ऋग्वेद

अग्नि ऋग्वेद के प्रतिष्ठित देवता हैं। ऋग्वेद के मंत्रोदय के पहले से ही भारत के लोग अग्नि उपयोग व तत्वदर्शन से सुपरिचित थे। वैदिक ऋषियों ने अग्नि की सर्वव्यापकता और सर्वसमुपस्थिति का साक्षात्कार किया था।

ऋग्वेद में अग्नि और आकाश के भी आत्मीय सम्बंध हैं। मनुष्य और अग्नि के मध्य भी आत्मीयता है। मनुष्य और पक्षियों के मध्य भी रागात्मक सम्बंध हैं।

जीवन दिक्काल में है। कभी-कभी काल का अतिक्रमण भी करता है जीवन, इसलिए जीवन की कालगणना सतही है। कालगणित के पैमाने पर कोई 100 वर्ष जीता है तो कोई 25 या 30 बरस। कीट पतंगे कम समय का जीवन पाते हैं। सर्प आदि की उम्र बहुत ज्यादा होती है। ऋग्वेद के पूर्वजों ने 100 शरद् जीवन की स्तुतियां की थी- जीवेम शरदं शतं। अनुवाद में गड़बड़ हुई। 100 शरद का अर्थ 100 वर्ष हो गया। शरद् में गहन आनंदबोध है।

ऋग्वेद विश्व मानवता का प्रथम शब्द साक्ष्य है। यह दुनिया का सबसे प्राचीन काव्य संकलन है। अंतर्राष्ट्रीय संस्था यूनेस्को ने भी ऋग्वेद को प्राचीनतम अंतर्राष्ट्रीय धरोहर बताया है। ऋग्वेद के रचनाकाल में ‘लिपि’ नहीं थी। ऋषियों ने अपनी मनतरंग में गीत गाए। भारतीय परंपरा इन गीतों को मंत्र कहती है और गीतकार कवियों को ऋषि।

सभी प्राणी बोलते है। अनेक पक्षी साथ-साथ बोलें तो कलरव। बोली अच्छी लगे तो कहते हैं कि पक्षी गीत गा रहे हैं। कोयल को बहुधा गायक कहा जाता है। सही बात कोयल ही जानती होगी कि वह गा रही है या किसी परिस्थितिवश बड़बड़ा रही है। कौवे खूब बोलते हैं। हम उनके प्रवचन को ‘‘कांव कांव’’ कहते हैं। मेढक भी बोलते हैं।

सतत् कर्म का कोई विकल्प नहीं है। प्रकृति की सभी शक्तियां गतिशील हैं। हम पृथ्वी से हैं, पृथ्वी में हैं। पृथ्वी माता है। पृथ्वी सतत् गतिशील है। वह सूर्य की परिक्रमा करते हुए अपनी धुरी पर नृत्य मगन रहती है। माता पृथ्वी के अंतस् में अपनी संतति को सुखी बनाए रखने की अभिलाषा है। इसलिए वह कोई अवकाश नहीं लेती।

वायु दिखाई नहीं पड़ते। ऋग्वेद के ऋषि को उनका ‘घोष’ सुनाई पड़ता है। लेकिन ऋषि उनका रूप नहीं देख पाते।...

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