ऋगवेद

कारीगरों व श्रमिकों के सामजिक सम्मान व यश प्रतिष्ठा के मंत्र सूक्त बड़े प्यारे हैं। आधुनिक काल में सामाजिक न्याय की चर्चा होती है। संप्रति शिक्षित विद्वानों का आदर प्रथम है लेकिन वैदिक समाज के कारीगर ऋषियों से भी ज्यादा सम्मानित है।

स्वयं को अस्तित्व में समर्पित करना गुरूता है। यहां सब ‘एक’ है। सब अद्वैत है। यही परम है। यही ओंकार है। समस्या यही है कि इसे कहें कैसे?