा कि ‘’After listening him we find how foolish it is to send missionaries to his country.”। शिकागो भाषण के बाद विवेकानंद के चर्चे पूरे यूरोप और अमेरिका में होने लगे, वहां से वो इंग्लैंड चले गए, जहां उन्होंने कई लैक्चर वेदांत पर दिए।

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